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Showing posts from October, 2021

01. गोलोक खण्ड || अध्याय 12 || श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव की धूम; गोप-गोपियों का उपायन लेकर आना

गर्ग संहिता 01. गोलोक खण्ड || अध्याय 12 || श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव की धूम; गोप-गोपियों का उपायन लेकर आना; नन्द और यशोदा-रोहिणी द्वारा सब का यथावत सत्कार; ब्राह्मण देवताओं का भी श्रीकृष्ण दर्शन के लिये आगमन श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! तदनंतर गोष्ठ में विद्यामान नन्दजी ने अपने घर में पुत्रोत्सव होने का समाचार सुनकर प्रात:काल ब्राह्मणों को बुलवाया और स्वस्तिवाचनपूर्वक मंगल कार्य कराया। विधिपूर्वक जातकर्म संस्कार सम्पन्न करके महामनस्वी नन्दराज ने ब्राह्मणों को आनन्दपूर्वक दक्षिणा देने के साथ ही एक लाख गौएँ दान की। एक कोस लम्बी भूमि में सत्प-धान्यों के पर्वत खड़े किये गये। उनके शिखर रत्नों और सुवर्णों से सज्जित किये गये। उनके साथ सरस एवं स्निग्ध पदार्थ भी थे। वे सब पर्वत नन्द जी ने विनीत भाव से ब्राह्मणों को दिये। मृदंग, वीणा, शंख और दुन्दुभि आदि बाजे बारम्बार बजाये जाने लगे। नन्द द्वार पर गायक मंगल-गीत गाने लगे। वारांगनाएं नृत्य करने लगीं। पताकाओं, सोने के कलशों, चँदोवों, सुन्दर बन्दनवारों तथा अनेक रंग के चित्रों से नन्द-मन्दिर उद्भासित होने लगा।  सड़कें, गलियाँ, द्वार-देहलियाँ, दीवारें,...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 17 || श्री यमुना का स्‍त्रोत

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 17 || श्री यमुना का स्‍त्रोत मांधाता बोले –  मुनिश्रेष्ठ सौभरे ! सम्‍पूर्ण सिद्धि प्रदान करने वाला जो यमुना जी का दिव्‍य उत्‍तम स्‍तोत्र है, उसका कृपापूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। श्रीसौभरि मुनि ने कहा–  महामते ! अब तुम सूर्यकन्‍या यमुना का स्‍तोत्र सुनो, जो इस भूतल पर समस्‍त सिद्धियों को देने वाला तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूप चारों पुरुषार्थों का फल देने वाला है। श्रीकृष्‍ण के बायें कंधे से प्रकट हुई ‘कृष्‍णा’ को सदा मेरा नमस्‍कार है। कृष्‍णे ! तुम श्रीकृष्‍णस्‍वरूपिणी हो, तुम्‍हें बारंबार नमस्‍कार है। जो पापरूपी पंकजल के कलंग से कुत्सित कामी कुबुद्धि मनुष्‍य सत्‍पुरुषों के साथ कलह करता है, उसे भी गूँजते हुए भ्रमर और जल पक्षियों से युक्‍त कलिन्‍द‍नन्दिनी यमुना वृन्‍दावनधाम प्रदान करती हैं। कृष्‍णे ! तुम्‍हीं साक्षात श्रीकृष्‍णस्‍वरूपा हो। तुम्‍हीं प्रलयसिन्‍धु के वेगयुक्‍त भँवर में महामत्‍स्‍यरूप धारण करके विराजती हो। तुम्‍हारी उर्मि-उर्मि में भगवान कूर्मरूप से वास करते हैं तथा तुम्‍हार...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 24 || अरिष्‍टासुर और व्‍योमासुर का वध

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 24 || अरिष्‍टासुर और व्‍योमासुर का वध तथा माधुर्य खण्‍ड का उपसंहार श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन्, एक दिन गोवर्धन के आस-पास बलराम सहित भगवान श्रीकृष्‍ण आँख मिचौनी का खेल खेलने लगे- जिसमें कोई चोर बनता है तो कोई रक्षक, वहाँ व्‍योमासुर नामक दैत्‍य आया।  उस खेल में कुछ लड़के भेड़ बनते थे और कोई चोर बनकर उन भेड़ों को ले जाकर कहीं छिपाता था।  व्‍योमासुर ने भेड़ बने हुए बहुत-से गोप-बालकों को बारी-बारी से ले जाकर पर्वत की कन्‍दरा में रखा और एक शिला से उसका द्वार बंद कर दिया।  वह मयासुर का महान बलवान पुत्र था, यह तो सचमुच चोर निकला, यह जानकर भगवान मधुसूदन ने उसे दोनों भुजाओं द्वारा पकड़ लिया और पृथ्‍वी पर दे मारा।  उस समय दैत्‍य मृत्‍यु को प्राप्‍त हो गया और उसके शरीर से निकला हुआ प्रकाशमान तेज दसों दिशाओं में घूमकर श्रीकृष्‍ण में लीन हो गया।  उस समय स्‍वर्ग में और पृथ्‍वी पर जय-जयकार की ध्‍वनि होने लगी, देवता लोग परम आनन्‍द में मग्‍न होकर फूल बरसाने लगे। बहुलाश्व ने पूछा;- मुने, यह व्‍योम नामक असुर पूर्वजन्‍म में कौन-सा पुण्‍य...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 23 || अम्बिका वन में अजगर से नन्‍दराज की रक्षा

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 23 || अम्बिका वन में अजगर से नन्‍दराज की रक्षा तथा सुदर्शन-नामक विद्याधर का उद्धार श्रीनारदजी कहते हैं:- नरेश्वर, एक समय वृषभानु और उपनन्‍द आदि गोपगण रत्‍नों से भरे हुए छकडों पर सवार होकर अम्बिका वन में आये।  वहाँ भगवती भ्रदकाली और भगवान पशुपति का विधिपूर्वक पूजन करके उन्‍होंने ब्राह्मणों को दान दिया और रात में एक सर्प निकला और उसने नन्‍द का पैर पकड़ लिया।  नन्‍द अत्‍यंत भय से विह्वल हो- कृष्‍ण-कृष्‍ण' पुकारने लगे।  नरेश्वर, उस समय ग्‍वाल-बालों ने जलती हुई लकडियाँ लेकर उसी से उस अजगर को मारना शुरू किया, तो भी उसने नन्‍द का पाँव उसी तरह नहीं छोडा, जैसे मणिधर साँप अपनी मणि को नहीं छोड़ता।  तब लोकपावन भगवान ने उस सर्प को तत्‍काल पैर से मारा, पैर से मारते ही वह सर्प का शरीर त्‍याग कर कृतकृत्‍य विद्याधर हो गया।  उसने श्रीकृष्‍ण को नमस्‍कार करके उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा। सुदर्शन बोला:- प्रभो, मेरा नाम सुदर्शन है, मैं विद्याधरों का मुखिया हूँ, मुझे अपने बल का बड़ा घमंड था और मैंने अष्‍टावक्र मुनि को देखकर उनकी हँस...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 22 || श्रीकृष्‍ण का नन्‍दराज को वरूणलोक से ले आना

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 22 || श्रीकृष्‍ण का नन्‍दराज को वरूणलोक से ले आना और गोप-गोपियों को वैकुण्‍ठधाम का दर्शन कराना। श्री नारद जी कहते हैं:- एक दिन की बात है, नन्‍दराज एकादशी का व्रत करके द्वादशी को निशीथ-काल में ही ग्‍वालों के साथ यमुना-स्‍नान के लिये गये और जल में उतरे, वहाँ वरूण का एक सेवक उन्‍हें पकड़कर वरूण-लोक में ले गया। मैथिलेश्वर, उस समय ग्‍वालों में कुहराम मच गया, तब उन सबको आश्वासन दे भगवान श्रीहरि वरूणपुरी में पधारे और उन्‍होंने सहास उस पुरी के दुर्ग को भस्‍म कर दिया। करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्‍वी श्रीहरि को अत्‍यन्‍त कुपित हुआ देख वरूण ने तिरस्‍कृत होकर उन्‍हें नमस्‍कार किया और उनकी परिक्रमा करके हाथ जोड़कर कहा। वरूण बोले - श्रीकृष्‍णचन्‍द्र को नमस्‍कार है, परिपूर्णतम परमात्‍मा तथा असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों का भरण-पोषण करने वाले गोलोकपति को नमस्‍कार है।  चतुर्व्‍यूह के रूप में प्रकट तेजोमय श्रीहरि को नमस्‍कार है। सर्वतेज: स्‍वरूप आप परमेश्वर को नमस्‍कार है, सर्वस्‍वरूप आप परब्रह्म परमात्‍मा को नमस्‍कार है।  मेरे किसी मूर्ख सेवक ने यह पहली आ...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 21 || दावानल से गौओं और ग्‍वालों का छुटकारा तथा विप्रपत्नियों को श्रीकृष्‍ण का दर्शन

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 21 || दावानल से गौओं और ग्‍वालों का छुटकारा तथा विप्रपत्नियों को श्रीकृष्‍ण का दर्शन श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन् , तदनन्‍तर श्रीबलराम सहित समस्‍त ग्‍वाल-बाल खेल में आसक्‍त हो गये।  उधर सारी गौएँ घास के लोभ से विशाल वन में प्रवेश कर गयीं, उनको लौटा लाने के लिये ग्‍वाल-बाल बहुत बड़े मूँज के वन में जा पहुँचे।  वहाँ प्रलयाग्नि के समान महान दावानल प्रकट हो गया, उस समय गौओं सहित समस्‍त ग्‍वाल-बाल एकत्र हो बलराम सहित श्रीकृष्‍ण को पुकारने लगे और भय से आर्त हो, उनकी शरण ग्रहण कर 'बचाओ, बचाओ' यों कहने लगे।  अपने सखाओं के ऊपर अग्नि का महान भय देखकर योगेश्वर श्रीकृष्‍ण ने कहा- 'डरो मत, अपनी आँखे बंद कर लो।'  नरेश्वर, जब गोपों ने ऐसा कर लिया, तब देवताओं के देखते-देखते भगवान गोविन्‍द देव उस भयकारक अग्नि को पीकर ग्‍वालों और गोओं को साथ ले श्रीहरि यमुना के उस पार अशोक वन में जा पहुँचे।  वहाँ भूख से पीड़ित ग्‍वाल-बाल बलराम सहित श्रीकृष्‍ण से हाथ जोड़कर बोले - 'प्रभो, हमें बहुत भूख सता रही है।' तब भगवान ने उनको अंगीरस-यज्ञ में भेजा,...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 20 || बलदेवजी के हाथ से प्रलम्‍बासुर का वध तथा उसके पूर्वजन्‍म का परिचय

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 20 || बलदेवजी के हाथ से प्रलम्‍बासुर का वध तथा उसके पूर्वजन्‍म का परिचय श्रीनारदजी से राजा बहुलाश्व बोले:- ब्रह्मन, मैंने आपके मुख से गोपियों के चरित्र का उत्‍तम वर्णन सुना, साथ ही यमुना के पंचांग का भी श्रवण किया, जो बडे़-बडे़ पातको का नाश करने वाला है।  साक्षात गोलोक के अधिपति भगवान श्रीकृष्‍ण ने बलरामजी के साथ व्रजमण्‍डल आगे कौन-कौन-सी मनोहर लीलाएँ कीं यह बताइये।  श्रीनारदजी ने कहा:- राजन् एक दिन श्रीबलराम और ग्‍वाल-बालों के साथ अपनी गौएँ चराते हुए श्रीकृष्‍ण भाण्‍डीर वन में यमुनाजी के तट पर बालोचित खेल खेलने लगे।  बालकों से वाहृा-वाहन का खेल करवाते हुए श्रीकृष्‍ण मनोहर गौओं की देख-भाल करते हुए वन में विहार करते थे। (इस खेल में कुछ लड़के वाहन-घोड़ा आदि बनते और कुछ उनकी पीठ पर सवारी करते थे।)  उस समय वहाँ कंस का भेजा हुआ असुर प्रलम्‍ब गोपरूप धारण करके आया, दूसरे ग्‍वाल-बाल तो उसे न पहचान सके, किंतु भगवान श्रीकृष्‍ण से उसकी माया छिपी न रही। खेल में हारने वाला बालक जीतने वाले को पीठ पर चढ़ाता था, किंतु जब बलरामजी जीत गये, ...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 19 || श्री यमुना-सहस्‍त्रनाम महात्मय

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 19 || श्री यमुना-सहस्‍त्रनाम महात्मय मांधाता बोले:- मुनिश्रेष्ठ, यमुनाजी का सहस्‍त्र नाम समस्‍त सिद्धियों की प्राप्ति कराने वाला उत्तम साधन है, आप मुझे उसका उपदेश कीजिये, क्‍योंकि आप सर्वज्ञ और निरामय (रोग-शोक से रहित) हैं। सौभरि ने कहा:- मांधाता नरेश, मै तुमसे ’कालिन्दी सहस्त्रनाम’ का वर्णन करता हूँ, वह समस्त सिद्धियों की प्राप्ति कराने वाला दिव्‍य तथा श्रीकृष्‍ण को वशीभूत करने वाला है। विनियोगः ॥ अस्य श्रीकालिन्दीसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य सौभरिरृषिः ।   श्रीयमुना देवता । अनुष्टुप् छन्दः । मायाबीजमिति कीलकम् ।   रमाबीजमिति शक्तिः । श्री कालिन्दनन्दिनीप्रसादसिद्ध्यर्थे पाठे   विनियोगः । उक्‍त वाक्‍य पढकर सहस्‍त्रनाम-पाठ के लिये विनियोग का जल छोडे़ :- ध्‍यान:- श्‍यामामम्‍भोजनेत्रां सघनघनरुचिं रत्‍नमञ्जीरकूजत्। कांचीकेयूरयुक्तां कनकमणिमये बिभ्रतिं कुण्‍डले द्वे॥ भ्राजच्‍छरीनीलवस्‍त्र स्‍फुरदिभजचलद्धाभारां मनोज्ञां। ध्‍याये मार्तण्‍डपुत्रीं तनुकिरणचयोद्दीप्‍तदीपाभिरामाम्॥ जो श्यामा (श्‍यामावर्ण एवं षोडश वर्ष की अवस्था वाली) है, जि...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 18 || यमुना जी के जप और पूजन के लिये पटल और पद्धति का वर्णन

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 18 || यमुना जी के जप और पूजन के लिये पटल और पद्धति का वर्णन मांधाता बोले:- मुनिश्रेष्ठ, यमुनाजी के कामपूरक पवित्र पटल तथा पद्धति का जैसा स्‍वरूप है, वह मुझे बताइये, क्‍योंकि आप साक्षात ज्ञान की निधि हैं। सौभरि ने कहा:- महामते, अब मैं यमुनाजी के पटल तथा पद्धति का भी वर्णन करता हूँ जिसका अनुष्‍ठान, श्रवण अथवा जप करके मनुष्‍य जीवन्‍मुक्‍त हो जाताऊ है।  पहले प्रणव (ऊँ) का उच्‍चारण करके फिर मायाबीज (ह्रीं) का उच्‍चारण करे, तत्‍पश्‍चात लक्ष्‍मीबीज (श्रीं) को रखकर उसके बाद कामबीज (क्‍लीं) का विधिवत प्रयोग करे। इसके अनन्‍तर ‘कालि‍न्‍दी‘ शब्‍द का चतुर्थ्‍यन्‍त (कालिन्‍द्यै) रखे, फिर ‘देवी’ शब्‍द के चतुर्थ्‍यन्‍तरूप (देव्‍यै) का प्रयोग करके अन्‍त में ‘नम:’ पद जोड़ दे।  (इस प्रकार ‘ऊँ हीं श्रीं, क्‍लीं कालिन्द्यै देव्‍यै नम:’ या मन्‍त्र बनेगा) इस मंत्र का मनुष्‍य विधिवत जप करे।  इस ग्‍यारह अक्षर वाले मंत्र का ग्‍यारह लाख जप करने से इस पृथ्‍वी पर सिद्धि प्राप्‍त हो सकती है, मनुष्‍यों द्वारा जिन-जिन काम्‍य पदार्थों के लिये प्रार्थना की जात...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 16 || श्री यमुना-कवच

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 16 || श्री यमुना-कवच राजा मांधाता सौभरी मुनि से बोले :- महाभाग, आप मुझे श्रीकृष्‍ण की पटरानी यमुना के सर्वथा निर्मल कवच का उपदेश दीजिये, मैं उसे सदा धारण करूँगा।  सौभरी बोले:- महामते नरेश, यमुनाजी का कवच मनुष्‍यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला तथा साक्षात चारों पदार्थों को देने वाला है, तुम इसे सुनो:-  यमुनाजी के चार भुजाएँ हैं, वे श्‍यामा (श्‍यामवर्णा एवं षोडश वर्ष की अवस्‍था से युक्‍त) हैं।  उनके नेत्र प्रफुल्‍ल कमलदल के समान सुन्‍दर एवं विशाल हैं, वे परम सुन्‍दरी हैं औद दिव्‍य रथ पर बैठी हुई हैं।  इस प्रकार उनका ध्‍यान करके कवच धारण करे। स्‍नान करके पूर्वाभिमुख हो मौन भावना से कुशासन-पर बैठे और कुशों द्वारा शिखा बाँधकर संध्‍या-वन्‍दन करने के अनन्‍तर ब्राह्मण (अथवा द्विजमात्र) स्‍वास्तिकासन से स्थित हो कवच का पाठ करे।  यमुनाश्र्च कवचं सर्वरक्षाकरं नृणाम्। चतुष्‍पदार्थदं साक्षाच्‍छृणु राजन् महामते॥ कृष्‍णां चतुर्भुजां श्‍यामां पुण्‍डरीकदलेक्षणाम्। रथस्‍थां सुन्‍दरीं ध्‍यावता धारयेत् कवचं तत:॥ स्‍न्नात: पूर्वमुखो म...

04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 15 || बर्हिष्‍मतीपुरी आदि की वनिताओं का गोपीरूप में प्राकट्य तथा भगवान के साथ उनका रा‍सविलास, मांधाता और सौभरिके संवाद में यमुना-पञ्चांग की प्रस्‍तावना

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 15 || बर्हिष्‍मतीपुरी आदि की वनिताओं का गोपीरूप में प्राकट्य तथा भगवान के साथ उनका रा‍सविलास, मांधाता और सौभरिके संवाद में यमुना-पञ्चांग की प्रस्‍तावना श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन्, व्रज में शोणपुर के स्‍वामी नन्‍द बडे़ धनी थे। मिथिलेश्वर, उनकी पत्नियो के गर्भ से समुद्रसम्‍भवा लक्ष्‍मी जी की वे सखियाँ उत्‍पन्‍न हुईं, जिन्‍हे मत्‍स्‍यावतारधारी भगवान से वैसा वर प्राप्‍त हुआ था।  नरेश्वर, इनके सिवा और भी विचित्र औषधियाँ, जो पृथ्‍वी के दोहन से प्रकट हुई थीं, वहाँ गोपीरूप में उत्‍पन्‍न हुई।  बर्हिष्‍मतीपुरी की वे नारियाँ भी जिन्‍हें महाराज पृथु का वर प्राप्‍त था, जातिस्‍मरा गोपियों के रूप में व्रज में उत्‍पन्‍न हुई थीं तथा नर-नारायण के वरदान से अप्‍सराएँ भी गोपीरूप में प्रकट हुई थीं। सुतलवासिनी दैत्‍यनारियाँ वामन के वर से तथा नागराजों की कन्‍याएँ भगवान शेष के उत्तम वर से व्रज में उत्‍पन्‍न हुईं।  दुर्वासा मुनि ने उन सबको अद्भूत 'कृष्‍णा-पंचांग' दिया था, जिसमें यमुना जी की पूजा करके उनहोंने श्रीपति का वररूप में वरण‍ किया। एक दिन की बा...