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09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 08 || पूजा-विधि का वर्णन

09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 08 || पूजा-विधि का वर्णन श्रीव्‍यासजी बोले- तदनन्‍तर स्नान एवं नित्‍य नैमितिक क्रिया का सम्‍पादन करके शुद्ध स्‍थण्डिल पर पाँच रंगों से युक्त मण्‍डल बनाये। वेद की ऋचाओं द्वारा विधिवत मंगलमय दिव्‍य उज्‍जवल कमल की रचना करे। उसमें बत्तीस दल हों और वह केसर और कर्णिका से युक्त हो। राजन् ! कर्णिका के ऊपर श्रीहरि का सुन्‍दर सिंहासन स्‍थापित करे। उस पर राधा, रमा, भूदेवी और विरजा की स्‍थापना करे। उन देवियों के मध्‍य में साक्षात पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्‍ण को प्रतिष्ठित करे। कमल के आठ दलों में राधिकाजी की मंगलमयी आठ सुन्‍दरी सखियाँ रहें। इसके बाद आठ दलों में भगवान श्रीकृष्‍ण के सखाओं की स्‍थापना करे। इसी प्रकार सोलह दलों पर सखियों के दो-दो समुदाय रहें। फिर बुद्धिमान पुरुष कमल के समीप शंख, चक्र, गदा, पद्म, नन्‍दक नामक तलवार, शागर्ड धनुष, बाण, हल, मुसल, कौस्‍तुभमणि, वनमाला, श्रीवत्‍स, नीलाम्‍बर, पीताम्‍बर, वंशी और बेंत- इन सबको स्‍थापित करे। फिर उसके पार्श्व में तालध्‍वज एवं गरुड़ध्‍वज से युक्त रथ, सुमति एवं दारुक नाम वाले सारथि, गरुड़, कुमुद, नन्‍द, सुनन्‍द, चण्‍ड, ...