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10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 42 || रासक्रीड़ा के प्रसंग में श्रीवृंदावन, यमुना–पुलिन, वंशीवट, निकुंज भवन आदि की शोभा का वर्णन, गोप सुन्‍दरियों, श्यामसुंदर तथा श्रीराधा की छबि का चिंतन

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 42 || रासक्रीड़ा के प्रसंग में श्रीवृंदावन, यमुना–पुलिन, वंशीवट, निकुंज भवन आदि की शोभा का वर्णन, गोप सुन्‍दरियों, श्यामसुंदर तथा श्रीराधा की छबि का चिंतन श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन् ! हेमंत ऋतु के प्रथम मास में पूर्णिमा की रात को राधिकावल्लभ श्याम सुंदर ने वृंदावन में पहले की ही भाँति सबको वश में कर लेने वाली बंशी बजायी। वह बंशी ध्वनि सबके मन को आकृष्ट करती हुई सब ओर फैल गई। उसे सुनकर गोप सुंदरियाँ प्रेमवेदना से पीड़ित एवं त्रस्त हो गईं। मेघों की गति को रोकती, तुम्बुरू को बार–बार आश्चर्य में डालती, सनक–सनंदन आदि के ध्यान में बाधा पहुँचाती, ब्रह्माजी को विस्मित करती, उत्कण्ठावलियों से राजा बलि को भी चपल बनाती, नागराज शेष में चंचलता लाती तथा ब्रह्माण्ड कटाह की भित्तियों का भेदन करती हुई वह वंशीध्वनि सब ओर फैल गई ।[1] राजेंद्र ! इतने में ही चराचर प्राणियों के सूर्य किरण जनित संताप का मार्जन करते हुए चंद्रमा का उदय हुआ, जैसे परदेश से आया हुआ प्रियतम अपनी प्रिया के विरह शोक को दूर कर देता है। दूसरों को मान देने वाले नरेश ! उसी समय यमुना ने दिव्य व्रजभूमि का स्व...