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04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 01 || श्रुतिरूपा गोपियों का वृतान्‍त, उनका श्रीकृष्‍ण और दुर्वासा मुनि की बातों में संशय तथा श्रीकृष्‍ण द्वारा उसका निराकरण

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 01 || श्रुतिरूपा गोपियों का वृतान्‍त, उनका श्रीकृष्‍ण और दुर्वासा मुनि की बातों में संशय तथा श्रीकृष्‍ण द्वारा उसका निराकरण अतसीकुसुमोपमेयकार्न्यिमुनाकूलकदम्‍बमूलवर्ती। नवगोपवधूविलासशाली वनमाली वितनोतु मंगलानि॥ 'जिनकी अंगकांति को अलसी के फूल की उपमा दी जाती है, जो यमुनाकूलवर्ती कदम्‍ब वृक्ष के मूल भाग में विद्यमान हैं तथा नूतन गोपांगनाओं के साथ लीला-विलास करते हुए अत्‍यंत शोभा पा रहे हैं, वे वनमाली श्रीकृष्‍ण मंगल का विस्‍तार करें'। परिकरीकृपीतपटं हरिं शिखिकिरीटनतीकृतकन्‍धरम्। लकुटवेणुकरं चलकुण्‍डलं पटुतरं नटवेषधरं भजे॥ 'जिन्‍होनें पीताम्‍बर की फेंट बाँध रखी है, जिनके मस्‍तक पर मोरपंख का मुकुट सुशोभित है और गर्दन एक ओर झुकी हुई है जो लकुटी और वंशी हाथ में लिये हुए हैं और जिनके कानों में चंचल कुण्‍डल झलमला रहे है, उन परम पटु, नटवेषधारी श्रीकृष्‍ण का मैं भजन (ध्‍यान) करता हूँ'। राजा बहुलाश्‍व ने नारदजी से पूछा:- मुने, श्रुतिरूपा आदि गोपियों ने, जो पूर्वप्रदत्‍तवर के अनुसार पहले ही व्रज में प्रकट हो चुकी थीं, किस प्रकार श्रीकृष...