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Showing posts from September, 2021

07. विश्वजितखण्‍ड || अध्याय 03 ||प्रद्युम्न के नेतृत्‍व में दिग्विजय के लिये प्रस्थित हुई यादवों की गजसेना,

गर्ग संहिता  विश्वजितखण्‍ड || अध्याय 03 || प्रद्युम्न के नेतृत्‍व में दिग्विजय के लिये प्रस्थित हुई यादवों की गजसेना, अश्‍वसेना तथा योद्धाओं का वर्णन  श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्‍तर भगवान श्रीकृष्‍ण, राजा उग्रसेन, बलरामजी तथा गुरु गर्गाचार्य को नमस्‍कार करके, उनकी आज्ञा ले, प्रद्युम्न रथ पर आरुढ़ हो कुशस्‍थली पुरी से बाहर निकले। फिर उनके पीछे समस्‍त उद्धव आदि यादव, भोजवंशी, मधुवंशी, शूरवंशी और दशाहावंश में उत्‍पन्‍न वीर चले। फिर श्रीकृष्‍ण के भाई गद आदि सब वीर श्रीकृष्‍ण की अनुमति ले पुत्रों और सेनाओं के साथ चल दिये। साम्‍ब आदि महारथी भी प्रद्युम्न के साथ गये। वे सभी यादव-वीर किरीट, कुण्‍डल तथा लोहे के बने हुए कवच से अलंकृत थे। उनके साथ करोड़ों की संख्‍या में चतुरंगिणी सेना थी। वे सब द्वारकापुरी से बाहर निकले। उनके रथ मोर, हंस, गरुड़, मीन और ताल के चिंह से युक्‍त ध्‍वजों से सुशोभित थे, सूर्य मण्‍डल के समान तेजोमय थे और चंचल अश्‍व उन में जोते गये थे। उन रथों के कलश और शिखर सोने के बने थे, मोतियों की बन्‍दन वारें उनकी शोभा बढा़ती थीं। वे सभी रथ वायु वेग का अनुकरण करते थे।...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 04 ||सेना सहित यादव-वीरों की दिग्विजय के लिये यात्रा

गर्ग संहिता  विश्वजित खण्‍ड || अध्याय  04 || सेना सहित यादव-वीरों की दिग्विजय के लिये यात्रा श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार सेना से घिरे हुए धनुर्धारियों में श्रेष्‍ठ वीर प्रद्युम्न से श्रीकृष्‍ण बलेदव सहित उग्रसेन ने कहा।  उग्रसेन बोले- हे महाप्राज्ञ प्रद्युम्न ! तुम श्रीकृष्‍ण की समस्‍त राजाओं पर विजय प्राप्‍त करके शीघ्र की द्वारका में लौट आओगे। इस बात को ध्‍यान में रखो कि धर्मज्ञ पुरुष मतवाले, असावधान, उन्‍मत, सोये हुए बालक, जड़, नारी, शरणागत, रथहीन और भयभीत शत्रु को नहीं मारते। संकट में पडे़ हुए प्राणियों की पीड़ा निवारण तथा कुमार्ग में चलने वालों का वध राजा के लिये परम धर्म है। इस प्रकार जो आततायी है (अर्थात् दूसरों को विष देने वाला, पराये घरों में आग लगाने वाला, क्षेत्र और नारी का अपहरण करने वाला है) वह अवश्‍य वध के योग्‍य है। स्‍त्री, पुरुष या नपुसंक कोई भी क्‍यों न हो, जो अपने-आपको ही महत्‍व देने वाले, अधम तथा समस्‍त प्राणियों के प्रति निर्दय हैं, ऐसे लोगों का वध करना राजाओं के लिये वध न करने के ही बराबर है। अर्थात् दुष्‍टों के वध से राजाओं को दोष नहीं लगत...

07. विश्वजितखण्‍ड || अध्याय 05 ||यादव-सेना की कच्‍छ और कलिंग देश पर विजय

गर्ग संहिता   07. विश्वजितखण्‍ड  || अध्याय 05 || यादव-सेना की कच्‍छ और कलिंग देश पर विजय श्रीबहुलाश्‍व ने पूछा- देवर्षि शिरोमणे ! श्रीहरि के पुत्र प्रद्युम्न क्रमश: किन-किन देशों को जीतने के लिये गये, उनके उदार कर्मों का मेरे समक्ष वर्णन कीजिये। अहो ! भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र की अपने भक्‍तों पर ऐसी कृपा है, जो श्रवण और जाने पर पापीजनों को उनके कुल सहित पवित्र कर देती है। श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्‍ ! तुमने बहुत अच्‍छ बात पूछी है। तुम्‍हारी विमल बुद्धि को साधुवाद ! श्रीकृष्‍ण के भक्‍तों का चरित्र तीनों लोकों को पवित्र कर देता है। राजन्! वर्षाकाल में बादलों से बरसती हुई जलधाराओं को तथा भूमि के समस्‍त धूलिकणों को कोई विद्वान पुरुष भले ही गिन डाले, किंतु महान श्रीहरि गुणों को कोई नहीं गिन सकता। रुक्मिणी नन्‍दन प्रद्युम्न उस श्‍वेत छत्र से सुशोभित थे, जिसकी छाया चार योजन तक दिखायी देती थी। वे इन्‍द्र के दिये हुए रथ पर आरुढ़ हो अपनी सेना के साथ पहले कच्‍छ देशों को जीतने के लिये उसी प्रकार गये, जैसे पूर्वकाल में भगवान शंकर ने त्रिपुरों को जीतने के लिये रथ से यात्रा की थी। कच्‍छ द...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 06 || प्रद्युम्न मरुधन्‍व देश के राजा गय को हराकर मालव नरेश तथा माहिष्‍मती पुरी के राजा से बिना युद्ध किये ही भेंट प्राप्‍त करना

गर्ग संहिता  विश्वजित खण्‍ड  || अध्याय 06 ||  प्रद्युम्न मरुधन्‍व देश के राजा गय को हराकर मालव नरेश तथा माहिष्‍मती पुरी के राजा से बिना युद्ध किये ही भेंट प्राप्‍त करना  श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार कलिंगराज पर विजय पाकर यादवेश्वर प्रद्युम्न मरुधन्‍व (मारवाड़) देश में इस प्रकार गये, मानो अग्नि ने जल पर आक्रमण किया हो। धन्‍वदेश का राजा गया पर्वतीय दुर्ग में गये और राज सभा में प्रवेश करके गय से बोले- ‘महामते नरेश ! मेरी बात सुनिये। यादवों के स्‍वामी महान राज-राजेश्‍वर उग्रसेन जम्‍बूद्वीप के राजाओं को जीतकर राजसूययज्ञ करेंगे। साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍ण जो असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति हैं, उन महाराज के मन्‍त्री हुए हैं। उन्‍होंने ही धनुर्धरों श्रेष्‍ठ साक्षात प्रद्युम्न को यहाँ भेजा हैं। आप यदि अपने कुल का कुशल-क्षेम चाहें तो शीघ्र भेंट लेकर उनके पास चलें । श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्‍ ! यह सुनकर शौर्य और पराक्रम के मद से उत्‍मत रहने वाले महाबली राज गय ने कुछ कुपित होकर उद्धव से कहा । गय बोले- महामते ! मैं युद्ध किये बिना उनके लिये भेंट नहीं दूँगा। आप...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 07 || गुजरात-नरेश ऋष्‍य पर विजयप्राप्‍त करके यादव-सेना का चेदिदेश के स्‍वामी दमघोष के यहाँ जाना राजा का यादवों से प्रेमपूर्ण बर्ताव करने का निश्‍चय, किंतु शिशुपाल का माता-पिता के विरुद्ध यादवों से युद्ध का आग्रह

गर्ग संहिता  विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 07 || गुजरात-नरेश ऋष्‍य पर विजयप्राप्‍त करके यादव-सेना का चेदिदेश के स्‍वामी दमघोष के यहाँ जाना राजा का यादवों से प्रेमपूर्ण बर्ताव करने का निश्‍चय, किंतु शिशुपाल का माता-पिता के विरुद्ध यादवों से युद्ध का आग्रह  श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! महापराक्रमी प्रद्युम्न माहिष्‍मती के राजा को जीतकर अपनी विशाल सेना लिये गुजरात के राजा के यहाँ गये। जैसे पक्षिराज गरुड़ अपनी चोंच से सर्प को पकड़ लेती हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्‍ण कुमार प्रद्युम्न ने गुर्जरदेश के अधिपति महाबली वीर ऋष्‍य को सेना द्वारा जा पकड़ा। उनके तत्‍काल भेंट वसूल करके महाबली यादवेन्द्र अपनी विशाल वाहिनी साथ लिये हुए चेदिदेश में जा पहुँचे। चेदिराज दमघोष वसुदेवजी के बहनोई थे; किंतु उनका पुत्र शिशुपाल श्रीकृष्‍ण का पक्‍का शत्रु कहा गया है। बुद्धिमानों में श्रेष्‍ठ और उनको प्रणाम करके बोले । उद्धव ने कहा- राजन ! महाराज उग्रसेन को बलि दीजिये। वे समस्‍त राजाओं को जीतकर राजसूय यज्ञ करेंगे। श्रीनारदजी कहते हैं- मिथिलेश्‍वर ! उद्धवजी का यह वचन सुनकर दमघोष के दुष्ट पुत्र शिशुपाल के ओष्‍ठ फड़कने...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 08 || शिशुपाल के मित्र द्युमान तथा शक्‍त का वध

गर्ग संहिता विश्वजित खण्‍ड  || अध्याय 08 || शिशुपाल के मित्र द्युमान तथा शक्‍त का वध श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! शिशुपाल अपनी सेना को साथ ले माता-पिता का तिरस्‍कार करके चन्द्रिकापुर से बाहर निकला। दुष्‍टों का ऐसा स्‍वभाव ही होता है। उसके सात ‘वाहिनी’ और ‘ध्‍वजिनी’ सेनाओं से युक्‍त द्युमान और शक्‍त निकले। शिशुपाल के दो मन्त्रियों के नाम थे, रंग और पिंग। वे दोनों क्रमश: पृतना’ और ‘अक्षौहिणी’ सेना लिये युद्ध के लिये नगर से बाहर आये । नरेश्‍वर ! शिशुपाल की महासेना प्रलयकाल के महासगार के समान उमड़ती हुई आ रही थी। उसे देखकर यदुवंशी वीर भगवान श्रीकृष्‍ण को ही जहाज बनाये, उस सैन्‍य सागर से पर होने के लिये सामने आये। महाबली द्युमान शिशुपाल से प्रेरित हो ‘वाहिनी’ सेना सहित आगे बढ़कर योद्धाओं के साथ युद्ध करने लगा। समरांगण में दोनों सेनाओं की बाण-वर्षा से अन्‍धकार छा गया। घोड़ा की टापों से इतनी धूल उड़ी कि आकाश आच्‍छादित हो गया। नरेश्‍वर ! दौड़ते हुए घोड़े उछलकर हाथियों के मस्‍तक पर पांव रख देते थे और घायल हुए हाथी युद्धभूमि में पैरों से शत्रुओं को गिराते ओर सूँड की फुफकारों से इधर-उधर फेंकत...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 09 || भानु के द्वारा रंग-पिंग का वध; प्रद्युम्न और शिशुपाल का भयंकर युद्ध तथा चेदिदेश पर प्रद्युम्न की विजय

गर्ग संहिता  विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 09 ||  भानु के द्वारा रंग-पिंग का वध; प्रद्युम्न और शिशुपाल का भयंकर युद्ध तथा चेदिदेश पर प्रद्युम्न की विजय   श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यों कहकर शत्रुसूदन भानु ढाल-तलवार लेकर पैदल ही शत्रुसेना में उसी प्रकार घुस गये, भानु ने अपने खड्ग से शत्रु-योद्धाओं की भुजाएं काट डालीं। हाथी और घोड़ों भी जब सामने या आस-पास मिल जाते थे, तब वे अपनी तलवार से उनके दो टुकड़े कर डालते थे। वे उस समरागंण में शत्रुओं का छेदन करते हुए अकेले ही विचरने और शोभा पाने लगे। उनका दूसरा साथी केवल खड्ग था। जैसे कुहा से और बादलों से आच्‍छादित होने पर भी सूर्य देव अपने तेज से उदासित होत हैं, उसी प्रकार शत्रुओं से आवृत होने पर भी वीरवर भानु अपने विशिष्‍ट तेज का परिचय दे रहे थे। मिथिलेश्‍वर ! भानु के खड्ग से जिनके कुम्‍भस्‍थल कट गये थे, उन हाथियों के मस्‍तकों में से मोती रणभूमि में उसी प्रकार गिरते थे, जैसे पुण्‍यकर्मों के क्षीण हो जाने पर स्‍वर्गवासी जनों के तारे द्युलोक से भूमि पर गिर पड़ते हैं। उस समारांगण में दृष्टिमात्र से शत्रुसेना को धराशा‍यिनी करके महाबली वीर ...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 10 || यादव-सेना का कोंकण, कुटक, त्रिगर्त, केरल, तैलंग, आदि देशों पर विजय प्राप्‍त कर करुष देश में जाना तथा वहाँ दन्‍तवक्र का घोर युद्ध

श्रीगर्ग संहिता  07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 10 || यादव-सेना का कोंकण, कुटक, त्रिगर्त, केरल, तैलंग, महाराष्‍ट्र और कर्नाटक आदि देशों पर विजय प्राप्‍त कर करुष देश में जाना तथा वहाँ दन्‍तवक्र का घोर युद्ध नारदजी कहते हैं- मिथिलेश्‍वर ! तदनन्‍तर मनुतीर्थ में स्‍नान करके प्रद्युम्न बारंबार दुन्‍दुभि बजवाते हुए यादव सेना के साथ कोंकण देश में गये। कोंकण देश का राजा मेधावी गदायुद्ध में अत्‍यन्‍त कुशल था। वह मल्‍लयुद्ध के द्वारा विपक्षी के बल की परीक्षा करने के लिये अकेला ही आया। उसने सेना सहित प्रद्युम्न से कहा- ‘यादवेश्‍वर ! मुझे गदा युद्ध प्रदान करो। प्रभो ! मेरे बल का नाश करो’। प्रद्युम्न बोले- हे मल्‍ल ! इस भूतल पर एक-से-एक बढ़कर बलवान वीर है; अत: तुम अपने बल पर घमंड न करो। भगवान विष्‍णु की माया बड़ी दुर्गम है। हम लोग बहुत-से वीर यहाँ एकत्र हैं और तुम अकेले ही हमसे युद्ध करने के लिये आये हो। महामल्‍ल ! यह अधर्म दिखायी देता है, अत: इस समय लौट जाओ। मल्‍ल बोला- जब आप लोग बलशाली वीर होकर भी युद्ध नहीं कर रहे हैं, तो मेरे पैरों के नीचे होकर निकल जाइये तभी अब यहाँ से लौटूँगा। श्रीनारदजी कह...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 11 || दन्‍तवक्र की पराजय तथा करुष देश पर यादव-सेना की

गर्ग संहिता  विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 11 || दन्‍तवक्र की पराजय तथा करुष देश पर यादव-सेना की  श्रीनारदजी कहते हैं- तब श्रीकृष्‍ण के अठारह महारथी पुत्रों ने मिलकर दन्‍तवक्र को क्षत विक्षत कर दिया। घायल हुआ दन्‍तवक्र रक्‍तधारा से रंजित हो उसी प्रकार अत्‍यन्‍त शोभा पाने लगा, जैसे महावर क रंग से रँगा हुआ कोई ऊँचा महल से शोभित हो रहा हो। उसने शत्रुओं के प्रहार को कुछ भी नहीं गिना। कृतवर्मा ने समरांगण में उसे बाण-समूहों द्वारा घायल किया, सात्‍यकि ने तलवार से चोट पहॅुचायी और अक्रूर ने उस महाबली वीर पर शक्ति से प्रहार किया। रोहिणीनन्‍दन सारण ने उसके ऊपर कुठार से आघात किया। रणदुर्मद दन्‍तवक्र ने भी सात्‍यकि के गदा से चोट पहुँचायी, कृतवर्मा को हाथों से और अक्रूर को लात से मारा तथा सारण को भुजाओं के वेगस से आहत कर दिया। अक्रूर, वृतवर्मा, सात्‍यकि और सारण ये चारों वीर आँधी के उखाडे़ हुए वृक्षों की भाँति मूर्च्छित होकर पृथ्‍वी पर गिर पडे़ तदनन्‍तर जाम्‍बवती कुमार साम्‍ब ने उसकी गदा लेकर, गदा के ऊपर अपनी गदा रखकर उससे दन्‍तवक्र को मारा। दन्‍तवक्र ने गदा फेंक दी और जाम्‍बवती कुमार साम्‍ब को ...

01. गोलोक खण्ड || अध्याय 11 || भगवान वसुदेव देवकी में आवेश; देवताओं द्वारा उनका स्तवन; आविर्भावकाल; अवतार विग्रह की झाँकी;

गर्ग संहिता गोलोक खण्ड : अध्याय 11 भगवान वसुदेव  देवकी  में आवेश; देवताओं द्वारा उनका स्तवन; आविर्भावकाल; अवतार विग्रह की झाँकी; वसुदेव देवकी कृत भगवत-स्तवन; भगवान द्वारा उनके पूर्वजन्म के वृतांत वर्णन पूर्वक अपने को नन्द भवन में पहुँचाने का आदेश;  कंस  द्वारा नन्द कन्या  योगमाया  से कृष्ण के प्राकट्य की बात जानकर पश्चात्ताप पूर्वक वसुदेव देवकी को बन्धन मुक्त करना, क्षमा माँगना और दैत्यों को बाल वध का आदेश देना। श्रीनारदजी कहते हैं-  मिथिलेश्वर ! तदंतर परात्पर एवं परिपूर्णतम साक्षात  भगवान श्रीकृष्ण  पहले वसुदेवजी के मन में आविष्ट हुए। भगवान का आवेश होते ही महामना वसुदेव सूर्य,  चन्द्रमा  और  अग्नि  के समान महान तेज से उदभासित हो उठे, मानो उनके रूप में दूसरे यज्ञनारायण ही प्रकट हो गये हों। फिर सबको अभय देने वाले  श्रीकृष्ण  देवी  देवकी  के गर्भ में आविष्ट हुए। इससे उस कारागृह में देवकी उसी तरह दिव्य दीप्ति से दमक उठीं, जैसे घनमाला में चपला चमक उठती है। देवकी के उस तेजस्वी रूप को देखकर  कं...

05. मथुराखण्‍ड || अध्याय 25 || मथुरापुरी का माहात्म्य मथुरा खण्ड का उपसंहार

गर्ग संहिता मथुराखण्‍ड : अध्याय 25 मथुरापुरी का माहात्म्य मथुरा खण्ड का उपसंहार बहुलाश्व ने पूछा-  मुने ! जहाँ बलरामजी अकस्मात पहुँचे गये, वहाँ ऐसा उत्तम तीर्थ सुना गया। अहो ! मथुरापुरी धन्य है, जहाँ वे नित्य निवास करते हैं। मथुरा का देवता कौन है? क्षत्ता (द्वारपाल) कौन हैं ? उसकी रक्षा कौन करता हैं ? चार कौन है ? मन्त्रिप्रवर कौन हैं ? और किन-किन लोगों के द्वारा वहाँ भूमिका सेवन किया गया है ? श्रीनारदजी ने कहा-  राजन् ! साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्री कृष्ण हरि मथुरा के स्वामी या देवता हैं। भगवान केशवदेव वहाँ के क्लेशनाशक हैं साक्षात भगवान ने कपिल नामक ब्राह्मण को अपनी वाराह मूर्ति प्रदान की थी। कपिल ने प्रसन्न होकर वह मूर्ति देवराज इंद्र को दे दी। फिर समस्त लोकों को रूलाने वाला राक्षसराज रावण देवताओं को जीतकर उस मूर्ति का स्तवन करके उसे पुष्पक विमान पर रखकर लंका में ले आया उसकी पूजा करने लगा। मिथिलेश्वर ! तदनन्तर राघवेन्द्र श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त करके भगवान वाराह को प्रयत्‍न पूर्वक अयोध्...

05. मथुराखण्‍ड || अध्याय 24 || बलदेव जी द्वारा कोल दैत्य का वध; उनकी गंगा तटवर्ती तीर्थों में यात्रा;

गर्ग संहिता मथुराखण्‍ड : अध्याय 24 बलदेव जी द्वारा कोल दैत्य का वध; उनकी गंगा तटवर्ती तीर्थों में यात्रा; माण्डूक देव को वरदान और भावी वृत्तान्त की सूचना देना; फिर गंगा के अन्यान्य तीर्थों में स्नान-दान करके मथुरा में लौट जाना बहुलाश्व ने पूछा-  मुने ! गोपांग्‍नाओं और गोपों को उत्तम दर्शन देकर  मथुरा  में लौटने के पश्‍चात  श्रीकृष्ण  तथा  बलराम  ने क्या किया ? श्रीकृष्ण और बलदेव का चरित्र बड़ा मधुर है। यह समस्त पापों को हर लेने वाला पुण्यप्रद तथा चतुर्वर्गरू फल प्रदान करने वाला है। श्रीनारदजी ने कहा-  राजन् ! अब  श्रीकृष्ण  और बलदेवजी का दूसरा चरित्र सुनो जो सर्वपापहारी, पुण्यदायक तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है। नरेश्वर ! कोल नामक दैत्य से पीड़ित हुए बहुत-से लोग दीनचित्त हो  ब्राह्मणों  के साथ कौशारविपुर से  मथुरा  में आये। उस समय रोहिणी नन्दन बलराम शीघ्रगामी अश्व पर पर आरूढ हो थोडे़-से अग्रगामी लोगों के साथ शिकार खेलने के लिये मथुरा से निकले थे। मार्ग में ही उन्हें प्रणाम करके उ...