01. गोलोक खण्ड || अध्याय 14 || शकट भंजन; उत्कच और तृणार्वत का उद्धार; दोनों के पूर्वजन्मों का वर्णन
गर्ग संहिता 01. गोलोक खण्ड || अध्याय 14 || शकट भंजन; उत्कच और तृणार्वत का उद्धार; दोनों के पूर्वजन्मों का वर्णन श्री गर्गजी ने कहा- शौनक ! इस प्रकार मैंने भगवान श्री कृष्ण के सर्वोत्कृष्ट दिव्य चरित्र का वर्णन किया। जो मनुष्य भक्ति पूर्वक इसका श्रवण करता है, वह कृतार्थ है, उसे परम पुरुषार्थ प्राप्त हो गया- इसमें संशय नहीं है। श्री शौनक जी बोले- मुने ! भगवान श्री कृष्ण का मंगलमय चरित्र अमृत-रस से तैयार की हुई परम मधुर खाँड़ है। इसे साक्षात आपके मुख से सुनकर हम कृतार्थ हो गये। तपोधन ! संतों में श्रेष्ठ राजा बहुलाश्व भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। उनके मन में सदा शांति बनी रहती थी। इसके बाद उन्होंने मुनिवर नारद जी कौन-सी बात पूछी, यह मुझे बताने की कृपा कीजिये। श्री गर्ग जी ने कहा- शौनक ! तदनंतर मिथिला के महाराज बहुलाश्व हर्ष से उत्फुल्ल और प्रेम से विह्वल हो गये। फिर उन धर्मात्मा नरेश ने परिपूर्णतम भगवान श्री कृष्ण का चिंतन करते हुए नारद जी से कहा। राजा बहुलाश्व बोले- मुने ! आपने भूरि-भूरि पुण्य कर्म किये हैं। आपके सम्पर्क से मैं ...