10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 33 || श्रीकृष्ण की कृपा से दैत्य राजकुमार कुनन्दन के जीवन की रक्षा
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 33 || श्रीकृष्ण की कृपा से दैत्य राजकुमार कुनन्दन के जीवन की रक्षा सैन्यपाल ने कहा– यहाँ सभी रणदुर्मद धनुर्धर वीर तो आ गए हैं, केवल राजा के पुत्र युवराज इस रणभूमि में नहीं दिखाई देते हैं। वे मेरे बेटे को मरवाकर घर में बैठे क्या कर रहे हैं ? क्या वे भुशुण्डी के मुँह में पड़कर मेरे पुत्र के ही रास्ते पर नहीं जायँगे ? ऐसा कहकर रोष से आँखें लाल किए सैन्यपाल बड़े हर्ष के साथ राजकुमार को पकड़ने के लिए शीघ्र ही पुरी में जा पहुँचा। उस राजकुमार ने रात में भोजन के बीच में ही मदिरा पीकर शयन किया था, अत: मदमत्त होने के कारण वह राजा की आज्ञा को भूल गया था। ढिंढोरे पर की गई घोषणा सुन को सुन कर उसकी पत्नी भय से विह्वल हो रो पड़ी और अपने पति राजकुमार को जगाने लगी– हे वीर ! उठो ! उठो ! उठो ! प्रात:काल हो गया। नगाड़े की आवाज के साथ तुम्हारे पिता का यह शासनपुरी में सुनाई देता है- जो युद्ध के लिए नहीं जाएंगे, वे पुत्र आदि ही क्यों न हों, वध के योग्य होंगे। इसलिए शीघ्र जाओ और पिता का दर्शन करो । अपनी प्यारी पत्नी के जगाने पर उसको कुछ होश हुआ। जब बल्वल की सेना चली गई, तब उसकी पत...