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Showing posts from April, 2022

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 22 || अर्जुन सहित प्रद्युम्न का कालयवन-पुत्र चण्‍ड को जीतकर भारतवर्ष के बाहर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रस्‍थान

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 22 || अर्जुन सहित प्रद्युम्न का कालयवन-पुत्र चण्‍ड को जीतकर भारतवर्ष के बाहर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रस्‍थान नारदजी कहते हैं- राजन् ! भाइयों तथा अन्‍यान्‍य कुरुवंशियों के साथ दुर्योधन को शान्‍त करके यदुकुल तिलक बलराम और श्रीकृष्‍ण पाण्‍डवों से मिलने के लिये इन्‍द्रप्रस्‍थ को गये। तब अजातशत्रु राजा युधिष्‍ठि‍र अपने भाइयों तथा स्‍वजनों के साथ श्रीकृष्‍ण की अगवानी के लिये इन्‍द्रप्रस्‍थ से बाहर आये। उनके साथ इन्‍द्रप्रस्‍थ के अन्‍यान्‍य निवासी भी शंखध्‍वनि, दुन्‍दुभिनाद, वेदमन्‍त्रों का घोष तथा वेणुवादनपूर्वक पुष्‍प वर्षा करते हुए आये। बलराम और श्रीकृष्‍ण को राजा युधिष्ठिर दोनों भुजाओं से खींचकर हृदय से लगा लिया और परमानन्‍द का अनुभव किया। वे योगी की भाँति आनन्‍द में डूब गये। प्रद्युम्न आदि श्रीकृष्‍ण कुमारों ने भी श्री युधिष्ठिर को प्रणाम किया। युधिष्ठिर ने उन सबको दोनों हाथों से पकड़कर आशीर्वाद दिया। श्रीहरि ने स्‍वयं कुशल समाचार पूछा तथा नकुल और सहदेव ने उनके चरणों में वन्‍दना की । श्रीकृष्‍ण और बलराम साक्षात परिपूर्णतम श्रीहरि हैं, असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 21 || कौरव तथा यादव वीरों का घमासान युद्ध

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 21 ||  कौरव तथा यादव वीरों का घमासान युद्ध; बलराम और श्रीकृष्‍ण का प्रकट होकर उनमें मेल कराना श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! दुर्योधन के चले जाने पर वहाँ बड़ा भारी हाहाकार मचा। तब गंगानन्‍दन देवव्रत भीष्‍म तुरंत वहाँ आ पहुँचे और उन यादवों के देखते-देखते बारंबार धनुष टंकारते हुए यादव-सेना को उसी प्रकार भस्‍म करने लगे, जैसे प्रज्‍वलित दावानल किसी वन को दग्‍ध कर देता है। भीष्‍मजी समस्‍त धर्मधारियों में श्रेष्‍ठ, महान भगवद्भक्‍त, विद्वान और वीर-समुदाय के अग्रगण्‍य थे। उन्‍होंने युद्ध में परशुरामजी के भी छक्‍के छुड़ा दिये थे। उनके मस्‍तक पर शिरस्‍त्राण एवं मुकुट शोभा पाता था। उनकी अंग-कान्ति गौर थी। दाढ़ी-मूँछ के बाल सफेद हो गये थे। वे कौरवों के पितामह थे तो भी बलपूर्वक युद्धभूमि में विचरते हुए सोलह वर्ष के नवयुवक के समान जान पड़ते थे। उन्‍होंने अपने बाणों से अनिरुद्ध की विशाल सेना को मार गिराया। हाथियों में मस्‍तक कट गये, घोडो़ की गर्दनें उतर गयीं। हाथ में तलवार लिये पैदल योद्धा बाणों की मार खाकर दो-दो टुकडों में विभक्‍त हो गये। रथों के सारथि, घोड़ों और रथियों...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 20 || कौरवों की सेना का युद्धभूमि में आना; दोनों ओर के सैनिकों का तुमुल युद्ध और प्रद्युम्न के द्वारा दुर्योधन की पराजय

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 20 ||  कौरवों की सेना का युद्धभूमि में आना; दोनों ओर के सैनिकों का तुमुल युद्ध और प्रद्युम्न के द्वारा दुर्योधन की पराजय नारदजी कहते हैं-  राजन ! उसी समय जिनकी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी, वे समस्‍त कौरव भी अपनी-अपनी सेनाओं के साथ पृद्युमन का सामना करने के लिये निकले। रत्‍नजटित कम्‍बल (कुलीन या झूल) से अलंकृत और सोने की सांकलों से सुशोभित साठ हजार हाथी विजयध्‍वज फहराते हुए निकले। प्रलय-पयोधि के महान आवर्तों के टकराने के समान गगन भेदिनी ध्‍वनि करने वाली साठ हजार दुन्‍दुभियों का गम्‍भीर घोष फैलाने वाले वे गजराज क्रमश: आगे बढ़ने लगे। लोहे के कवच बांधे तथा शिरस्‍त्राण धारण किये दो लाख महामल्‍ल भी युद्ध के लिये निकले। उनके साथ बहुत-से हाथी और सांड भी थे। तदनन्‍तर सोने के कंगन, बाजूबंद, किरीट और सुन्‍दर कुण्‍डल पहने, स्‍वर्णमय कवच धारण किये दो लाख गजारोही योद्धा निकले। तत्‍पश्‍चात पीने कवच और टेढी पगड़ी से सुशोभित दो लाख वीर योद्धा, जो अनेक संग्रामों मे विजयकीर्ति पा चुके थे, युद्ध के लिये निकले। वे भी हाथियों पर ही बैठे थे। कोई लाल रंग के वस्‍त्र प...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 19 || यादव-सेना का विस्‍तार; कौरवों के पास उद्धव का दूत के रूप में जाकर प्रद्युम्न का संदेश सुनाना; कौरवों के कटु उत्तर से रुष्‍ट यादवों की हस्तिनापुर पर चढ़ाई

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 19 ||  यादव-सेना का विस्‍तार; कौरवों के पास उद्धव का दूत के रूप में जाकर प्रद्युम्न का संदेश सुनाना; कौरवों के कटु उत्तर से रुष्‍ट यादवों की हस्तिनापुर पर चढ़ाई श्रीनारदजी कहते हैं-  राजन्! इसके बाद महाबाहु प्रद्युम्न अपनी सेनाओं के साथ उच्‍च स्‍वरूप से दुन्‍दुभिनाद करते हुए बडे़ वेग से कुरुदेश में गये। बीस योजन लंबी भूमि पर उनकी सेना के शिविर लगे थे। उस छावनी का विस्‍तार भी दस योजन लंबी सड़क थी वहाँ धनाढ्य वैश्‍यों ने सहस्‍त्रों दुकानें लगा रखी थी। रत्‍नों के पारखी वस्‍त्रों के व्‍यवसायी, कांच की वस्‍तुओं के निर्माता, वायक (कपड़े बुनने और सीने वाले), रंगरेज, कुम्‍हार, कंदकार (मिश्री आदि बनाने वाले हलवाई), तुलकार (कपास में से रुई निकालने वाले), पटकार (वस्‍त्र निर्माता), टंकार (तार आदि टांकने का काम करने वाले) अथवा ‘टंक’ (नामक औजार बनाने वाले), चित्रकार, पत्रकार, (कागज बनाने वाले), नाई, पटुवे, शस्‍त्रकार, पर्णकार (दोने बनाने वाले), शिल्‍पी, लाक्षाकार (लखारे), माली, रजक, (धोबी), तेली, तमोली, पत्‍थारो पर खुदाई करने या चित्र बनाने वाले, भड़भूज, का...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 18 || गया, गोमती, सरयू एवं गंगा के तटवर्ती प्रदेश, काशी, प्रयाग एवं विन्‍ध्‍यदेश में यादव-सेना की यात्रा; श्रीकृष्‍ण के अठारह महारथी पुत्रों का हस्‍तलाघव तथा विवाह ;मथुरा, शूरसेन जनपदों एवं नन्‍द–गोकुल में प्रद्युम्न आदि का समादर

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 18 ||  गया, गोमती, सरयू एवं गंगा के तटवर्ती प्रदेश, काशी, प्रयाग एवं विन्‍ध्‍यदेश में यादव-सेना की यात्रा; श्रीकृष्‍ण के अठारह महारथी पुत्रों का हस्‍तलाघव तथा विवाह ;मथुरा, शूरसेन जनपदों एवं नन्‍द–गोकुल में प्रद्युम्न आदि का समादर श्रीनारदजी कहते है-  राजन्! तदनन्‍तर   श्री कृष्ण कुमार प्रद्युम्न सैनिकों सहित गया में जाकर फल्‍गुनदी में स्‍नान किया। फिर अन्‍य देशों को जीतने के लिये वहाँ से आगे को प्रस्‍थान किया। जरासंध को पराजित हुआ सुनकर उस समय अन्‍य राजा आतंकवश भयार्त हो प्रद्युम्न की शरण में आये और उन सबने उन्‍हें भेंट दी । गोमती तथा पुण्‍यसलिला सरयू के तट पर होते हुए प्रद्युम्नजी गंगा के किनारे काशीपुरी में आये। वहाँ पार्ष्णिग्रह काशिराज शिकार खेलने के लिये गये थे, जो वहीं पकड़ लिये गये। काशिराज ने भी यह सुनकर कि प्रद्युम्न की सेना विशाल है, उन्‍हें भेंट अर्पित की । राजन् ! तत्‍पश्‍चात बलवान प्रद्युम्न अपने सैनिकों के साथ कोसल जनपद में गये और अयोध्‍या के निकट नन्दिग्राम में उन्‍होंने अपनी सेना की...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 17 || मगध देश पर यादवों की विजय तथा मगधराज जरासंध की पराजय

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 17 ||  मगध देश पर यादवों की विजय तथा मगधराज जरासंध की पराजय श्रीनारदजी कहते हैं-  राजन्! तदनन्‍तर मत्‍स्‍य के चिन्‍ह से सु‍शोभित ध्‍वजा फहराते हुए प्रद्युम्न  मगधदेश पर विजय पाने के लिये अपनी सेना के साथ तुरंत गिरिवज्र की ओर चल दिये। श्रीहरि के पुत्र प्रद्युम्न को, विशेषत: दिग्विजय के लिये, आया सुनकर मगध राजा जरासंध को बड़ा क्रोध हुआ। जरासंध बोला-  समस्‍त यादव अत्‍यन्‍त तुच्‍छ और युद्ध से डरने वाले कायर हैं। वे ही आज पृथ्वी पर विजय पाने के लिये निकले हैं। जान पड़ता है, उनकी बुद्धि मारी गयी है। इस दुरात्‍मा प्रद्युम्न का पिता माधव स्‍वयं मेरे भय से अपनी पूरी मथुरा छोड़कर समुद्र की शरण में जा छिपा है। प्रवर्षण गिरि पर मैंने बलराम और कृष्ण को बलपूर्वक भस्‍म कर दिया था, किंतु ये छलपूर्वक वहाँ से भाग निकले और द्वारका में जाकर रहने लगे। अब मैं स्‍वयं कुशलस्‍थली पर चढ़ाई करुँगा और उन दोनों भाइयों को उग्रसेन सहित बांध लाऊँगा। समुद्र से घिरी हुई इस पृथ्वी को यादवों से शून्‍य कर दूँगा। नारदजी कहते हैं-  ...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 16 || मिथिला के राजा धृति द्वारा ब्रह्मचारी के रूप में पधारे हुए प्रद्युम्न का पूजन, उन दोनों का शुभ संवाद; प्रद्युम्न का राजा को प्रत्‍यक्ष दर्शन दे, उनसे पूजित हो शिविर में जाना

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 16 || मिथिला के राजा धृति द्वारा ब्रह्मचारी के रूप में पधारे हुए प्रद्युम्न का पूजन, उन दोनों का शुभ संवाद; प्रद्युम्न का राजा को प्रत्‍यक्ष दर्शन दे, उनसे पूजित हो शिविर में जाना श्रीनारदजी कहते हैं- राजन! वहाँ से विजय दुन्‍दुभि बजवाते हुए यदुनन्‍दन प्रद्युम्न तुम्‍हारे सुख सम्‍पन्‍न मिथिला देश में आये। कलश-शाभित अत्‍यन्‍त ऊँचे स्‍वर्णमय सौधशिखरों से युक्‍त मिथिलापुरी को दूर से देखकर प्रद्युम्न ने उद्धव से पूछा। प्रद्युम्न बोले- मन्त्रिवर ! इस समय वह किसकी राजधानी मेरी दृष्टि में आ रही है, जो बहुसंख्‍यक महलों से भोगवती पुरी की भाँति शोभा पाती है ? । उद्धव ने कहा-  मानद ! यह राजा जनक की पुरी मिथिला है। इस समय यहाँ मिथलानरेश महाभागवत विद्वान धृति रहते है। वे समस्‍त धर्मात्‍माओं में श्रेष्‍ठ हैं। श्रीकृष्‍ण उनके इष्‍टदेव हैं और वे स्‍वयं भी श्री‍हरि को बहुत प्रिय हैं। उनके पुत्र का नाम बहुलाश्‍व है, जो बचपन से ही भगवान ही भक्ति करने वाला है। उसे दर्शन देने के लिये साक्षात भगवान श्रीकृष्‍ण यहाँ पधारेंगे। राजकुमार बहुलाश्‍व तथा ब्राह्मण...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 15 || उड्डीश-डामर देश के राजा, वंगदश के अधिपति वीर धन्‍वा तथा असम के नरेश पुण्‍ड्र पर यादव-सेना की विजय

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 15 ||  उड्डीश-डामर देश के राजा, वंगदश के अधिपति वीर धन्‍वा तथा असम के नरेश पुण्‍ड्र पर यादव-सेना की विजय श्रीनारदजी कहते हैं-  राजन्! दिग्विजय के बहाने भूभार-हरण करने वाले साक्षात भगवान प्रद्युम्न अंगदेश को गये। अंगदेश का स्वामी केवल अन्‍त:पुर का अधिपति होकर वन में विहार करता था। वहाँ यादवों ने उसे जा पकड़ा तब उसने महात्‍मा प्रद्युम्न को पर्याप्‍त भेंट दी । उड्डीश-डामर (उड़ीसा) देश के राजा महाबली बृहदबाहु ने प्रद्युम्न को भेंट नहीं दी। वह अपने बल के अभिमान से मत्त रहता था। प्रद्युम्न ने जाम्‍बवती-कुमार वीरवर साम्‍ब को उसे वश में करने के लिये भेजा। साम्‍ब सूर्यतुल्‍य तेजस्‍वी रथ पर आरुढ़ हो, धनुष हाथ में ले अकेले ही गये। नरेश्‍वर उन्‍होंने बाण-समूहों से डामर नगर को उसी प्रकार आच्‍छादित कर दिया, जैसे मेघ तुषार राशि से किसी पर्वत को चारों से ढक देता है। इस प्रकार धर्षित एवं पराजित हेकर डामराधीश ने तत्‍काल हाथ जोड़ लिये और महात्‍मा प्रद्युम्न को नमस्‍कार करके भेंट अर्पित की । तत्‍पश्चात् वंगदश के अधिपति मदमत्त एवं वीर राज वीरधन्‍वा एक अक्षौहि...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 14 || सह्यपर्वत के निकट दत्तात्रेय का दर्शन और उपदेश तथा महेन्‍द्र पर्वत पर परशुरामजी के द्वारा यादव सेना का सत्‍कार और श्रेष्‍ठ भक्‍त के स्‍वरूप का निरूपण

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 14 || सह्यपर्वत के निकट दत्तात्रेय का दर्शन और उपदेश तथा महेन्‍द्र पर्वत पर परशुरामजी के द्वारा यादव सेना का सत्‍कार और श्रेष्‍ठ भक्‍त के स्‍वरूप का निरूपण  श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्‍दतर श्रीकृष्‍णकुमार कामदेव स्‍वरूप प्रद्युम्न ऋषभ पर्वत का दर्शन करके श्रीरंग क्षेत्र में गये। फिर कांचीपुरी एवं सरिताओं में श्रेष्‍ठ प्राचीन का दर्शन करके, कावेरी नदी के पार जाकर सह्यगिरि के समीपवर्ती देशों में गये। भगवान प्रद्युम्न हरि के साथ यादवों की विशाल सेना भी थी। मैथिलेश्‍वर ! उन्‍होंने देखा कि उनके सैन्‍य-शिविर की ओर एक खुले केश वाला दिगम्‍बर अवधूत भागता चला आ रहा हैं। उसका शरीर हष्‍ट-पुष्‍ट है और उस पर धूल पड़ी हुई है। बालक उसके पीछे दौड़ रहे हैं और इधर-उधर तालियां पीट रहे हैं, कोलाहल करते हैं और हँसते हैं। उस अवधूत को देखकर बुद्धिमानों में श्रेष्‍ठ श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न उद्धव से बोले । प्रद्युम्न ने कहा- यह हृष्‍ट–पुष्‍ट शरीरवाला कौन पुरुष बालक, उन्‍मत और पिशाच की भाँति भागा आ रहा है ? यह लोगों से तिरस्‍कृत होने पर भी हँसता है और अ...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 13 || शाल्‍व आदि देशों तथा द्विविद वानर पर प्रद्युम्न की विजय

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 13 || शाल्‍व आदि देशों तथा द्विविद वानर पर प्रद्युम्न की विजय; लंका से विभि‍षण का आना और उनहें भेंट समर्पित करना श्रीनारदजी कहते हैं-  राजन ! कृतमाला और ताम्रपर्णी नदियों में स्‍नान करके श्रीयादवेश्‍वर प्रद्युम्न अपने यादव सैनिकों के साथ राजपुर को गया। राजपुर का स्‍वामी राजा शाल्‍व था। वह मेरे मुँह से यादवों का आगमन सुनकर शीघ्र ही वानरराज द्विविद के पास गया। वीर, द्विविद मित्र की सहायता करने के लिये उद्यत हो यादवों के प्रति मन में अत्‍यनत क्रोध लेकर प्रद्युम्न की सेना का सामना करने के लिये गया। वह अपने पैरों की धमक से पृथ्वी को हिला देता था। द्विविद ने अपने नखों और दांतों द्वारा पताका और ध्‍वजपट्टों को चीर डाला। वे ध्‍वज कश्‍मीरी शालों से आवृत, मुद्राकिंत स्‍वर्णभूषित थे। उसने रथों को ऊपर उछाल दिया, हाथि‍यों पर वेगपूर्वक चढ़कर घोड़ों को भगाया और वह वानरोचित किलकारियों के साथ भौंहे नचाकर सबको भयभीत करने लगा। इस प्रकार कोलाहल मच जाने पर धनुर्धरों में श्रेष्‍ठ प्रद्युम्न बारंबार धनुष की टंकार करते हुए रथ पर आरुढ़ हो उसके पास आ गये।...

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 12 || उशीनर आदि देशों पर प्रद्युम्न की विजय तथा उनकी जिज्ञासा पर मुनिवर अगस्‍त्‍य द्वारा तत्‍वज्ञान प्रतिपादन

07. विश्वजित खण्‍ड ||  अध्याय 12 || उशीनर आदि देशों पर प्रद्युम्न की विजय तथा उनकी जिज्ञासा पर मुनिवर अगस्‍त्‍य द्वारा तत्‍वज्ञान प्रतिपादन  श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! दक्षिण सागर में स्‍नान करके यादवराज प्रद्युम्न वहाँ से सेना सहित उशीनर देश को जीतने के लिये आये, जहाँ ग्‍वालों की मण्‍डली के साथ कोटि-कोटि भव्‍य मूर्तिवाली गौएं विचरती और चरती हैं। उशीनर देश के लोग दूध पीत और गोरे रंग के मनोहर रूप वाले होते हैं। वे मक्‍खन की भेंट लेकर प्रद्युम्न के सामने गये। उनसे पूजित होकर प्रद्युम्न ने प्रसन्‍नतापूर्वक उन्‍हें हाथी, घोड़े रत्‍न, वस्‍त्र और भूषण आदि बहुत धन दिया। उशीनर की राजधानी चम्‍पावती नामक पुरी मणि और रत्‍नों से सम्‍पन्‍न थी। वह राजाओं से उसी प्रकार शोभा पाती थी, जैसे सर्पों से भोगवतीपुरी। चम्‍पावती के स्‍वामी वीर राज हेमांगद शीघ्र ही भेंट लेकर आये। उन्‍होंने श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न ने उन्‍हें केसरयुक्‍त कमलों की माला दी और सहस्‍त्रदलों की शोभा से सम्‍पन्‍न एक दिव्‍य कमल भी अर्पित किया ।तदनन्‍तर महाबाहु प्रद्युम्न धनुष धारण किये तथा बार-बार दुन्‍दुभि बजवाते हुए ...