07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 34 || अनिरुद्ध के हाथ से वृक दैत्य का वध
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 34 || अनिरुद्ध के हाथ से वृक दैत्य का वध श्रीनारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर ! संग्रामजित के द्वारा उस महायुद्ध में भूत-संतापन के मारे जाने पर दैत्य सेनाओं में महान हाहाकार मच गया। तब शकुनि, वृक, कालनाभ और महानाभ तथा हरिशमश्रु ये पांच वीर रण भूमि में उतरे। श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न शकुनि के साथ युद्ध करने लगे और अनिरुद्ध वृक के साथ। साम्बकाल नाभ से और दीप्तिमान महानाभ से भिड़ गये। बलवान वीर श्रीकृष्णकुमार भानु हरिशमश्रु नामक असुर के साथ लड़ने लगे। सबके आगे थे धनुर्धरों में श्रेष्ठ अनिरुद्ध। वे अपने बाणों द्वारा दैत्यों को उसी प्रकार विदीर्ण करने लगे, जैसे इन्द्र वज्र से पर्वतों का भेदन करते हैं। अनिरुद्ध के बाणों से दैत्यों के पैर, कंधे और घुटने कट गये। वे सब के सब मूर्च्छित हो तेज हवा के उखाड़े हुए वृक्षों की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े। अनिरुद्ध के तीखे बाणों से जिनके मेघडम्बर (हौदे), कुम्भ स्थल और सूंड़े छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, दाँत टूट गये और कक्ष कट गये थे, वे हाथी रणभूमि में उसी प्रकार गिरे, जैसे वज्र के आघात से पर्वत ढह जाते हैं। हाथियों के दो ...