Posts

Showing posts with the label 07. विश्वजितखण्‍ड || अध्याय 27 || प्रद्युम्न के गरुडास्‍त्र प्रयोग पर गीधआक्रमण

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 27 || प्रद्युम्न द्वारा गरुडास्‍त्र का प्रयोग होने पर गीधों के आक्रमण से यादव-सेना की रक्षा; दशार्ण देश पर विजय तथा दशार्ण मोचन तीर्थ में स्‍न्नान

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 27 ||  प्रद्युम्न द्वारा गरुडास्‍त्र का प्रयोग होने पर गीधों के आक्रमण से यादव-सेना की रक्षा; दशार्ण देश पर विजय तथा दशार्ण मोचन तीर्थ में स्‍न्नान श्री नारदजी कहते हैं-  राजन् ! हरिवर्ष नामक खण्‍ड सम्‍पूर्ण सम्‍पदाओं से सम्‍पन्न है। मिथिलेश्वर ! उसकी सीमा साक्षात निषध पर्वत है। वीरों के को दण्‍डों की टंकार ध्‍वनि से वहाँ का वन्‍य प्रान्‍त व्‍याप्‍त हो जाने पर, वहाँ से एक-एक कोस के लंबे शरीर और तीखी चोंच वाले महागृध्र तथा गरुड़ पक्षी उड़े। नरेश्वर ! खण्‍ड सम्‍पूर्ण सम्‍पदाओं से सम्‍पन्न है। मिथिलेश्वर ! उसकी सीमा साक्षात निषध पर्वत है। वीरों के कोदण्‍ड़ों टंकार-ध्‍वनि से वहाँ का वन्‍य प्रान्‍त व्‍याप्‍त हो जाने पर, वहाँ से एक-एक कोस के लंबे शरीर और तीखी चोंच वाले महागृध तथा गरुड़ पक्षी उड़े। नरेश्वर ! वे सब-के-सब दीर्घायु और भूखे थे। उन्‍होंने यादव सैनिकों, हाथियों और घोड़ों को भी अपना ग्रास बनाना आरम्‍भ किया। आकाश पक्षियों से व्‍याप्‍त हो गया। उनकी पांखों की हवा से आंधी-सी उठने लगी। सेना में अन्‍धकार छा गया और महान हा...