01. गोलोक खण्ड || अध्याय 10 कंस के अत्याचार; बलभद्र जी का अवतार तथा व्यासदेव द्वारा उनका स्तवन
गोलोक खण्ड : अध्याय 10
कंस के अत्याचार; बलभद्र जी का अवतार तथा व्यासदेव द्वारा उनका स्तवन
श्री नारद जी कहते हैं-
राजन ! कंस ने सोचा, वसुदेवजी भयभीत होकर कहीं भाग न जायँ- ऐसा विचार मन में आते ही उसने बहुत से सैनिक भेज दिये। कंस की आज्ञा से दस हजार शस्त्रधारी सैनिकों ने पहुँच कर वसुदेवजी का घर घेर लिया। वसुदेवजी ने यथा समय देवकी के गर्भ से आठ पुत्र उत्पन्न किये, वे क्रमश: एक वर्ष के बाद होते गये। फिर उन्होंने एक कन्या को भी जन्म दिया, जो भगवान की सनातनी माया थी। सर्वप्रथम जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम कीर्तिमान था। वसुदेवजी उसे गोद में उठाकर कंस के पास ले गये। वे दूसरे के प्रयोजन को भी अच्छी तरह से समझते थे, इसलिये वह बालक उन्होंने कंस को दे दिया। वसुदेव जी को अपने सत्य वचन के पालन में तत्पर देख कंस को दया आ गयी। साधु पुरुष दु:ख सह लेते हैं, परंतु अपनी कही हुई बात मिथ्या नहीं होने देते। सचाई देखकर किसके मन में क्षमा का भाव उदित नहीं होता?
कंस ने कहा-
वसुदेवजी ! यह बालक आपके साथ ही घर लौट जाये, इससे मुझे कोई भय नहीं है। परंतु आप दोनों का जो आठवाँ गर्भ होगा, उसका वध मैं अवश्य करूँगा- इसमें कोई संशय नहीं है।
श्री नारद जी कहते हैं-
राजन ! कंस के यों कहने पर वसुदेव जी अपने पुत्र के साथ घर लौट आये, परंतु उस दुरात्मा के वचन को उन्होंने तनिक भी सत्य नहीं माना। उस समय आकाश से उतरकर मैं वहाँ गया। उग्रसेन कुमार कंस ने मुझे मस्तक झुकाकर मेरा स्वागत सत्कार किया और मुझ से देवताओं का अभिप्राय पूछा। उस समय मैंने उसे जो उत्तर दिया, वह मुझसे सुनो। मैंने कहा- ‘नन्द आदि गोप वसु के अवतार हैं और वृषभानु आदि देवताओं के।
नरेश्वर कंस ! इस व्रजभूमि में जो गोपियाँ हैं, उनके रूप में वेदों की ऋचाएँ आदि यहाँ निवास करती हैं। मथुरा में वसुदेव आदि जो वृष्णिवंशी हैं, वे सब के सब मूलत: देवता ही हैं। देवकी आदि सम्पूर्ण स्त्रियाँ भी निश्चय ही देवांगनाएँ हैं। सात बार गिन लेने पर सभी अंक आठ ही हो जाते हैं। तुम्हारे घातक की संख्या से गिना जाय तो यह प्रथम बालक भी आठवाँ हो सकता है; क्योंकि देवताओं की ‘वामतो गति’ है।
श्री नारद जी कहते हैं-
मिथिलेश्वर ! उससे यों कहकर जब मैं चला गया, तब देवताओं द्वारा किये गये दैत्य वध के लिये उद्योग पर कंस को बड़ा क्रोध हुआ। उसने उसी क्षण यादवों को मार डालने का विचार किया। उसने वसुदेव और देवकी को मजबूत बेड़ियों से बाँधकर कैद कर लिया और देवकी के उस प्रथम गर्भ जनित शिशु को शिलापृष्ठ पर रखकर पीस डाला। उसे अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का स्मरण था, अत: भगवान विष्णु के भय से तथा अपने दुष्ट स्वभाव के कारण भी उसने इस भूतल पर प्रकट हुए देवकी के प्रत्येक बालक को जन्म लेते ही मार डाला। ऐसा करने में उसे तनिक भी हिचक नहीं हुई। यह सब देखकर यदुकुल नरेश राजा उग्रसेन उस समय कुपित हो उठे। उन्होंने वसुदेवजी की सहायता की और कंस को अत्याचार करने से रोका। कंस के दुष्ट अभिप्राय को प्रत्यक्ष देख महान यादव वीर उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए। वे उग्रसेन के पीछे रहकर, खड्गहस्त हो उनकी रक्षा करने लगे। उग्रसेन के अनुगामियों को युद्ध के लिये उद्यत देख कंस के निजी वीर सैनिक भी उनका सामना करने के लिये खड़े हुए। राजसभा के मण्डप में ही उन दोनों दलों का परस्पर युद्ध होने लगा। राजद्वार पर भी उन दोनों दलों के वीरों में परस्पर युद्ध छिड़ गया। वे सब लोग खुलकर एक-दूसरे पर खड्ग का प्रहार करने लगे। इस संघर्ष में दस हजार मनुष्य खेत रहे। तदनंतर कंस ने गदा हाथ में लेकर पिता की सेना को कुचलना आरम्भ किया। उसकी गदा से छू जाने से ही कितने ही लोगों के मस्तक फट गये, कितनों के पाँव कट गये, नख विदीर्ण हो गये, बाँहें कट गयीं और उनकी आशा पर पानी फिर गया। कोई औंधे मुँह और कोई उतान होकर अस्त्र-शस्त्र लिये क्षणभर में धराशायी हो गये। बहुत से वीर खून उगलते हुए मूर्च्छित हो काल के गाल में चले गये। वहाँ इतना रक्त प्रवाहित हुआ कि सारा सभा मण्डसप रँग गया।
राजराजेश्वर ! इस प्रकार दुष्ट एवं मदमत्त कंस ने कुपित हो उदभट शत्रुओं को धराशायी करके अपने पिता को कैद कर लिया। उन्हें राजसिंहासन से उतार कर उस दुष्ट ने पाशों से बाँधा और उनके मित्रों के साथ उन्हें भी कारागार में बन्द कर दिया।
मधु और शूरसेन की सारी सम्पत्तिओं पर अधिकार करके कंस स्वयं सिंहासन पर जा बैठा और राज्य शासन करने लगा। समस्त पीड़ित यादव सम्बन्धी के घर पर जाने के बहाने तुरंत चारों दिशाओं में विभिन्न देशों के भीतर जाकर रहने लगे और उचित अवसर की प्रतिक्षा करने लगे। देवकी का सातवाँ गर्भ उनके लिये हर्ष और शोक दोनों की वृद्धि करने वाला हुआ, उसमें साक्षात अनन्तदेव अवतीर्ण हुए थे।योगमाया ने देवकी के उस गर्भ को खींचकर व्रज में रोहिणी की कुक्षि के भीतर पहुँचा दिया। ऐसा हो जाने पर मथुरा के लोग खेद प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘अहो ! बेचारी देवकी का गर्भ कहाँ चला गया ? कैसे गिर गया ?’ व्रज में उस गर्भ को गये पाँच ही दिन बीते थे कि भाद्रपद शुक्ला षष्ठी को, स्वाती नक्षत्र में, बुध के दिन वसुदेव की पत्नि रोहिणी के गर्भ से अनन्त देव का प्राकट्य हुआ। उच्च स्थान में स्थित पाँच ग्रहों से घिरे हुए तुला लग्न में, दोपहर के समय बालक का जन्म हुआ। उस जन्म वेला में जब देवता फूल बरसा रहे थे और बादल वारिबिन्दु बिखेर रहे थे, प्रकट हुए अनन्तदेव ने अपनी अंगकांति से नन्दभवन को उद्भासित कर दिया। नन्दराय जी ने भी उस शिशु का जातकर्म संस्कार करके ब्राह्मणों को दस लाख गौएँ दान की। गोपों को बुलाकर उत्तम गान-विद्या में निपुण गायकों के संगीत के साथ महान मंगलमय उत्सव का आयोजन किया। देवल, देवरात, वसिष्ठ, बृहस्पति और मुझ नारद के साथ आकर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास भी वहाँ बैठे और नन्दजी के दिये हुए पाद्य आदि उपहारों से अत्यंत प्रसन्न हुए।
नन्दराय जी ने पूछा-
महर्षियो! यह सुन्दर बालक कौन है, जिसके समान दूसरा कोई देखने में नहीं आता ? महामुने ! इसका जन्म पाँच ही दिनों में कैसे हुआ ? यह मुझे बताइये।
श्रीव्यास जी बोले-
नन्द ! तुम्हारा अद्भुत सौभाग्य है, इस शिशु के रूप में साक्षात सनातन देवता शेषनाग पधारे हैं। पहले तो मथुरापुरी में वसुदेव से देवकी के गर्भ में इनका आविर्भाव हुआ। नन्दराय ! ये योगियों के लिये भी दुर्लभ हैं, किंतु तुम्हें इनका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है। मैं महामुनि वेदव्यास इनके दर्शन के लिये ही यहाँ आया हूँ, अत: तुम शिशुरूप धारी इन परात्पर देवता का हम सबको दर्शन कराओ।
श्री नारद जी कहते हैं-
राजन ! तदनंतर नन्दने विस्मित होकर शिशुरूपधारी शेष का उन्हें दर्शन कराया। पालने में विराजमान शेष जी का दर्शन कर चुके सत्यवती नन्दन ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति की।
श्री व्यास जी बोले-
भगवन ! आप देवताओं के भी अधिदेवता और कामपाल (सबका मनोरथ पूर्ण करने वाले) हैं, आपको नमस्कार है। आप साक्षात अनन्तदेव शेषनाग हैं, बलराम हैं; आपको मेरा प्रणाम है। आप धरणीधर, पूर्णस्वरूप, स्वयंप्रकाश, हाथ में हल धारण करने वाले, सहस्र मस्तकों से सुशोभित तथा संकर्षण देव हैं, आपको नमस्कार है। रेवती-रमण ! आप ही बलदेव तथा श्रीकृष्ण के अग्रज हैं। हलायुध एवं प्रलम्बासुर के नाशक है। पुरुषोत्तम ! आप मेरी रक्षा कीजिये। आप बल, बलभ्रद तथा ताल के चिह्न से युक्त ध्वजा धारण करने वाले हैं; आपको नमस्कार है। आप नीलवस्त्रधारी, गौरवर्ण तथा रोहिणी के सुपुत्र हैं; आपको मेरा प्रणाम है। आप ही धेनुक, मुष्टिक, कुम्भाण्ड, रूक्मी, कूपकर्ण, कूट तथा बल्वल के शत्रु हैं। कालिन्दी की धारा को मोड़ने वाले और हस्तिनापुर को गंगा की ओर आकर्षित करने वाले आप ही हैं। आप द्विविद के विनाशक, यादवों के स्वामी तथा व्रजमण्डल के मण्डन (भूषण) हैं। आप कंस के भाइयों का वध करने वाले तथा तीर्थयात्रा करने वाले प्रभु हैं। दुर्योधन के गुरु श्री साक्षात आप ही हैं। प्रभो ! जगत की रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले परात्पर देवता साक्षात अनंत ! आपकी जय हो, जय हो। आपका सुयश समस्त दिगंत में व्यापत है। आप सुरेन्द्र, मुनीन्द्र और फणीन्द्रों में सर्वश्रेष्ठ हैं। मुसलधारी, हलधर और बलवान हैं; आपको नमस्कार है। जो इस जगत में सदा ही इस स्तवन का पाठ करेगा, वह श्रीहरि के परमपद को प्राप्त होगा। संसार में उसे शत्रुओं का संहार करने वाला सम्पूर्ण बल प्राप्त होगा। उसकी सदा जय होगी और वह प्रचुर धन का स्वामी होगा।[1]
[1. श्रीव्यास उवाच- देवाधिदेव भगवन् कामपाल नमोऽस्तु ते। नमोऽनन्ताय शेषाय साक्षाद्रामाय ते नम: ।। धराधराय पूर्णाय स्वधाम्ने सीरपाणये। सहस्त्रशिरसे नित्यं नम: संकर्षणाय ते ।। रेवतीरमण त्वं वै बलदेवोऽच्युताग्रज: हलायुध: प्रलम्बघ्न: पाहि मां पुरुषोत्तम ।। बलाय बलभ्रदाय तालांकाय नमो नम:। नीलाम्बराय गौराय रौहिणेयाय ते नम: ।। धेनुकारिर्मुष्टिकारि: कुम्भाण्डारिस्त्वमेव हि। रुक्मयरि: कूपकर्णारि: कूटारिर्बल्वलान्तक:॥ कालिन्दीभेदनोऽसि त्वं हस्तिनापुरकर्षक:। द्विविदारिर्यादवेन्द्रो व्रजमण्डलमण्डन: ।। कंसभ्रातृप्रहन्तासि र्तीथयात्राकर: प्रभु:। दुर्योधनगुरु: साक्षात् पाहि पाहि प्रभो जगत् ।। जय जयाच्युत देव परात्पर स्वयमनन्त दिगन्तगतश्रुत। सुरमुनीन्द्रफणीन्द्रवराय ते मुसलिने बलिने हलिने नम: ।। इह पठेत्सततं स्तवनं तु य: स तु हरे: परमं पदमाव्रजेत्। जगति सर्वबलं त्वरिमर्दनं भवति तस्य जय: स्वधनं धनम् ।।-(गर्ग संहिता, गोलोक खंण्ड 10।36-44)]
श्री नारद जी कहते हैं-
राजन ! पराशरन्दन विशाल बुद्धि बादरायण मुनि, सत्यवती कुमार श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास उन मुनियों के साथ बलरामजी को सौर बार प्रणाम और परिक्रमा करके सरस्वती नही के तटपर चले गये।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के अंतर्गत श्री नारद-बाहुलाश्व संवाद में ‘बलभद्रजी के जम्म का वर्णन’ नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ।

Comments
Post a Comment