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02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 12 || भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालियदमन तथा दावानल-पान

श्री गर्ग संहिता 02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 12 || भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालियदमन तथा दावानल-पान श्री नारद जी कहते हैं:- मिथिलेश्वर, एक दिन बलराम जी को साथ में लिये बिना ही श्री हरि स्वयं ग्वाल-बालों के साथ गाय चराने चले गये।  यमुना के तट पर आकर उन्होंने उस विषाक्त जल को पी लिया, जिसे नागराज कालिया ने अपने विष से दूषित कर दिया था। उस जल को पीकर बहुत-सी गायें और गोपगण प्राणहीन होकर पानी के निकट ही गिर पड़े।  यह देख सर्वपापहारी साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का चित्त दया से द्रवित हो उठा, उन्होंने अपनी पीयूषपूर्ण दृष्टि से देखकर उन सबको जीवित कर दिया।  इसके बाद पीताम्बर को कमर में कसकर बाँध लिया, फिर वे माधव तटवर्ती कदम्ब वृक्ष पर चढ़ गये और उसकी ऊँची डाल से उस विष दूषित जल में कूद पड़े। भगवान श्रीकृष्ण के कूदने से वह दूषित जल चक्कर काटकर ऊपर को उछला।  यमुना के उस भाग में कालियनाग रहता था, भँवर उठने से उस सर्प का भवन इस तरह चक्कर काटने लगा, जैसे जल में पानी के भौंरे घूमते हैं।  नरेश्वर, उस समय सौ फणों से युक्त फणिराज कालिय क्रुद्ध हो उठा और माधव को दाँतों से डँसते हुए उ...