02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 21 || गोपंगनाओं के साथ श्रीकृष्ण का वन-विहार, रास-क्रीड़ा; मानवती गोपियों को छोड़कर श्रीराधा के साथ एकांत-विहार तथा मानिनी श्रीराधा को भी छोड़कर उनका अंतर्धान होना
श्री गर्ग संहिता 02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 21 || गोपंगनाओं के साथ श्रीकृष्ण का वन-विहार, रास-क्रीड़ा; मानवती गोपियों को छोड़कर श्रीराधा के साथ एकांत-विहार तथा मानिनी श्रीराधा को भी छोड़कर उनका अंतर्धान होना श्री नारद जी कहते हैं:- नरेश्वर, इस प्रकार रमणीय कुमुदवन में मालती पुष्पों के सुन्दर वन में; आम, नारंगी तथा नीबुओं के सघन उपवन में; अनार, दाख और बादामों के विपिन में; कदम्ब, श्रीफल (बेल) और कुटुजों के कानन में; बरगद, कटहल और पीपलों के सुन्दर वन में; तुलसी, कोविदर, केतकी, कदली, करील-कुंज, बकुल (मौलिश्री) तथा मन्दारों के मनोहर विपिन में विचरते हुए श्यामसुन्दर व्रज वधूटियों के साथ कामवन में जा पहुँचे। वहीं एक पर्वत पर श्रीकृष्ण ने मधुर स्वर में बाँसुरी बजायी, उसकी मोहक तान सुनकर व्रज सुन्दरियाँ मूर्च्छित और विव्हल हो गयीं। राजन, आकाश में देवताओं के साथ विमानों पर बैठी हुई देवांगनाएँ भी मोहित हो गयीं। स्थावरों सहित चारों प्रकार के जीव समुदाय मोह को प्राप्त हो गये, नदियों और नदों का पानी स्थिर हो गया तथा पर्वत भी पिघलने लगे, कामवन की पहाड़ी श्यामसुन्दर के चरण चिन्हों से युक्त हो ग...