05. मथुराखण्ड || अध्याय 03 || अक्रूर का नन्दग्राम-गमन, मार्ग में बलराम - श्रीकृष्ण भेंट तथा उन्हीं के साथ नन्द-भवन में प्रवेश, श्रीकृष्ण से बातचीत और उनका मथुरा -गमन के लिये निश्चय, मथुरा-यात्रा की चर्चा सब ओर फैल जाने पर गोपियों का विरह की आशंका से उद्विग्न हो उठना
गर्ग संहिता मथुराखण्ड : अध्याय 3 अक्रूर का नन्दग्राम-गमन, मार्ग में उनकी बलराम - श्रीकृष्ण भेंट तथा उन्हीं के साथ नन्द-भवन में प्रवेश, श्रीकृष्ण से बातचीत और उनका मथुरा -गमन के लिये निश्चय, मथुरा-यात्रा की चर्चा सब ओर फैल जाने पर गोपियों का विरह की आशंका से उद्विग्न हो उठना श्रीनारदजी कहते हैं– मिथिलेश्वर ! अक्रूरजी रथ पर आरूढ़ हो राजा कंस का कार्य करने के लिये बड़ी प्रसन्नता के साथ नन्दगाँव को गये। पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के प्रति पराभक्ति थी। परम बुद्धिमान अक्रूर यात्रा करते हुए मार्ग में अपनी बुद्धि से इस प्रकार विचार करने लगे। अक्रूर बोले– मैंने भारतवर्ष में कौन-सा पुण्य किया, निस्स्वार्थभाव से कौन-सा दान दिया, कौन-सा उत्तम यज्ञ, तीर्थयात्रा अथवा ब्राह्मणों की शुभ सेवा की है, जिससे आज मैं भगवान परमेश्वर श्रीहरि दर्शन करूँगा ? मैंने पूर्वजन्म में कौन-सा उत्तम तप किया और भक्तिभाव से कब किस संत पुरुष का सेवन किया था, जिससे आज मुझे अपने सामने भगवान श्रीकृष्ण का दर्लभ दर्शन होगा। भगवान सुरेश्वर श्रीकृष्ण जिनके नेत्रों के गोचर होते हैं, भूतल पर उन्हीं का जन्म सफल है।...