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07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 04 ||सेना सहित यादव-वीरों की दिग्विजय के लिये यात्रा

गर्ग संहिता  विश्वजित खण्‍ड || अध्याय  04 || सेना सहित यादव-वीरों की दिग्विजय के लिये यात्रा श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार सेना से घिरे हुए धनुर्धारियों में श्रेष्‍ठ वीर प्रद्युम्न से श्रीकृष्‍ण बलेदव सहित उग्रसेन ने कहा।  उग्रसेन बोले- हे महाप्राज्ञ प्रद्युम्न ! तुम श्रीकृष्‍ण की समस्‍त राजाओं पर विजय प्राप्‍त करके शीघ्र की द्वारका में लौट आओगे। इस बात को ध्‍यान में रखो कि धर्मज्ञ पुरुष मतवाले, असावधान, उन्‍मत, सोये हुए बालक, जड़, नारी, शरणागत, रथहीन और भयभीत शत्रु को नहीं मारते। संकट में पडे़ हुए प्राणियों की पीड़ा निवारण तथा कुमार्ग में चलने वालों का वध राजा के लिये परम धर्म है। इस प्रकार जो आततायी है (अर्थात् दूसरों को विष देने वाला, पराये घरों में आग लगाने वाला, क्षेत्र और नारी का अपहरण करने वाला है) वह अवश्‍य वध के योग्‍य है। स्‍त्री, पुरुष या नपुसंक कोई भी क्‍यों न हो, जो अपने-आपको ही महत्‍व देने वाले, अधम तथा समस्‍त प्राणियों के प्रति निर्दय हैं, ऐसे लोगों का वध करना राजाओं के लिये वध न करने के ही बराबर है। अर्थात् दुष्‍टों के वध से राजाओं को दोष नहीं लगत...