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07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 29 || प्रद्युम्न की हिरण्‍मयवर्ष पर विजय; मधुमक्खियों और वानरों के आक्रमण से छुटकारा; राजा देवसख से भेंट की प्राप्ति तथा चन्‍द्रकान्‍ता नदी में स्‍न्नान

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 29 || प्रद्युम्न की हिरण्‍मयवर्ष पर विजय; मधुमक्खियों और वानरों के आक्रमण से छुटकारा; राजा देवसख से भेंट की प्राप्ति तथा चन्‍द्रकान्‍ता नदी में स्‍न्नान श्री नारदजी कहते हैं- राजन् ! महाबाहु श्रीकृष्‍ण कुमार प्रद्युम्न उत्तरकुरुवर्ष पर विजय पाकर ‘हिरण्‍मय’ नामक वर्ष को जीतने के लिये गये, जहाँ ‘स्‍त्रोत’ नाम का विशाल एवं दीप्तिमान सीमा पर्वत शोभा पाता है। वहाँ कूर्मावतारधारी साक्षात भगवान श्रीहरि विराजते हैं और अर्यमा उनकी आराधना में रहते हैं। हिरण्‍मय वर्ष में ‘पुष्‍पमाला’ नदी के तट पर ‘चित्रवन’ नाम से प्रसिद्ध एक विशाल वन है, जो फूलों और फलों के भार से लदा रहता है। कंद और मूल की तो वह स्‍वत: निधि ही है। मैथिलेश्वर ! वहाँ नल और नील के वंशज वानर रहते हैं, जिन्‍हें त्रेतायुग में भगवान श्रीरामचन्‍द्रजी ने स्‍थापित किया था। सेना का कोलाहल सुनकर वे युद्ध की कामना से बाहर निकले और भौंहें टेढ़ी किये, क्रोध के वशीभूत हो, उछलते हुए प्रद्युम्न की सेना पर टूट पड़े। नरेश्वर ! वे नखों, दाँतों और पूँछों से घोड़ों, हाथियों और मनुष्‍यों को घायल करने लगे। रथों को अपनी पूँछो...