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02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 09 || ब्रह्माजी के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति

श्री गर्ग संहिता  02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 09 || ब्रह्माजी के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति  ब्रह्मोवाचः कृष्‍णाय मेघवपुषे चपलाम्‍बराय पीयूषमिष्‍टवचनाय परात्‍पराय। वंशीधराय शिखिचन्‍द्रकयान्विताय देवाय भ्रातसहिताय नमोअस्‍तु तस्‍मै॥ ब्रह्माजी बोले:- ‘मेघ की-सी कांति से युक्त विद्युत-वर्णन का वस्र धारण करने वाले, अमृत-तुल्य मीठी वाणी बोलने वाले, परात्पर, वंशीधारी, मयूर-पिच्छ को धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण को उनके भ्राता बलराम सहित नमस्कार है।  श्रीकृष्ण (आप) साक्षात स्वयं पुरुषोत्तम, पूर्ण परमेश्वर, प्रकृति से अतीत श्री हरि हैं। हम देवता जिनके अंश और कलावतार हैं, जिनकी शक्ति से हम लोग क्रमश: विश्व की सृष्टि, पालन एवं संहार करते हैं, उन्हीं आपने साक्षात कृष्णचन्द्र के रूप में अवर्तीण होकर धराधाम पर नन्द का पुत्र होना स्वीकार किया है। आप प्रधान-प्रधान गोप-बालकों के साथ गोप वेष से वृन्दावन में गोचारण करते हुए विराज रहे हैं। करोड़ों कामदेव के समान रमणीय, तेजोमय, कौस्तुभधारी, श्यामवर्ण, पीतवस्त्रधारी, वंशीधर, व्रजेश, राधिकापति, निकुंजविहारी, परम सुन्दर श्री हरि को मैं प...