07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 21 || कौरव तथा यादव वीरों का घमासान युद्ध
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 21 || कौरव तथा यादव वीरों का घमासान युद्ध; बलराम और श्रीकृष्ण का प्रकट होकर उनमें मेल कराना श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! दुर्योधन के चले जाने पर वहाँ बड़ा भारी हाहाकार मचा। तब गंगानन्दन देवव्रत भीष्म तुरंत वहाँ आ पहुँचे और उन यादवों के देखते-देखते बारंबार धनुष टंकारते हुए यादव-सेना को उसी प्रकार भस्म करने लगे, जैसे प्रज्वलित दावानल किसी वन को दग्ध कर देता है। भीष्मजी समस्त धर्मधारियों में श्रेष्ठ, महान भगवद्भक्त, विद्वान और वीर-समुदाय के अग्रगण्य थे। उन्होंने युद्ध में परशुरामजी के भी छक्के छुड़ा दिये थे। उनके मस्तक पर शिरस्त्राण एवं मुकुट शोभा पाता था। उनकी अंग-कान्ति गौर थी। दाढ़ी-मूँछ के बाल सफेद हो गये थे। वे कौरवों के पितामह थे तो भी बलपूर्वक युद्धभूमि में विचरते हुए सोलह वर्ष के नवयुवक के समान जान पड़ते थे। उन्होंने अपने बाणों से अनिरुद्ध की विशाल सेना को मार गिराया। हाथियों में मस्तक कट गये, घोडो़ की गर्दनें उतर गयीं। हाथ में तलवार लिये पैदल योद्धा बाणों की मार खाकर दो-दो टुकडों में विभक्त हो गये। रथों के सारथि, घोड़ों और रथियों...