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06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 17 || सिद्धाश्रम में राधा और श्रीकृष्‍ण का मिलन; श्रीकृष्‍ण की रानियों का श्रीराधा को अपने शिविर में बुलाकर उनका सत्‍कार करना तथा श्रीहरि द्वारा उनकी उत्‍कृष्‍ट प्रीति का प्रकाशन

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 17 || सिद्धाश्रम में राधा और श्रीकृष्‍ण का मिलन; श्रीकृष्‍ण की रानियों का श्रीराधा को अपने शिविर में बुलाकर उनका सत्‍कार करना तथा श्रीहरि द्वारा उनकी उत्‍कृष्‍ट प्रीति का प्रकाशन श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! पटरानियों सहित श्रीकृष्‍ण को आया देख गोपांगनाएं अत्‍यन्‍त हर्ष से खिल उठीं और हाथ जोड़, श्रीहरि की परिक्रमा करके अपने कमलोपम नेत्रों से आनन्‍द के आंसू बहाने लगीं। उन्‍होंने श्रीकृष्‍ण के बैठने के लिये एक सोन का सिंहासन दिया, जिसके पायों में स्‍यमन्‍तकमणि जड़ी हुई थी। पार्श्‍वभाग में चिन्‍तामणि जगमगा रही थी, मध्‍यभाग में पद्मरागमणि शोभा दे रही थी। वह सिंहासन चन्‍द्रमण्‍डल के समान गोलाकार था। उसकी पादपीठिका में कौस्‍तुभ-मणियां जड़ी गयी थी। वह सिंहासन कुण्‍डमण्‍डल से मण्डित था; पारिजात के पुष्‍पों से सज्जित और अमृतवर्षी छत्र से अलंकृत था।  उन्‍हें सिंहासन देकर श्रीराधा हासयुक्‍त मुख से बोलीं- ‘आज मेरा जन्‍म सफल हो गया आज मेरी तपस्‍या का फल मिल गया। श्रीहरे ! तुम आ गये तो आज मेरा धर्म-कर्म सफल हो गया। श्रीसिद्धाश्रम का स्‍नान धन्‍य है, जिसमें मेरा म...