07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 42 || श्रीकृष्ण का यादवों के साथ चन्द्रावतीपुरी में जाकर शकुनि-पुत्र को वहाँ का राज्य देना तथा शकुनि आदि के पूर्व जन्मों का परिचय
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 42 || श्रीकृष्ण का यादवों के साथ चन्द्रावतीपुरी में जाकर शकुनि-पुत्र को वहाँ का राज्य देना तथा शकुनि आदि के पूर्व जन्मों का परिचय नारदजी कहते हैं- राजन् ! बचे हुए दैत्य रणभूमि से भाग गये। यादवेन्द्र भगवान श्रीहरि वीणा, वेणु, मृदंग और दुन्दुभि आदि बाजे बजवाते और सूत, मागध एवं वन्दीजनों के मुख से अपने यश का गान सुनते हुए, पुत्रों तथा अन्य यादवों के साथ सेना से घिरकर शंख, चक्र गदा, कमल और शागर्ड धनुष से सुशोभित हो, देवताओं सहित चन्द्रावतीपुरी में गये। वहाँ अपने पति के मारे जाने के कारण रानी मदालसा शकुनि के पुत्र को गोद में लिये दु:ख से आतुर हो अत्यन्त करुणा जनक विलाप कर रही थी। उसके मुख पर अश्रुधारा बह रही थी और वह अत्यन्त दीन हो गयी थी। उसने तुरंत ही हाथ जोड़कर अपने बच्चे को श्रीकृष्ण के चरणों में डाल दिया और भगवान को नमस्कार करके कहा। मदालसा बोली- प्रभो ! आदिदेव ! आप भूतल का भार उतारने के लिये यदुकुल में अवतीर्ण हुए हैं। आप ही संसार के स्त्रष्टा हैं और प्रलयकाल आने पर आप ही इसका संहार करेंगे; किंतु कभी आप गुणों से लिप्त नहीं होते। मैं आ...