01. गोलोक खण्ड || अध्याय 11 || भगवान वसुदेव देवकी में आवेश; देवताओं द्वारा उनका स्तवन; आविर्भावकाल; अवतार विग्रह की झाँकी;
गर्ग संहिता
गोलोक खण्ड : अध्याय 11
भगवान वसुदेव देवकी में आवेश; देवताओं द्वारा उनका स्तवन; आविर्भावकाल; अवतार विग्रह की झाँकी; वसुदेव देवकी कृत भगवत-स्तवन; भगवान द्वारा उनके पूर्वजन्म के वृतांत वर्णन पूर्वक अपने को नन्द भवन में पहुँचाने का आदेश; कंस द्वारा नन्द कन्या योगमाया से कृष्ण के प्राकट्य की बात जानकर पश्चात्ताप पूर्वक वसुदेव देवकी को बन्धन मुक्त करना, क्षमा माँगना और दैत्यों को बाल वध का आदेश देना।
श्रीनारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर ! तदंतर परात्पर एवं परिपूर्णतम साक्षात भगवान श्रीकृष्ण पहले वसुदेवजी के मन में आविष्ट हुए। भगवान का आवेश होते ही महामना वसुदेव सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि के समान महान तेज से उदभासित हो उठे, मानो उनके रूप में दूसरे यज्ञनारायण ही प्रकट हो गये हों। फिर सबको अभय देने वाले श्रीकृष्ण देवी देवकी के गर्भ में आविष्ट हुए। इससे उस कारागृह में देवकी उसी तरह दिव्य दीप्ति से दमक उठीं, जैसे घनमाला में चपला चमक उठती है। देवकी के उस तेजस्वी रूप को देखकर कंस मन ही मन भय से व्याकुल होकर बोला- ‘यह मेरा प्राणहंता आ गया; क्योंकि इसके पहले यह ऐसी तेजस्वनी नहीं थी। इस शिशु को जन्म लेते ही मैं अवश्य मार डालूँगा।’ यों कहकर वह भय से विह्वल हो उस बालक के जन्म की प्रतिक्षा करने लगा।
भय के कारण अपने पूर्व शत्रु भगवान विष्णु का चिंतन करते हुए वह सर्वत्र उन्हीं को देखने लगा। अहो ! दृढ़ता पूर्वक वैर बँध जाने से भगवान श्रीकृष्ण का भी प्रत्यक्ष की भाँति दर्शन होने लगता है। इसलिये असुर श्रीकृष्ण की प्राप्ति के उद्देश्य से ही उनके साथ वैर करते हैं। जब भगवान गर्भ में आविष्ट हुए, तब ब्रह्मादि देवता तथा अस्मदादि (नारद प्रभृति) मुनीश्वर वसुदेव के गृह के ऊपर आकाश में स्थित हो, भगवान को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले- जाग्रत, स्वप्न आदि अवस्थाओं में प्रतीत होने वाले विश्व के जो एकमात्र हेतु होते हुए भी अहेतु हैं, जिनके गुणों का आश्रय लेकर ही ये प्राणि समुदाय सब ओर विचरते हैं तथा जैसे अग्नि से निकलकर सब ओर फैले हुए विस्फुलिंग (चिनगारियाँ) पुन: उसमें प्रवेश नहीं करते, उसी प्रकार महत्तत्त्व, इन्द्रिय वर्ग तथा उनके अधिष्ठता देव समुदाय जिनसे प्रकट हो पुन: उनमें प्रवेश नहीं पाते, उन परमात्मा आप भगवान श्रीकृष्ण को हमारा सादर नमस्कार है।
बलवानों में भी सबसे अधिक बलिष्ठ यह काल भी जिन पर शासन करने में समर्थ नहीं है, माया भी जिन पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकती तथा नित्य शब्द (वेद) जिनको अपना विषय नहीं बना पाता, उन परम अमृत, प्रशांत, शुद्ध, परात्पर पूर्ण ब्रह्मस्वरूप आप भगवान की हम शरण में आये हैं। जिन परमेश्वर के अंशावतार, अंशांशावतार, कलावतार, आवेशावतार तथा पूर्णावतार सहित विभिन्न अवतारों द्वारा इस विश्व के सृष्टि पालन आदि कार्य सम्पादित होते हैं, उन्हीं पूर्ण से भी परे परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण को हम प्रणाम करते हैं। प्रभो ! अतीत, वर्तमान और अनागत (भविष्य) मन्वन्तरों, युगों तथा कल्पों में आप अपने अंश और कला द्वारा अवतार-विग्रह धारण करते हैं। किंतु आज ही वह सौभाग्यपूर्ण अवसर आया है, जबकि आप अपने परिपूर्णतम धाम (तेज:पुंज) का यहाँ विस्तार कर रहे है !
अब इस परिपूर्णतम अवतार द्वारा भूतल पर धर्म की स्थापना करके आप लोक में मंगल (कल्याण) का प्रसार करेंगे। आनन्दकन्द ! देवकीनन्दन ! आपकी जो चरणरज विशुद्ध अंत:करण वाले योगियों के लिये भी दुर्लभ और अगम्य है, वही उन बड़भागी भक्तों के लिये परम सुलभ है, जो अपने निर्मल हृदय में भक्तियोग धारण करके, सदा प्रीतिसर में निमग्न हो, द्रवित-चित्त रहते हैं। शिशुरूप में मन्द-मन्द विचरने वाले आपके चरणारविन्दों के मकरन्द एवं पराग को हम सानुराग सिर पर धारण करें, यही हमारी आंतरिक अभिलाषा है। आप पहले सी ही परम कमनीय कलेवरधारी हैं और यहाँ इस अवतार में भी उसी कमनीय रूप से आप सुशोभित होंगे। आपका रूप कोटिशत कामदेवों को भी मोहित करने वाला और परम अद्भुत है। आप गोलोकधाम में धारित दिव्य दीप्ति राशि को यहाँ भी धारण करेंगे। सर्वोत्कृष्ट धर्मधन के धारियता आप श्रीराधाबल्लभ को हम प्रणाम करते हैं।[¹]
उस समय मुनियों सहित ब्रह्मा आदि सब देवता श्री हरि को नमस्कार करके उनकी महिमा का गान तथा स्वभाव की प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने धाम को चले गये। मिथिला-सम्राट बहुलाश्व ! तदनन्तर जब श्री हरि के प्राकट्य का समय आया, आकाश स्वच्छ हो गया। दसों दिशाएँ निर्मल हो गयीं। तारे अत्यंत उद्दीप्त हो उठे। भूमण्ड ल में प्रसन्नता छा गयी। नदी, नद, सरोवर और समुद्र के जल स्वच्छ हो गये। सब ओर सहस्र दल तथा शतदल कमल खिल उठे। वायु के स्पर्श से उनके सुगन्ध युक्त पराग सब दिशाओं में फैलने लगे। उन कमलों पर भ्रमर गुंजार करने लगे।
शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु बहने लगी। जनपद और ग्राम सुख-सुविधा से सम्पन्न हो गये। बड़े-बड़े नगर तो मंगल के धाम बन गये। देवता, ब्रह्मण, पर्वत, वृक्ष और गौएँ- सभी सुख-सामग्री से परिपूर्ण हो गये। देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठी। साथ ही जय-जयकार की ध्वनि सब ओर व्याप्त हो गयी। महाराज ! जहाँ-तहाँ सब जगह सबका परम मंगल हो गया। गायन कला में निपुण विद्याधर, गन्धर्व, सिद्ध, किन्नर तथा चारण गीत गाने लगे। देवता लोग स्तोत्र पढ़कर उन परम पुरुष का स्तवन करने लगे। देवलोक में गन्धर्व तथा विद्याधरियाँ आनन्दमग्न होकर नाचने लगी। मुख्य-मुख्य देवता पारिजात, मन्दार तथा मालती के मनोरम फूल बरसाने लगे और मेघ गर्जना करते हुए जल की वृष्टि करने लगे। भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग तथा वृष लग्न में अष्टमी तिथि को आधी रात के समय चन्द्रोदय काल में, जबकि जगत में अन्धकार छा रहा था, वसुदेव मन्दिर में देवकी के गर्भ से साक्षात श्री हरि प्रकट हुए-ठीक उसी तरह, जैसे अरणिकाष्ठ से अग्नि का आविर्भाव होता है।
कण्ठ में प्रकाशमान स्वच्छ एवं विचित्र मुक्ताहार, वक्ष पर शोभा प्रभा समन्वित सुन्दर कौस्तुभ मणि तथा रत्नों की माला, चरणों में नूपुर तथा बाहों में बाजूबन्द धारण किये भगवान मण्डलाकार प्रभापुंज से उद्भासित हो रहे थे। मस्तक पर किरीट तथा कानों में कुण्डल युगल बालरवि के सदृश उद्यीप्त हो रहे थे। कलाइयों में प्रज्वलित अग्नि के समान कांतिमान अद्भुत कंकण हिल रहे थे। कटिकी करधनी में जो डोर या जंजीर लगी थी, उसकी प्रभा विद्युत के समान सब ओर व्याप्त हो रही थी। कण्ठ देश में कमलों की माला शोभा पाती थी, जिसके ऊपर मधु लोलुप मधुकर मँडरा रहे थे। उनके श्री अंगों पर जो दिव्य पीत वस्त्र था, वह नूतन (तपाये हुए) जाम्बूनद (सुवर्ण) की शोभा को तिरस्कृत कर रहा था। श्यामसुन्दर विग्रह पर सुशोभित वह पीताम्बर विद्युद्विलास से विलसित नीलमेघ के सौभाग्यपूर्ण सौन्दर्य को छीने लेता था। मुख के ऊपर शिरोदेश में काले काले घुँघराले केश शोभा पाते थे। मुखचन्द्र की चंचल रश्मियाँ वहाँ का सम्पूर्ण अन्धकार दूर किये देती थी। वह परम सुन्दर शुभद आनन प्रफुल्ल इन्दीवर सदृश युगल नेत्रों से सुशोभित था।
उस पर विचित्र रीति से मनोहर पत्र रचना की गयी थी, जिससे मण्डित अभिराम मुख सदैव करोड़ों कामदेवों को मोह लेता था। वे परिपूर्णतम परात्पर भगवान मधुर ध्वनि से वेणु बजाने में तत्पर थे[²] ऐसे पुत्र का अवलोकन करके यदुकुल तिलक वसुदेवजी के नेत्र भगवान के जन्मोत्सव जनित आनन्द से खिल उठे। फिर उन्होंने शीघ्र ही ब्राह्मणों को एक लाख गो दान करने का मन ही मन संकल्प लिया। सूतिकागार में प्रभु का आविर्भाव प्रत्यक्ष हो गया, इससे वसुदेव जी का सारा भय जाता रहा। वे अत्यंत विस्मित हो, हाथ जोड़कर आदि अंतरहित श्रीहरि को प्रणाम करके, स्तोत्रों द्वारा उनका स्तवन करने लगे।
श्री वसुदेव जी बोले- भगवन ! जो एकमात्र अद्वितीय हैं, वे ही परब्रह्म परमात्मा आप प्रकृति के सत्त्वादि गुणों के कारण अनेक रूपों में प्रतीत होते हैं। आप ही संहारक, आप ही उत्पादक तथा आप ही इस जगत के पालक हैं। हे आदिदेव ! हे त्रिभुवनपते परमात्मन ! जैसे स्फटिकमणि औपाधिक रंगों से लिप्त नहीं होती, उसी प्रकार आप देह के वर्णों से निर्लिप्त ही रहते हैं। ऐसे आप परमेश्वर को मेरा नमस्कार है। जैसे ईधन में आग छिपी रहती है, उसी तरह आप अव्यक्त रूप से इस सम्पूर्ण जगत में विद्यमान हैं; तथा जैसे आकाश सबके भीतर और बाहर भी स्थित हैं। आप ही पृथ्वी की भाँति इस समस्त जगत के आधार हैं, सबके साक्षी हैं तथा वायु की भाँति सर्वत्र जाने की शक्ति रखते हैं। आप गौ, देवता, ब्राह्मण, अपने भक्तजन तथा बछड़ों के पालक हैं और उद्भट भूभार का हरण करने के लिये ही मेरे घर में अवतीर्ण हुए हैं। इस भूतल पर समस्त पुरुषोंत्तमों से भी उत्तम आप ही हैं। भुवनपते ! पापी कंस से मुझे बचाइये। [3]
श्री नारद जी कहते हैं- मिथिलापते ! सर्व देवतास्वरूपिणी देवकी को भी यह ज्ञात हो गया कि मेरे घर में परिपूर्णतम भगवान साक्षात श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण का आविर्भाव हुआ है। अत: वे भी उन्हें नमस्कार करके बोलीं।
देवकी ने कहा- हे सच्चिदानन्दघन श्रीकृष्ण ! हे अगणित ब्रह्माण्डों के स्वामी ! हे परमेश्वर ! हे गोलोकधाम मन्दिर की ध्वजा ! हे आदिदेव ! हे पूर्णरूप ईश्वर ! हे परिपूर्णतम परमेश ! हे प्रभो ! आप पापी कंस के भय से मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।[4]
श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! पिता-माता की ओर से किया गया वह स्तवन सुनकर पाप नाशन साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्कारते हुए देवकी तथा वसुदेव जी से बोले।
श्रीभगवान ने कहा- पूर्वसृष्टि में ये माता पतिव्रता पृश्नि थी और प्रजापति सुतपा। आप दोनों ने संतान के लिये ब्रह्माजी की आज्ञा से अन्न और जल का त्याग करके बड़ी भारी तपस्या की थी। एक मनवंतर का समय बीत जाने पर भी प्रजा की कामना से आपकी तपस्या चलती रही, तब मैं आप दोनों पर प्रसन्न होकर बोला- ‘आप लोग कोई उत्तम वर माँग लें।’ मेरी बात सुनकर आप तत्काल बोले- ‘प्रभो ! हम दोनों को आपके समान पुत्र प्राप्त हो’ उस समय ‘तथास्तु’ कहकर जब मैं चला गया, तब आप दोनों दम्पति अपने पुण्य कर्म के फलस्वरूप प्रजापति हुए। संसार में मेरे समान तो कोई पुत्र है नहीं यह विचार कर मैं ‘पृश्नगिर्भ’ नाम से विख्यात हुआ। फिर दूसरे जन्म में जब आप कश्यप और अदिति हुए, तब मैं आपका पुत्र वामन आकार वाला उपेन्द्र हुआ। उसी प्रकार इस वर्तमान जन्म में भी मैं परात्पर परमेश्वर आप दोनों का पुत्र हुआ हूँ। पिताजी ! अब आप मुझे नन्द भवन में पहुँचा दें। इससे आप दोनों को कंस से कोई भय नहीं होगा। नन्दराय जी की पुत्री को यहाँ ले आकर आप सुखी होइयेगा।
श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! यों कहकर भगवान वहाँ मौन हो, उन दोनों के देखते-देखते वर्तमान स्वरूप को अदृश्य करके, बालरूप हो पृथ्वी पर पड़ गये- जैसे किसी नट ने क्षणभर में वेष परिवर्तन कर लिया हो। शिशु को पालने में सुलाकर ज्यों ही वसुदेव जी ले जाने को उद्यत हुए, त्यों ही महावन में नन्द पत्नि के गर्भ से योगमाया ने स्वत: जन्म ग्रहण किया। उसी के प्रभाव से सब लोग सो गये। पहरेदार भी नींद लेने लगे। सारे दरवाजे मानो किसी ने खोल दिये। साँकल और अर्गलाएँ टूट-फूट गयीं। श्रीकृष्ण को माथे पर लिये जब वसुदेव जी गृह से बाहर निकले, उस समय उनके भीतर का अज्ञान और बाहर का अँधेरा स्वत: दूर हो गया-ठीक उसी तरह, जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार का तत्काल नाश हो जाता है। आकाश में बादल घिर आये और वे जल की वृष्टि करने लगे।
तब सहस्र मुख वाले स्वयं प्रकाश शेषनाग अपने फनों से छत्र छाया करके गिरती हुई जल की धाराओं का निवारण करते हुए उनके पीछे-पीछे चलने लगे। उस समय यमुना में जल के वेग से बहने के कारण ऊँची लहरें उठती और भँवरें पड़ रही थी। वे सिंह और सर्पादि जंतुओं को भी बहाये लिये जाती थी; किंतु सरिताओं में श्रेष्ठ उन कलिन्दनन्दिनी यमुना ने वसुदेव जी को तत्काल मार्ग दे दिया। नन्दराय जी का सारा व्रज गाढ़ी नींद में सो रहा था। वहाँ पहुँच कर वसुदेव जी ने अपने परम शिशु को यशोदा जी की शय्या पर शीघ्र सुलाकर उस दिव्य कन्या को देखा। यशोदा जी की उस कन्या को गोद में लेकर वसुदेव जी पुन: अपने घर लौट आये। वे यमुना जी को पार करके पूर्ववत अपने घर में स्थित हो गये।
उधर गोपी यशोदा को इतना ही ज्ञात हुआ कि उसे कोई पुत्र या पुत्री हुई है। वे प्रसव वेदना के श्रम से अत्यंत थकी होने के कारण अपनी शय्या पर आनन्द की नींद लेती हुई सो गयी थी। इधर बालक के रोने की आवाज सुनकर पहरेदार राजभवन में उपस्थित हुए और जाकर वीर कंस को बालक के जन्मने की सूचना दी। यह समाचार कान में पड़ते ही कंस भय से कातर हो तुरंत सूतीगृह में जा पहुँचा। उस समय सती-साध्वी बहिन देवकी दीन की तरह रोती हुई भाई से बोलीं।
देवकी ने कहा- भैया ! आप दीन-दु:खियों के प्रति स्नेह और दया करने वाले हैं। मैं आपकी बहिन हूँ, तथापि कारागार में डाल दी गयी हूँ। मेरे सभी पुत्र मार डाले गये हैं। मैं वह अभागिनी माँ हूँ, जिसके बेटों का वध कर दिया गया है। एक मात्र यह बेटी बची है, इसे मुझे भीख में दे दीजिये। यह स्त्री है, इसका वध करना आप- जैसे वीर के योग्य नहीं है। कल्याणकारी भाई ! इस कल्याणी कन्या को तो मेरी गोद में दे ही दीजिये। यही आपके योग्य कार्य होगा।
श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! देवकी के मुँह पर आँसुओं की धारा बह रही थी। उसने मोह के कारण बेटी को आँचल में छिपाकर बहुत विनती की वह बहुत रोयी-गिड़गिड़ायी; तो भी उस दुष्ट ने बहिन को डाँट-डपटकर उसकी गोद से वह कन्या छीन ली। वह यदुकुल का कलंक एवं महानीच था। सदा कुसंग में रहने के कारण उसका जीवन पापमय हो गया था। उस दुरात्मा ने अपनी बहिन की बच्ची के दोनों पैर पकड़कर उसे शिला पर दे मारा। वह कन्या साक्षात योगमाया का अवतार देवी अनंशा थी। कंस के हाथ से छूटते ही वह उछलकर आकाश में चली गयी। सहस्र अश्वों से जुते हुए दिव्य ‘शतपत्र’ रथ पर जा बैठी। वहाँ चँवर डुलाये जा रहे थे। उस शुभ्र रथ पर बैठकर वह दिव्य रूप धारण किये दृष्टिगोचर हुई। उसके आठ भुजाएँ थीं और सब में आयुध शोभा पा रहे थे। वह माया देवी अपने पार्षदों से परिसेवित थी। उसका तेज सौ सूर्यों के समान दिखायी देता था। उसने मेघगर्जनातुल्य गम्भीर वाणी में कहा।
श्री योगमाया बोली- कंस ! तुझे मारने वाले परिपूर्णतम परमात्मा साक्षात भगवान श्रीकृष्ण तो कहीं और जगह अवतीर्ण हो गये। इस दीन देवकी को तू व्यर्थ दु:ख दे रहा है।
श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! उससे यों कहकर भगवती योगमाया विन्ध्यपर्वत पर चली गयीं। वहाँ वे अनेक नामों से प्रसिद्ध हुई। योगमाया की उत्तम बात सुनकर कंस को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने देवकी और वसुदेव को तत्काल बन्धन मुक्त कर दिया।
कंस ने कहा- बहिन और बहनोई वसुदेव जी ! मैं पापात्मा हूँ। मेरे कर्म पापमय हैं। मैं इस यदुवंश में महानीच और दुष्ट हूँ। मैं ही इस भूतल पर आप दोनों के पुत्रों का हत्यारा हूँ। आप दोनों मेरे द्वारा किये गये इस अपराध को क्षमा कर दें। मेरी बात सुनें। मैं समझता हूँ, यह सब काल ने किया-कराया है। जैसे वायु मेघमाला को जहाँ चाहे उड़ा ले जाती है, उसी तरह काल ने मुझे भी स्वेच्छानुसार चलाया है। मैंने देव-वाक्य पर विश्वास कर लिया, किंतु देवता भी असत्यवादी ही निकले। इस योगमाया ने बताया है कि ‘तेरा शत्रु भूतल पर अवतीर्ण हो गया है’। किंतु वह कहाँ उत्पन्न हुआ है, यह मैं नहीं जानता।
श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! यों कहकर कंस बहिन और बहनोई के चरणों पर गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा। उसके मुँह पर अश्रुधारा बह चली। उसने उन दोनों के प्रति सौहार्द (अत्यंत स्नेह) दिखाते हुए उनकी बड़ी सेवा की। अहो ! परिपूर्णतम प्रभु श्रीकृष्णचन्द्र के दया दान दक्ष कटाक्षों से भूतल पर क्या नहीं हो सकता ? तदंतर प्रात:काल दुरात्मा कंस ने प्रलम्ब आदि बड़े-बड़े असुरों को बुलाया और योगमाया ने जो कुछ कहा था, वह सब उनसे कह सुनाया।
कंस ने कहा- मित्रों ! जैसा कि योगमाया ने बताया है, मेरा विनाश करने वाला शत्रु पृथ्वी पर कहीं उत्पन्न हो चुका है। अत: तुम लोग जो दस दिन के भीतर उत्पन्न हुए हैं और जिनको जन्म लिये दस से अधिक दिन निकल गये हैं, उन समस्त बालकों को मार डालो।
दैत्यों ने कहा- महाराज ! जब आप द्वन्द्व-युद्ध में उतरे थे, उस समय रणभूमि में आपके चढ़ाये हुए धनुष की टंकार सुनकर सब देवता भाग खड़े हुए थे, फिर उन्हीं से आप भय क्यों मान रहे हैं ? गौ, ब्राह्मण, साधु, वेद, देवता तथा धर्म और यज्ञ आदि जो दूसरे दूसरे तत्त्व हैं, वे ही भगवान विष्णु के शरीर माने गये हैं; इन सबके विनाश में दैत्यों का बल ही समर्थ माना गया है। यदि महाविष्णु, जो आपका शत्रु है, इस पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ है तो उसके वध का यही उपाय है कि गौ-ब्राह्मण आदि की विशेष रूप से हिंसा का अभियान चलाया जाय॥69-71।
श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! कंस ने दैत्यों को यह करने की आज्ञा दे दी। इस प्रकार उसका आदेश पाकर वे महान उदभट दुष्ट दैत्य आकाश में उड़ चले और गौ, ब्राह्मण आदि को पीड़ा देने तथा नवजात बालकों की हत्या करने लगे। समुद्रपर्यंत समस्त भूमण्डशल में वे इच्छानुसार रूप धारण करने वाले दैत्य सर्पों और चूहों की तरह घर-घर में घुसने और विचरने लगे। उदभट दैत्य तो स्वभाव से ही कुमार्गगामी होते हैं, उस पर भी उन्हें कंस की ओर से प्रेरणा प्राप्त हो गयी थी।
एक तो बन्दर, फिर वह शराब पी ले और उस पर भी उसे बिच्छु डंक मार दे तो उसकी चपलता के लिये क्या कहना ? यही दशा उन दैत्यों की थी, वे भूतग्रस्त से हो गये थे। विदेह कुलनन्दन, मैथिलनरेश, विष्णु भक्त, धर्मात्माओं में मुख्य, परम तपस्वी, प्रतापी, अंगराज, बहुलाश्व जनक! भूमण्डल पर साधु-संतों की यह अवहेलना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों का सम्पूर्णतया नाश कर देती है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के अंतर्गत नारद-बहुलाश्व संवाद में ‘श्रीकृष्ण जन्म वृत्तांत का वर्णन’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ।
टिप्पणियां
- यज्जागरादिषु भवेषु परं ह्यहेतुर्हेतु: स्विदस्य विचरन्ति गुणाश्रयेण । नैतद् विशन्ति महदिन्द्रियदेवसंघास्तस्मै नमोऽग्निमिव विस्तृदतविस्फुतलिंगा: ।। नैवेशितुं प्रभुरयं बलिनां बलीयान् माया न शब्द उत नो विषयी करोति। तद्ब्रह्म पूर्णममृतं परमं प्रशान्तं शुद्धं परात्परतरं शरणं गता: स्म: ।। अंशांशकांशकलाद्यवतार वृन्दैरावेशपूर्णसहितैच्श्र परस्य यस्य। सर्गादय: किल भवन्ति तमेव कृष्णर पूर्णात्परं तु परिपूर्णतमं नता: स्म: ।। मन्वन्तरेषु च युगेषु गतागेतेषु कल्पे षु चांशकलया स्वुवपुर्बिभर्षि। अद्यैव धाम परिपूर्णतमं तनोषि धर्म विधाय भुवि मंगलमातनोषि ।। यद्दुर्लभं विशदयोगिभिरप्यगम्यं गम्यं द्रवद्भिरमलाशयभक्तियोगै:। आनन्दकंद चरतस्त्व मन्दययानपादारविन्दवमकरन्द्रजो दधाम: ।। पूर्वं तथात्र कमनीयवपुष्मोयं त्वांन कंदर्पकोटिशतमोहनमद्भुतं च। गोलोकधामधिषणुद्युतिमादधानं राधापतिं धरमधुर्यधनं दधानम् ।। (गर्ग0, गोलोक0 11। 8-13)
- स्फुरदच्छचविचित्रहारिणं विलसत्कौस्तुपभरत्नरहारिणम्। परिधिद्युतिनूपुरांगदं धृतबालार्क किरीटकुण्डलम् ।।
चलदद्भुतवह्निकंकणं चलदूर्जदगुणमेखलाचितम्। मधुभृद्ध्वनिपद्ममालिनं नवजाम्बूयनददिव्यधवाससम् ।।
सतडिद्घनदिव्यंसौभगं चलनीलालकवृन्दधभृन्मुरखम। चलदंशुतमोहरं परं शुभदं सुन्ददरमम्बुजेक्षणम् ।।
कृतपत्रविचित्रमण्डनं सततं कोटिमनोजमोहनम्। परिपूर्णतमं परात्परं कलवेणुध्वनिवाद्यतत्परम् ।। (गर्ग0, गोलोक0 11। 25-28) - श्रीवसुदेव उवाच- एको य: फ्रकृतिगुणैरनेकधासि हर्ता त्वंस जनक उतास्यं पालकस्व्ंम्। निर्लिप्त : स्फटिक इवाद्य देहवर्णस्तसस्मै श्रीभुवनपते नमामि तुभ्यम् ।। एधस्सु त्वनल इवात्र वर्तमानो योऽन्तय:स्थो बहिरपि चाम्बैरं यथा हि । आधारो धरणिरिवास्य सर्वसाक्षी तस्मै ते नम इव सर्वगो नभस्वान् ।। भूभारोद्भटहरणार्थमेव जातो गोदेवद्विजनिजवत्सीपालकोऽसि । गेहे मे भुवि पुरुषोत्तामोत्तमस्त्वं कंसान्मां भुवनपते प्रपाहि पापात् ।।-(गर्ग0, गोलोक0 11। 31-33)
- हे कृष्णि हेअविगणिताण्डंपते परेश गोलोकधामधिषणध्वसज आदिदेव। पूर्णेश पूर्ण परिपूर्णतम प्रभो मां त्वंिपाहि पाहि परमेश्वलर कंसपापात् ।।
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