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10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 07 || देवर्षि‍ नारद का ब्रह्मलोक से आगमन; राजा उग्रसेन द्वारा उनका सत्‍कार; देवर्षि‍ द्वारा अश्‍वमेध यज्ञ की महत्ता का वर्णन; श्रीकृष्‍ण की अनुमति‍ एवं नारदजी द्वारा अश्‍वमेध यज्ञ की वि‍धि‍ का वर्णन

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 07 || देवर्षि‍ नारद का ब्रह्मलोक से आगमन; राजा उग्रसेन द्वारा उनका सत्‍कार; देवर्षि‍ द्वारा अश्‍वमेध यज्ञ की महत्ता का वर्णन; श्रीकृष्‍ण की अनुमति‍ एवं नारदजी द्वारा अश्‍वमेध यज्ञ की वि‍धि‍ का वर्णन श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! एक समय देवर्षि‍ नारद बलराम और श्रीकृष्‍ण से मि‍लने के लि‍ए अपनी वीणा बजाते और श्रीकृष्‍ण लीलाओं का गान करते हुए ब्रह्मलोक से चलकर समस्‍त लोकों को देखते हुए भूतल पर आये। वे सूर्यदेव के समान तेजस्‍वी जान पड़ते थे। उनके साथ तुम्बुरु भी थे। पिंगलवर्ण की जटाओं का भार उनके मस्‍तक की शोभा बड़ा रहा था। उनकी अंगकान्‍ति‍ कुछ-कुछ श्‍याम थी, नेत्र मृगों के नयनों के समान वि‍शाल थे, भालदेश में केसर के ति‍लक शोभा दे रहे थे। वे पीले रंग के धौतवस्‍त्र तथा रेशमी पीताम्‍बर धारण कि‍ये हुए थे। रंगवल्‍ली की माला और गोपीचन्‍दन से मण्‍डि‍त देवर्षि‍ पन्‍द्रह वर्ष की-सी अवस्‍था से अत्‍यन्‍त सुशोभि‍त होते थे। राजा उग्रसेन सुधर्मा-सभा में देवराज के दि‍ये सिंहासन पर वि‍राजमान थे। देवर्षि‍ को आया देख वे उठकर खड़े हो गये और चरणों में प्रणाम करके उन्‍हें बैठने के ल...