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10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 60 || कौरवों के संहार, पाण्‍डवों के स्‍वर्गगमन तथा यादवों के संहार आदि का संक्षिप्‍त वृत्‍तान्‍त; श्रीराधा तथा व्रजवासियों सहित भगवान श्रीकृष्‍ण का गोलोकधाम में गमन

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 60 || कौरवों के संहार, पाण्‍डवों के स्‍वर्गगमन तथा यादवों के संहार आदि का संक्षिप्‍त वृत्‍तान्‍त; श्रीराधा तथा व्रजवासियों सहित भगवान श्रीकृष्‍ण का गोलोकधाम में गमन श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! व्‍यासजी के मुख से इस प्रकार श्रीकृष्‍ण सहस्‍त्रनाम का निरूपण सुनकर यादवेन्‍द्र उग्रसेन ने उनकी पूजा करके भगवान श्रीकृष्‍ण में भक्‍तिपूर्वक मन लगाया। तदनन्‍तर भगवान श्रीकृष्‍ण ने मिथिला में जाकर राजा बहुलाश्‍व तथा श्रुतदेव को दर्शन दिया। इसके बाद वे द्वारकापुरी को लौट आये। तत्‍पश्‍चात समस्‍त पाण्‍डव अपनी पत्‍नी द्रौपदी के साथ द्वारका से निकलकर वन-वन में विचरने लगे। नरेश्‍वर ! वनवास और अज्ञातवास का कष्‍ट भोगकर वे सब सेना सहित विराट नगर में एकत्र हुए। इधर श्रीकृष्‍ण के प्रार्थना करने पर भी समस्‍त कौरवों ने पाण्‍डवों को उनके राज्‍य के आधे के आधे का आधा भी नहीं दिया। तब पाण्‍डवों और कौरवों में युद्ध होना अनिवार्य हो गया। यह जानकर श्रीकृष्‍ण ने हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा कर ली और बलरामजी तीर्थ यात्रा को चले गये। उसी यात्रा में उन्‍होंने रोमहर्षण सुत और बल्‍वल को मार डाला...