09. श्रीविज्ञान खण्ड || अध्याय 07 || नित्यकर्म और पूजा-विधि का वर्णन
09. श्रीविज्ञान खण्ड || अध्याय 07 || नित्यकर्म और पूजा-विधि का वर्णन श्रीवेदव्यासजी बोले- राजन् ! ब्राह्ममुहूर्त में उठकर भगवान गोविन्द, गुरुदेव और कश्यप आदि ऋषियों नामों का बारंबार उच्चारण करे। तत्पश्चात् वह हरिभक्त भूमि को प्रणाम करके जमीन पर पैर रखे। फिर वह सकाम भक्त आचमन करके तत्काल आनन्दपूर्वक आसन पर बैठ जाय। हाथों को गोद में रखकर श्वास रोक कर (गुरुदेव का) ध्यान करे– ‘भगवान गुरुदेव ज्ञान मुद्रा धारण किये हुए हैं, उनका स्वरूप अत्यंत शान्त है और वे स्वस्तिकासन से विराज रहे हैं। यों गुरुदेव का ध्यान करने के पश्चात् भक्त एकाग्र-मन होकर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का ध्यान करे ‘श्रीकृष्णचन्द्र की अवस्था किशोर है, श्यामल श्री विग्रह है, जो करों में वंशी एवं बेंत से विभूषित, अत्यन्त ही मनोहर है इस प्रकार श्रीहरि का ध्यान करने के पश्चात् बाहर चला जाय। महाराज ! गृहस्थ पुरुष कैसे पवित्र होता है- अब उस विधान को पूरा पूरा सुनो। मिट्टी लेकर ‘अश्वक्रान्ते’ इत्यादि मन्त्र से शौच के अन्त में एक बार लिंग में, तीन बार गुदा में, दस बार बायें हाथ में, सात बार दो...