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02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 16 || तुलसी का माहात्म्य, श्रीराधा द्वारा तुलसीसेवन-व्रत

श्री गर्ग संहिता वृन्दावन खण्ड || अध्याय 16 || तुलसी का माहात्म्य, श्रीराधा द्वारा तुलसीसेवन-व्रत का अनुष्ठान तथा दिव्य तुलसी देवी का प्रत्यक्ष प्रकट हो श्रीराधा को वरदान देना श्री नारद जी कहते हैं:- राजन, श्रीराधा की बात सुनकर समस्त सखियों में श्रेष्ठ चन्द्रानना ने अपने हृदय में एक क्षण तक कुछ विचार किया फिर इस प्रकार उत्तर दिया। चन्द्रानना बोलीं:- राधे, परम सौभाग्यदायक, महान पुण्यजनक तथा श्रीकृष्ण की भी प्राप्ति के लिये वरदायक व्रत है- तुलसी के सेवा।  मेरी राय में तुलसी-सेवन का ही नियम तुम्हें लेना चाहिये; क्योंकि तुलसी का यदि स्पर्श अथवा ध्यान, नाम-कीर्तन, स्तवन, आरोपण, सेचन और तुलसी दल से ही नित्य पूजन किया जाय तो वह महान पुण्यप्रद होता है।  शुभे, जो प्रतिदिन तुलसी की नौ प्रकार से भक्ति करते हैं, वे कोटि सहस्त्र युगों तक अपने उस सुकृत्य का उत्तम फल भोगते हैं। मनुष्यों की लगायी हुई तुलसी जब तक शाखा, प्रशाखा, बीज, पुष्प और सुन्दर दलों के साथ पृथ्वी पर बढ़ती रहती है, तब तक उनके वंश में जो-जो जन्म लेते हैं, वे सब उन आरोपण करने वाले मनुष्यों के साथ दो हजार कल्पों तक श्री हरि के...