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03. गिरिराजखण्‍ड || अध्याय 01|| श्रीकृष्‍ण के द्वारा गोवर्धन पूजन का प्रस्‍ताव और उसकी विधि का वर्णन

श्री गर्ग संहिता  03. गिरिराज खण्‍ड || अध्याय 01|| श्रीकृष्‍ण के द्वारा गोवर्धन पूजन का प्रस्‍ताव और उसकी विधि का वर्णन राजा बहुलाश्‍वर ने पूछा:- देवर्षे, जैसे बालक खेल-ही-खेल में गोबर छत्‍ते को उखाड़कर हाथ में ले लेता है, उसी प्रकार भगवान ने एक ही हाथ से महान पर्वत गोवर्धन को लीलापूर्वक उठाकर छात्र की भांति धारण कर लिया था ऐसी बात सुनी जाती है; सो यह प्रसंग कैसे आया? मुनिसत्‍तम, इन परिपूर्णतम परमात्‍मा श्रीकृष्‍णचन्‍द्र के उसी दिव्‍य अद्भूत चरित्र का आप वर्णन कीजिये। श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन् , जैसे खेती करने वाले किसान राजा को वार्षिक कर देते हैं, उसी प्रकार समस्‍त गोप प्रतिवर्ष शरद्ऋतु में देवराज इन्‍द्र के लिये बलि (पूजा और भोग) अर्पित करते थे।  एक समय हरि ने महेन्‍द्रयाग के लिये सामग्री का संचय होता देख गोपसभा में नन्‍दजी से प्रश्‍न किया, उनके उस प्रश्‍न को अन्‍यान्‍य गोप भी सुन रहे थे। श्री भगवान बोले:- यह जो इन्‍द्र की पूजा की जाती है, इसका क्‍या फल है; विद्वान लोग इसका कोई लौकिक फल बताते हैं या पारलौकिक? श्रीनन्‍द ने कहा:- श्‍यामसुन्‍दर, देवराज इन्‍द्र का यह पूजन भ...