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Showing posts from February, 2022

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 22 || सुदामा ब्राह्मण का उपाख्‍यान

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 22 || सुदामा ब्राह्मण का उपाख्‍यान श्रीनारदजी कहते हैं- सुदामा नामक श्रीकृष्‍ण के एक ब्राह्मण सखा थे। वे अपनी पत्‍नी सत्‍या के साथ अपने नगर में रहने थे। सुदामा वेद-वेदांग के पारंगत थे, परंतु धनहीन थे और थे वैराग्‍यवान। वे अपनी अनकूल पत्‍नी के साथ अयाचित वृति के द्वारा जीवन-निर्वाह करते। सुदामा ने एक दिन दरिद्रता से उत्‍पीड़ित दु:खिनी अपनी पत्‍नी से कहा- ‘पतिव्रते ! द्वारकाधीश श्रीकृष्‍ण मेरे मित्र हैं, सांदीपनि गुरु के घर में मैंने उनके साथ विद्याध्‍ययन किया है; परंतु श्रीकृष्‍ण के भोज, वृष्णि और अन्‍धकों के अधीश्‍वर होने के बाद मेरा उनसे मिलना नहीं हुआ। वे त्रिलोकी के नाथ भगवान दु:खहारी और दीनवत्‍सल है।  पति के वचन सुनकर पतिव्रता सत्‍या ने, जिसका कण्‍ठ सूख रहा था, जो फटे-पुराने कपडे़ पहने हुए थी, भूख से अत्‍यन्‍त पीड़ित थी, पतिदेव से कहा- ‘ब्रह्मान’ जब साक्षात श्रीहरि आपके सखा हैं, तब हम लोग फटे चिथडे़ पहने और भूखे क्‍यों रहें ? लोग द्वारका जाकर साक्षात कमलापति के दर्शन करते हैं और धनवान होकर घर लौटते; अतएव आप भी वहाँ जाइये।  सुदामा ने कहा- मै...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 21 || तृतीय दुर्ग के द्वार-देवताओं के दर्शन और पूजन की महिमा तथा पिण्‍डारक-तीर्थ का माहात्‍म्‍य

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 21 || तृतीय दुर्ग के द्वार-देवताओं के दर्शन और पूजन की महिमा तथा पिण्‍डारक-तीर्थ का माहात्‍म्‍य श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तृतीय दुर्ग के पूर्वद्वार पर महाबली हनुमानजी अहर्निश पहरा देते हैं। जो मनुष्‍य वहाँ महाबली भगवद्भक्‍त हनुमानजी का दर्शन कर लेता है, वह हनुमानजी की ही भाँति महान भगवद्भक्‍त होता है।  इसी प्रकार दक्षिणद्वार की सुदर्शनचक्र दिन-रात रक्षा करता है। राजन् ! उस सुदर्शन का चित्त सदा श्रीकृष्‍ण में ही लगा रहता है। उसके दर्शनमात्र से मानव श्रीहरि का उत्तम भक्‍त होता है। सुदर्शनचक्र उस भक्‍त की भी सदा रक्षा किया करता है।  इसी तरह पश्चिमद्वार की बलवान ऋक्षराज जाम्‍बवान रक्षा करते हैं। राजन् ! वे निरन्‍तर भगवद्भजन में लगे रहते हैं। उन महाबली भगवदभक्त जाम्‍बवान् का दर्शन करके मनुष्‍य इस लोक में चिरंजीवी तथा श्रीहरि का भक्‍त होता है। इस प्रकार महाबली विष्‍वक्सेन उत्तर द्वार की अहर्निश रक्षा करते हैं। राजन् ! श्रीकृष्‍ण के विशाल हृदय हैं। उनके दर्शनमात्र से मनुष्‍य कृतार्थ हो जाता है।  दुर्ग से बाहर ‘पिण्‍डारक-तीर्थ’ है, उसकी महिमा सुनो...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 20 || इन्‍द्रतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, सूर्यकुण्‍ड नीललोहित-तीर्थ और सप्‍तसामुद्रक-तीर्थ का माहात्‍म्‍य

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 20 || इन्‍द्रतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, सूर्यकुण्‍ड नीललोहित-तीर्थ और सप्‍तसामुद्रक-तीर्थ का माहात्‍म्‍य  श्रीनारदजी कहते हैं- विदेहराज ! द्वितीय दुर्ग के भी पूर्वद्वार पर पुण्‍यमय ‘इन्‍द्रतीर्थ’ है, जो अभीष्‍ट भोगों का देने वाला तथा सिद्धिदायक है। राजन् ! उस तीर्थ में स्‍नान करके मनुष्‍य इन्‍द्रलोक को जाता है तथा इस लोक में भी चन्‍द्रमा के समान उज्‍ज्‍वल वैभव प्राप्‍त कर लेता है।  इसी प्रकार दक्षिण द्वार पर ‘सूर्यकुण्‍ड’ नामक तीर्थ बताया जाता है, जहाँ सत्राजित ने स्‍यमन्‍तक की पूजा की थी। नृपेश्‍वर ! वहाँ स्‍नान करके जो मनुष्‍य पद्मरागमणि का दान करता है, वह सू्र्य के समान तेजस्‍वी विमान के द्वारा सूर्य लोक को जाता है।  इसी प्रकार पश्चिमद्वार ‘ब्रह्मतीर्थ’ नामक एक विशिष्‍ट तीर्थ है। राजन ! जो बुद्धिमान मानव वहाँ स्‍नान करके सोने के पात्र में खीर का दान करता है, उसके पुण्‍यफल का वर्णन सुनो। वह ब्रह्माघाती, पितृघाती, गोहत्‍यारा, मातृहत्‍यारा और आचार्य का वध करने वाला पापी भी क्‍यों ने हो, इन्‍द्रलोक में पैर रखकर ब्रह्ममय शरीर धारण करके चन्‍द्रमा के ...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! द्वारावती मण्‍डल सौ योजन विस्‍तृत है। उनकी पूरी परिक्रमा चार सौ योजनों की है। उसके बीच में श्रीकृष्‍ण निमित दुर्ग बारह योजन विस्‍तृत है। दूसरा बाहरी दुर्ग नब्‍बे कोसों में महात्‍मा श्रीकृष्‍ण द्वारा निर्मित हुआ है, जो शत्रुओं के लिये दुर्लंघय है। राजन! तीसरा बाहरी दुर्ग दो कम दो सौ कोसों में सं‍घटित हुआ है, जिसमें रत्‍नमय प्रासादों का निर्माण हुआ था। इनके अन्‍तर्दुर्ग भी महात्‍मा श्रीकृष्‍ण के नौ लाख विचित्र मन्दिर हैं।  वहाँ राधा-मन्दिर के द्वार पर ‘लीला-सरोवर’ है जो समस्‍त तीर्थों में उत्तम माना गया है। राजन ! उसका गोलोक से आगमन हुआ है। उसमें स्‍नान करके व्रत धारणपूर्वक एकाग्रचित्त हो, अष्‍टमी तिथि को विधिवत सुवर्ण का दान दे, तीर्थ को नमस्‍कार करे तो पापी मनुष्‍य भी कोटिजन्‍मों के किये हुए पापों से मुक्‍त हो जाता है- इसमें संशय नहीं है। प्राणान्‍त होने पर उस मनुष्‍य को लेने के लिये निश्‍चय ही गोलोक से एक व...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 18 || सिद्धाश्रम में व्रजांगनाओं तथा सोलह सहस्‍त्र रानियों के साथ श्‍यामसुन्‍दर की रासक्रीड़ा का वर्णन तथा श्रीराधा के मुख से वृन्‍दावन के रास की उत्‍कृष्‍टता का प्रतिपादन

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 18 || सिद्धाश्रम में व्रजांगनाओं तथा सोलह सहस्‍त्र रानियों के साथ श्‍यामसुन्‍दर की रासक्रीड़ा का वर्णन तथा श्रीराधा के मुख से वृन्‍दावन के रास की उत्‍कृष्‍टता का प्रतिपादन  श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! श्रीराधा और गोपीगणों आदि राजकुमारियों ने रासक्रीड़ा देखने के लिये उत्‍सुक हो श्रीहरि से कहा।  पटरानियां बोलीं- श्‍यामसुन्‍दर ! तुममें प्रेम लक्षणाभक्ति रखने वाली गोपसुन्‍दरियां धन्‍य हैं, जो रास-रंग में सम्मिलित हुई थीं। इन सबके तप का क्‍या वर्णन हो सकता है। माधव ! प्रभो ! यदि तुम हमारी प्रार्थना स्‍वीकार करो तो, वृन्‍दावन में तुमने जिस चाहती हैं। तुम यहीं हो, श्रीराधा यहीं विराज रही हैं, सम्‍पूर्ण गोपसुन्‍दरियां एवं व्रजांगनाओं भी यहीं रास का आयोजन सर्वथा उचित होगा। जगन्‍नाथ ! तुम हमारे इस मनोरथ को पूर्ण करो। मनोहर ! प्राणवल्‍लभ ! हमने दूसरा कोई मनोरथ नहीं प्रकट किया है, केवल रासक्रीड़ा का दर्शन कराओं। रानियों का यह बात सुनकर भगवान हँसने लगे। उन्‍होंने प्रेमपूरित होकर उन सबको अपने वचनों द्वारा मोहित-सी करते हुए कहा।  श्रीभगवान बोले- अंगनाओं !...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 17 || सिद्धाश्रम में राधा और श्रीकृष्‍ण का मिलन; श्रीकृष्‍ण की रानियों का श्रीराधा को अपने शिविर में बुलाकर उनका सत्‍कार करना तथा श्रीहरि द्वारा उनकी उत्‍कृष्‍ट प्रीति का प्रकाशन

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 17 || सिद्धाश्रम में राधा और श्रीकृष्‍ण का मिलन; श्रीकृष्‍ण की रानियों का श्रीराधा को अपने शिविर में बुलाकर उनका सत्‍कार करना तथा श्रीहरि द्वारा उनकी उत्‍कृष्‍ट प्रीति का प्रकाशन श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! पटरानियों सहित श्रीकृष्‍ण को आया देख गोपांगनाएं अत्‍यन्‍त हर्ष से खिल उठीं और हाथ जोड़, श्रीहरि की परिक्रमा करके अपने कमलोपम नेत्रों से आनन्‍द के आंसू बहाने लगीं। उन्‍होंने श्रीकृष्‍ण के बैठने के लिये एक सोन का सिंहासन दिया, जिसके पायों में स्‍यमन्‍तकमणि जड़ी हुई थी। पार्श्‍वभाग में चिन्‍तामणि जगमगा रही थी, मध्‍यभाग में पद्मरागमणि शोभा दे रही थी। वह सिंहासन चन्‍द्रमण्‍डल के समान गोलाकार था। उसकी पादपीठिका में कौस्‍तुभ-मणियां जड़ी गयी थी। वह सिंहासन कुण्‍डमण्‍डल से मण्डित था; पारिजात के पुष्‍पों से सज्जित और अमृतवर्षी छत्र से अलंकृत था।  उन्‍हें सिंहासन देकर श्रीराधा हासयुक्‍त मुख से बोलीं- ‘आज मेरा जन्‍म सफल हो गया आज मेरी तपस्‍या का फल मिल गया। श्रीहरे ! तुम आ गये तो आज मेरा धर्म-कर्म सफल हो गया। श्रीसिद्धाश्रम का स्‍नान धन्‍य है, जिसमें मेरा म...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 16 || सिद्धाश्रम की महिमा के प्रसंग में श्रीराधा और गोपांगनाओं के साथ श्रीकृष्‍ण और उनकी सोलह हजार रानियों का समागम

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 16 || सिद्धाश्रम की महिमा के प्रसंग में श्रीराधा और गोपांगनाओं के साथ श्रीकृष्‍ण और उनकी सोलह हजार रानियों का समागम  नारदजी कहते हैं- महामते विदेहराज ! अब सिद्धाश्रम का माहात्‍म्‍य सुनो, जिसका स्‍मरण करने मात्र से समस्‍त पाप छूट जाते हैं। जिसके स्‍पर्शमात्र से साक्षात श्रीहरि से कभी वियोग नहीं होता, उसी तीर्थ को पुराणवेता पुरुष ‘सद्धाश्रम’ कहते हैं। जिसके दर्शन से सालोक्‍य, स्‍पर्श से सामीप्‍य, जिसमें स्‍नान करने से सारुप्‍य और जहाँ निवास करन से सायुज्‍य मोक्ष की प्राप्ति है, उसे ही ‘सिद्धाश्रम’ जानो।  एक समय चद्ररानना सखी के मुख से सिद्धाश्रम तीर्थ का महात्‍मय सुनकर श्रीकृष्‍ण के वियोग से व्‍याकुल हुई श्रीराधा ने उसमें नहाने का विचार किया। वैशाख मास में सूर्य ग्रहण के पर्व पर सिद्धाश्रम तीर्थ की यात्रा के लिये कदल-वन से उठकर श्रीराधा ने गोपांगनाओं के सौ यूथ और समस्‍त गोपगणों के साथ वहाँ जाने का मन-ही-मन निश्‍चय किया। श्रीदामा के शाप के कारण होने वाले श्रीकृष्‍ण वियोग के सौ वर्ष बीत चुके थे। श्रीराधिका शिविका में आरुढ़ हुई। उन पर छत्र-चंवर डुलाय...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 15 || यज्ञतीर्थ, कपिटंकतीर्थ, नृगकूप, गोपीभूमि तथा गोपीचन्‍दन की महिमा

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 15 ||  यज्ञतीर्थ, कपिटंकतीर्थ, नृगकूप, गोपीभूमि तथा गोपीचन्‍दन की महिमा द्वारका की मिट्टी के स्‍पर्श से एक महान पापी का उद्धार  श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस पर्वत पर पूर्वकाल में राजा रैवत ने यज्ञतीर्थ का निर्माण किया, जहाँ एक यज्ञ करके मनुष्‍य कोटियज्ञों का फल पाता है वहीं ‘कपिटंक’ नामक तीर्थ है, जो एक कपि के मार गिराये जाने से प्रकट हुआ था। राजन् ! रैवतक गिरि पर वह तीर्थ सब पापों का नाश करने वाला है।  भौमासुर का सखा एक द्विविद नामक वानर था, जो बड़ा ही दुष्‍ट था। उसे बलरामजी ने वज्र के समान चोट करने वाले मुक्‍के से जहाँ मारा था, वही स्‍थान ‘कपिटंक तीर्थ’ है। वही वानर सत्‍पुरुषों की अवहेलना करने वाला था, तो भी वहाँ मारे जाने से तत्‍काल मुक्‍त हो गया। नरेश्‍वर ! उस तीर्थ में स्‍नान करने के लिये सदा देवता लोग आया करते हैं। ‘कलविंग तीर्थ’ की यात्रा करने पर कोटि गोदान का फल प्राप्‍त होता है। इससे दूना पुण्‍य शुभ दण्‍डकारण्‍य की यात्रा करने पर मिलता है। उससे भी चौगुना पुण्‍य सैन्‍धव नामक विशाल वन की यात्रा करने पर सुलभ होता है। अपेक्षा पांच गुन...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य श्रीनारदजी कहते हैं- सबको सम्‍मान देने वाले नरेश ! अब द्वारावती और समुद्र के माहत्‍म्‍य का वर्णन सुनो, जो सब पापों को हर लेने वाला, पुण्‍यदायक तथा उन तीर्थों में स्‍नान का फल देने वाला है।  महीपते ! जो वैशाख मास की पूर्णमासी को व्रत रहकर, स्‍नान पूर्वक नदीपति समुद्र का विधिवत पूजन और उसे नमस्‍कार करके रत्‍नों का दान करता है, उसके शरीर में तीनों देवता (ब्रह्मा, विष्‍णु, महेश) निवास करते हैं तथा उसके दर्शन मात्र से मनुष्‍य कृतार्थ हो जाता है। इतना ही नहीं– उसके शरीर के स्‍पर्श से तत्‍काल ब्रह्महत्‍या छूट जाती है तथा वह जहाँ-जहाँ जाता है वहाँ-वहाँ की भूमि मंगलमयी हो जाती है। जगत वध करने वाला पापी मनुष्‍य भी उसका दर्शन करके करने पर अपने पाप-समूह का उच्‍छेद कर डालता और परम मोक्ष को प्राप्‍त होता है।  मानद ! अब रैवत पर्वत का माहात्‍म्‍य सुनो, जो समस्‍त पापों को दूर करने वाला, पुण्‍यदायक तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। गौतम का पुत्र मेधावी बड़ा बुद्धिमान और विष्‍णु भक्‍त था। उसने सौ अयुत वर...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 13 || प्रभास, सरस्‍वती, बोधप्पिल और गोमती सिन्‍धु संगम का माहात्‍म्‍य

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 13 || प्रभास, सरस्‍वती, बोधप्पिल और गोमती सिन्‍धु संगम का माहात्‍म्‍य श्रीनारदजी कहते हैं- महामते ! विदेहराज ! प्रभासतीर्थ का भी माहात्‍म्‍य सुनो, जो सर्वपापापहारी, पुण्‍यदायक तथा तेज की वृद्धि करने वाला है। राजन् ! सिंह राशि में बृहस्‍पति के रहते गोदावरी में, कुम्‍भगत बृहस्‍पति होने पर हरक्षेत्र (हरद्वार) में, सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में और चन्‍द्रग्रहण के अवसर पर काशी में स्‍नान और दान करके मनुष्‍य जिस पुण्‍य को पाता है,उससे सौगुना पुण्‍य प्रभासक्षेत्र में प्रतिदिन स्‍नान करने से प्राप्‍त होता रहता है। दक्ष के शाप से राजयक्ष्‍मा नामक रोग हो जाने पर नक्षत्रों के स्‍वामी चन्‍द्रमा जहाँ स्‍नान करके तत्‍काल शाप-दोष से मुक्‍त हो गये और पुन: उनकी कलाओं का उदय हुआ, वही ’प्रभासतीर्थ’ है।  राजन्! उस तीर्थ में परम पुण्‍यमयी पश्चिमवाहिनी सरस्‍वती प्रवाहित होती हैं। उनके जल में स्‍नान करके पापी मनुष्‍य भी साक्षात ब्रह्ममय हो जाता है। नरेश्‍वर ! सरस्वती के तट पर ‘बोधप्पिल’ नाम से प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ भगवान श्रीकृष्‍ण ने उद्धव को परम कल्‍याणमय भागवत-धर्म का उ...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 12 || महामुनि‍ त्रित के शाप से कक्षीवान का शंक रूप होकर सरोवर में रहना और श्रीकृष्ण के द्वारा उसका उद्धार होना; शंखोद्धार-तीर्थ की महिमा

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 12 || महामुनि‍ त्रित के शाप से कक्षीवान का शंक रूप होकर सरोवर में रहना और श्रीकृष्ण के द्वारा उसका उद्धार होना; शंखोद्धार-तीर्थ की महिमा  श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! द्वारका में जो ‘शंखोद्धार’ नामक तीर्थ है, वह सब तीर्थों में प्रधान है। जो मनुष्‍य उस तीर्थ में स्‍नान करके सुवर्ण का दान देता है, वह सम्‍पूर्ण उपद्रवों से रहित विष्‍णुलोक में जाता है।  एक समय श्रीकृष्‍ण भक्त शान्‍तचित महामुनि‍ त्रित तीर्थयात्रा के प्रसंग से आनर्त देश में आये। वहाँ एक सुन्‍दर सरोवर देखकर मुनि ने उसमें स्‍नान करके श्रीहरि की पूजा की। उस पूजा में सुन्‍दर लक्षणों से युक्‍त जो महाशंक वे बजाया करते थे, उसे उन्‍हीं के शिष्‍य कक्षीवान ने अत्‍यन्‍त लोभ के कारण चुरा लिया। पूजा का शंख चुराया गया देखा मुनिवर त्रित कुपित होकर बोले- ‘जो मेरा शंख ले गये है, वह अवश्‍य ही शंख हो जाये।’ कक्षीवान् तत्‍काल शाप से पीड़ित हो शंख हो गया और गुरु के चरणों में गिरकर बोला- ‘भगवान ! मेरी रक्षा कीजिये। त्रितमुनि शीघ्र ही शान्‍त हो गये और बोले- ‘दुर्बुद्धे ! यह तुमने क्‍या किया ? चोरी के दोष से जा पा...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 11 || गज और ग्राह बने हुए मन्त्रियों का युद्ध और भगवान विष्‍णु के द्वारा उनका उद्धार

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 11 || गज और ग्राह बने हुए मन्त्रियों का युद्ध और भगवान विष्‍णु के द्वारा उनका उद्धार नारदजी कहते हैं- राजन! कुबेर के दोनों मन्‍त्री ब्राह्मण के शाप से मोहित होकर अत्‍यन्‍त दीन-दुखी हो गये। उस यज्ञ में साक्षात भगवान विष्णु पधारे थे। वे अपनी शरण में आये हुए उन दोनों मन्त्रियों से बोले।  श्रीभगवान ने कहा- मेरी अर्चना से युक्‍त इस यज्ञ में तुम दोनों को दु:ख उठाना पड़ा है। ब्राह्मणों की कही हुई बात को टाल देने या अन्‍यथा करने की शक्ति मुझ में नहीं है। तुम दोनों ग्राह और हाथी हो जाओ। जब कभी तुम दोनों में युद्ध छिड़ जायगा, तब मेरी कृपा से तुम दोनों अपने पूर्ववर्ती स्‍वरूप को प्राप्‍त हो जाओगे ।  नारदजी कहते हैं- राजन ! भगवान विष्णु के यों कहने पर राजाधिराज कुबेर के वे दोनों मन्‍त्री ग्राह और हाथी हो गये, परंतु उन्‍हें अपने पूर्वजन्‍म की बातों का स्‍मरण बना रहा। घण्‍टानाद ग्राह हो गया और सैकड़ों वर्षों तक गोमती में रहा। वह बड़ा विकराल, अत्‍यन्‍त भयंकर तथा सदा रौद्ररूप धारण किये रहता था। पार्श्‍वमौलि रैवतक पर्वत के जंगल में चार दॉतों वाला हाथी हुआ। उसके शरीर क...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 10 || द्वारकापुरी; गोमती और चक्रतीर्थ का महात्‍म्‍य;

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 10 || द्वारकापुरी, गोमती और चक्रतीर्थ का महात्‍म्‍य; कुबेर के वैष्‍णवयज्ञ में दुर्वासा मुनि द्वारा घण्‍टानाद और पार्श्‍वमौलि को शाप श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे  द्वारका  के आगमन का कारण बाताया, जो समस्‍त पापों को हर लेने वाला और पुण्‍यदायक है; अब तुम और क्‍या सुनना चाहते हो । बहुलाक्ष ने पूछा‌‌-  मुनिश्रेष्ठ! कल्याणस्वरूपा द्वारका से द्वारकानगरी की भमि सर्वतीर्थमयी है, अत: वहाँ के मुख्य-मुख्य तीर्थों को मुझे बताइये। श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! द्वारका से प्रभास तक की सीमा बनाकर जो तीर्थमयी यज्ञभूमि है, वही मोक्षदायिनी ‘द्वारका’ है। उसका विस्‍तार सौ योजन है। द्वारका नगरी का दर्शन करके नर  नारायण  हो जाता है। द्वारका में कोई गधा भी मर जाय तो वह चतुर्भुज होकर वैकुण्‍ठलोक में जाता है। जो द्वारका का दर्शन करता है, उसकी कथा सुनता है तथा कभी ’द्वारका’ इस नाम का उच्‍चारण करता है, अथवा वहाँ दर्शन– स्‍नान करके तिनके का भी दान करता है वह मृत्‍यु के पश्‍चात परमगति को प्राप्‍त होताहै। एक समय भक्‍त रेवत को प्रेमा...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 09 || द्वारकापुरी के पृथ्‍वी पर आने का कारण; राजा आनर्त की तपस्‍या और उन पर भगवान श्रीकृष्‍ण की कृपा

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 09 || द्वारकापुरी के पृथ्‍वी पर आने का कारण; राजा आनर्त की तपस्‍या और उन पर भगवान श्रीकृष्‍ण की कृपा बहुलाश्‍व बोले- मुने ! तीनों लोकों में विख्‍यात द्वारकापुरी धन्‍य है, जहाँ साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍ण निवास करते हैं। आपके मुख से सुना है कि द्वारकापुरी साक्षात श्रीकृष्‍ण के अंग से प्रकट हुई; प्रभो ! ब्रह्मन् ! किस काल में वह पुरी यहाँ आयी, यह मुझे बातइये । श्रीनारदजी ने कहा- राजन् ! तुम्‍हें साधुवाद है। तुमने बहुत अच्‍छा किया, जो द्वारका के यहाँ आगमन का कारण पूछा, जिसे सुनकर लोकघाती पातकी भी शुद्ध हो जाता है।  मनु के पुत्र शर्याति नामक एक राजा हुए जो चक्रवर्ती सम्राट थे। उन्‍होंने दस हजार वर्षों तक इस भूतल पर धर्मपूर्वक राज्‍य किया। उनके तीन पुत्र हुए, जो समस्‍त धर्म पुरुषों में श्रेष्‍ठ थे। उनके नाम थे- उतानबर्हि, अनार्त और भूरिषेण। राजा शर्याति ने उतानबर्हि को पूर्व दिशा, भूरिषेण को दक्षिण दिशा और आनर्त को सारी पश्चिम दिशा का राज्‍य दिया। फिर वे पुत्रों सेबोले- ‘यह सारी पृथ्‍वी मेरी है। मैंने धर्म पूर्वक इसका पालन किया है तथा बलिष्ठ होकर...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 08 || श्रीकृष्‍ण का सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के साथ विवाह

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 08 || श्रीकृष्‍ण का सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के साथ विवाह और उनकी संतति का वर्णन; प्रद्यम्न का प्राकट्य तथा रति और रुक्‍म–पुत्री के साथ उनका विवाह श्रीनारदजीकहते हैं- मिथिलेश्‍वर ! अब श्रीकृष्‍ण की अन्‍य पत्नियों के मंगलमय विवाह का वृत्तान्‍त सुनो, जो समस्‍त पापों को हर लेने वाला तथा आयु की वृद्धि का सर्वोत्तम साधन है।  सत्राजित नाम से प्रसिद्ध यादव को साक्षात भगवान सूर्य ने स्‍यमन्‍तक मणि दे रखी थी। भगवान श्रीकृष्‍ण ने राजा उग्रसेन के लिये वह मणि मांगी। मिथिलेश्‍वर ! सत्राजित ने द्रव्‍य के लोभ से वह मणि नहीं दी; क्‍योंकि उस मणि से प्रतिदनि आठ भार सुवर्ण स्‍वत: प्राप्‍त होता रहता था। एक दि‍न सत्राजित का भाई प्रसेन उस मणि को अपने कण्‍ठ में बांधकर सिन्‍धुदेशीय अश्‍व पर आरुढ़ हो शिकार खेलने के लिये वन में विचरने लगा। वहाँ एकसिंह ने प्रसेन को मार डाला। फिर उस सिंह को भी जाम्‍बवान ने मारा और तत्‍काल उस मणि को कंठ में धारण करके वन में गया था, किंतु श्रीकृष्‍ण ने वहाँ उसका वध कर दिया; इसीलिए आज सबेरे वह सभा भवन में नहीं आया’। भगवान पर कलंक का टीका लग गया। ...

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 07 || श्रीकृष्‍ण के हाथों से रुक्मी की पराजय

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 07 || श्रीकृष्‍ण के हाथों से रुक्मी की पराजय तथा द्वारका में रुक्मिणी और श्रीकृष्‍ण का विवाह श्रीनारदजी कहते हैं-   रुक्मिणी  के हरण और मित्रों की पराजय का वृतान्‍त सुनकर भीष्‍मकपुत्र रुक्‍मी ने समस्‍त भूपालों के सुनते हुए यह प्रतिज्ञा की- ‘राजाओं ! मैं आप लोगों के सामने यह सच्‍ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि युद्ध में  श्रीकृष्‍ण  को मारकर रुक्मिणी को लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करुँगा’।  यों कहकर उस महा उद्भट वीर ने दिव्‍य कवच धारण किया, जो ठोस एवं श्‍याम वर्ण का था। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह नील मेघ से नि‍र्मित हुआ हो। फिर उसने सिर पर सिन्‍धुदेशीय शिरस्‍त्राण (टोप) रखा; सौवीर देश का बना हुआ सुन्‍दर धनुष, लाट देश के दो तरकस, म्‍लेच्‍छ देश की तलवार, कुटल देश की ढाल, येठर की महाशक्ति, गुजरात की गदा, बंगाल का परिघ और कोंकण देश का हस्‍तत्राण (दस्‍ताना) धारण करके अंगुलियों में गोधा के चर्म से निर्मित अंगुलित्राण बाँध लिया और किरीट, रुक्‍मी ने युद्ध करने का निश्‍चय किया। फिर चंचल घोड़ों से युक्‍त जैत्ररथ पर आरुढ़ हो...