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02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 03 || श्री यमुना जी का गोलोक से अवतरण और पुन: गोलोक धाम में प्रवेश

श्री गर्ग संहिता  02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 03 || श्री यमुना जी का गोलोक से अवतरण और पुन: गोलोक धाम में प्रवेश सन्नन्द जी कहते हैं:- नन्दराज, गोलोक में श्री हरि ने जब यमुना जी को भूतल पर जाने की आज्ञा दी और सरिताओं में श्रेष्ठ यमुना जब श्रीकृष्ण की परिक्रमा करके जाने को उद्यत हुई, उसी समय विरजा तथा ब्रह्मद्र्व से उत्पन्न साक्षात गंगा जी, ये दोनों नदियाँ आकर यमुना जी में लीन हो गयीं।  इसीलिये परिपूर्णतमा कृष्णा (यमुना) को परिपूर्णतम श्रीकृष्ण की पटरानी के रूप में लोग जानते हैं।  तदनंतर सरिताओं में श्रेष्ठ कालिन्दी अपने महान वेग से विरजा के वेग का भेदन करके निकुन्ज-द्वार से निकलीं और असंख्य ब्रह्माण्ड़-समूहों का स्पर्श करती हुई ब्रह्मद्र्व में गयी। फिर उसकी दीर्घ जल राशि का अपने महान वेग से भेदन करती हुई वे महानदी भगवान श्री वामन के बायें चरण के अँगूठे के नख से विदीर्ण हुए ब्रह्माण्ड़ के शिरोभाग में विद्यमान ब्रह्मद्व्र युक्त विवर में श्री गंगा के साथ ही प्रविष्ट हुई और वहाँ से वे सरिद्वरा यमुना ध्रुव मण्‍डल में स्थित भगवान अजित विष्णु के धाम वैकुण्ठ लोक में होती हुई ब्रह...