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04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 23 || अम्बिका वन में अजगर से नन्‍दराज की रक्षा

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 23 || अम्बिका वन में अजगर से नन्‍दराज की रक्षा तथा सुदर्शन-नामक विद्याधर का उद्धार श्रीनारदजी कहते हैं:- नरेश्वर, एक समय वृषभानु और उपनन्‍द आदि गोपगण रत्‍नों से भरे हुए छकडों पर सवार होकर अम्बिका वन में आये।  वहाँ भगवती भ्रदकाली और भगवान पशुपति का विधिपूर्वक पूजन करके उन्‍होंने ब्राह्मणों को दान दिया और रात में एक सर्प निकला और उसने नन्‍द का पैर पकड़ लिया।  नन्‍द अत्‍यंत भय से विह्वल हो- कृष्‍ण-कृष्‍ण' पुकारने लगे।  नरेश्वर, उस समय ग्‍वाल-बालों ने जलती हुई लकडियाँ लेकर उसी से उस अजगर को मारना शुरू किया, तो भी उसने नन्‍द का पाँव उसी तरह नहीं छोडा, जैसे मणिधर साँप अपनी मणि को नहीं छोड़ता।  तब लोकपावन भगवान ने उस सर्प को तत्‍काल पैर से मारा, पैर से मारते ही वह सर्प का शरीर त्‍याग कर कृतकृत्‍य विद्याधर हो गया।  उसने श्रीकृष्‍ण को नमस्‍कार करके उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा। सुदर्शन बोला:- प्रभो, मेरा नाम सुदर्शन है, मैं विद्याधरों का मुखिया हूँ, मुझे अपने बल का बड़ा घमंड था और मैंने अष्‍टावक्र मुनि को देखकर उनकी हँस...