05. मथुरा खण्‍ड || अध्याय 01 || कंस का नारदजी के कथनानुसार बलराम और श्रीकृष्‍ण को अपना शत्रु समझकर वसुदेव-देवकी को कैद करना,

गर्ग संहिता
मथुरा खण्‍ड : अध्याय 1

कंस का नारदजी के कथनानुसार बलराम और श्रीकृष्‍ण को अपना शत्रु समझकर वसुदेव-देवकी को कैद करना, उन दोनों भाइयों को मारने की व्‍यवस्‍था में लगना तथा उन्‍हें मथुरा ले आने के लिये अक्रूरजी को नन्‍द के व्रज में जाने की आज्ञा देना

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्‍दं कृष्‍णं वन्‍दे जगद्गुरुम्।।
'जो वसुदेवजी के यहाँ पुत्र-रूप से प्रकट हुए हैं, जिन्‍होंने कंस एवं चाणूर का मर्दन किया है तथा जो देवकी को परमानन्‍द प्रदान करने वाले हैं, उन जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्‍ण की मैं वन्‍दना करता हूँ।

राजा बहुलाश्व ने पूछा- मुने ! भगवान श्रीकृष्‍ण ने मथुरा में कौन-कौन सी लीलाएँ की ? उन्‍होंने कंस को क्‍यों और कैसे मारा ? यह सब मुझसे ठीक-ठीक बताइये।

नारदजी ने कहा- नृपेश्वर ! एक दिन साक्षात परमात्‍मा श्रीहरि के मन से प्रेरित होकर मैं दैत्‍यवध सम्‍बन्‍धी उद्यम को आगे बढ़ाने के लिये उत्‍कृष्‍ट पुरी मथुरा के दर्शनार्थ वहाँ आया। आकर राजा कंस के दरबार में गया। वहाँ कंस इन्‍द्र से छीनकर लाये हुए सिंहासन के ऊपर, जहाँ श्वेत-छत्र तना हुआ था और सुन्‍दर चँवर डुलाये जा रहे थे, विराजमान था। वह बल, पराक्रम और क्रूरता के कारण नागराज के समान दुस्सह प्रतीत होता था। वहाँ पहुँचने पर उसने मेरा पूजन स्‍वागत सत्‍कार किया। उस समय मैंने उससे जो कुछ कहा, वह सुनो- 'मथुरा नरेश ! जो कन्‍या तुम्‍हारे हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गयी थी, वह देवकी की नहीं, यशोदा की पुत्री थी। देवकी से तो श्रीकृष्‍ण ही उत्‍पन्‍न हुए और रोहिणी के पुत्र बलराम हैं। दैत्‍यराज ! वसुदेव ने तुम्‍हारे शत्रुभूत अपने दोनों पुत्र बलराम और श्रीकृष्‍ण को अपने मित्र नन्‍दराज के यहाँ धरोहर के रूप में रख दिया है- इसलिये कि तुम्‍हारें भय से उनकी रक्षा हो सके। पूतना से लेकर अरिष्‍टासुर तक जो-जो उत्‍कट बलशाली दैत्‍य नष्‍ट हुए हैं, वे सब वन में उन्‍हीं दोनों के द्वारा मारे गये हैं। कहा जाता है कि वे ही दोनों तुम्‍हारी मृत्‍यु है'।

मेरे यों कहने पर भोजराज कंस क्रोध से काँपने लगा। उसने शूरनन्‍दन वसुदेव को सभा में ही मार डालने के लिये तीखी तलवार हाथ में ली, परंतु मैंने उसे रोक दिया, तथापि उसने सुदृढ और विशाल बेड़ियों में पत्‍नी सहित उन्‍हें बाँधकर कारागार में बंद कर दिया। कंस के उक्‍त बात कहकर जब मैं चला गया, तब उस दैत्‍यराज ने श्रीकृष्‍ण और बलराम का वध करने के लिये दैत्‍यप्रवर केशी को भेजा। तदनन्‍तर बलवान भोजराज कंस ने चाणूर आदि मल्‍लों तथा कुवलयापीड नामक हाथी के महावत को बुलवाया और अपना कार्यभार सँभालने वाले अन्‍य लोगों को भी बुलाकर उनसे इस प्रकार कहा 
कंस बोला- हे कूट ! हे तोशल ! हे महाबली चाणूर ! बलराम और कृष्‍ण-दोनों मेरी मृत्‍यु हैं, यह बात नारदजी ने मुझे भलीभाँति समझा दी है। अत: वे दोनों जब यहाँ आ जायँ, तब तुम सब लोग मल्‍लों के खेल (कुश्‍ती के दाव-पेच) दिखाते हुए उन्‍हें मार डालना। अब शीघ्र ही मल्‍लभूमि (अखाडे़) को सुन्‍दर ढंग से सुसज्जित कर दो। महावत ! रंगशाला के द्वार पर मदमत्त हाथी कुवलयापीड को खड़ा रखो और मेरे शत्रु जब आ जायँ, तो उन्‍हें मरवा डालो। कार्यकर्ता जनो ! आगामी चतुर्दशी को शान्ति के लिये धनुर्यज्ञ करना है और अमावास्‍या के दिन यहाँ मल्‍लयुद्ध होगा।

नारदजी कहते हैं- राजेन्‍द्र ! आत्‍मीयजनों से इस प्रकार कहकर कंस ने अक्रूर को तुरंत अपने पास बुलवाया और एकान्‍त स्‍थान में मंत्रिजनों को प्रिय लगने वाली मंत्रणा की बात कही।

कंस बोला– दानपते ! तुम मेरे माननीय मंत्री हो, अत: मेरी यह उत्तम बात सुनो। महामते ! कल प्रात:काल होते ही तुम नन्‍द के व्रज में जाओ और मेरा यह कार्य करो। लोग कहते हैं कि वसुदेव के दोनों बेटे वहीं रहते हैं। वे दोनों मेरे शत्रु हैं, यह बात देवर्षि नारदजी ने मुझे अच्‍छी तरह समझा दी है।

 गोपगण नन्‍दराज आदि के साथ भेंट लेकर यहाँ आयें और उन्‍हीं के साथ मथुरा नगरी दिखाने के बहाने उन दोनों को रथ पर बिठाकर शीघ्र यहाँ ले आओ। यहाँ आने पर हाथी से अथवा बड़े-बड़े पहलवानों के द्वारा उन दोनों बालकों को मरवा डालूँगा। उसके बाद वसुदेव की सहायता करने वाले नन्‍दराज, वृषभानुवर, नौ नन्‍दों और उपनन्‍दों को मौत के घाट उतार दूँगा।

तदनन्‍तर वसुदेव, उनके सहायक देवक तथा अपने बूढे पिता उग्रसेन को भी, जो राज्‍य लेने के लिये उत्‍सुक रहता है, मार डालूँगा। यह सब हो जाने के बाद समस्‍त यादवों को संहार कर डालूँगा, इसमें संशय नहीं है। मन्त्रिण ! ये सब-के-सब देवता हैं जो मनुष्‍य के रूप में प्रकट हुए हैं। चन्‍द्रावतीपति बलवान शकुनि मेरा बहुत बड़ा मित्र है। भूतसंतान, हृष्‍ट, वृक, संकर, कालनाभ, महानाभ तथा हरिमश्रु– ये सब मेरे मित्र हैं और बलपूर्वक मेरे लिये अपने प्राण तक दे सकते हैं।

जरासंध तो मेरा श्‍वसुर ही है औ द्विविद मेरा सखा। बाणासुर और नरकासुर भी मेरे प्रति ही सौहार्द रखते हैं। ये सब लोग इस पृथ्‍वी को जीतकर, इन्‍द्र सहित देवताओं को बाँधकर और द्रव्‍य–राशि के स्‍वामी बने हुए कुबेर को मेरूपर्वत की दुर्गम कन्‍दरा में फेंककर सदा तीनों लोकों का राज्‍य करेंगे, इसमें संशय नहीं है। दानपते ! तुम कवियों (नीतिज्ञ विद्वानों) में शुक्राचार्य के समान हो और बातचीत करने में इस भूतलपर बृहस्‍पति के तुल्‍य हो, अत: इस कार्य को तुरंत सम्‍पन्‍न करो।

अक्रूर बोले – यदुपते ! तुमने मनोरथ का महासागर ही रच डाला है। यदि दैवकी इच्‍छा होगी तो यह सागर गोष्‍पद (गाय की खुरी) के समान हो जायगा और यदि दैव अनुकूल न हुआ, तब तो यह अपार महासागर है ही।

कंस बोला– बलवान पुरुष दैव का भरोसा छोड़कर कार्य करते हैं और निर्बल दैव का सहारा पकड़े बैठे रहते हैं। कर्मयोगी पुरुष कालस्‍वरूप श्रीहरि के प्रभाव से सदा निराकुल (शान्‍त) रहता है।

नारद जी कहते हैं– मन्त्रिप्रवर अक्रूर से यों कहकर कंस सभास्‍थल से उठ गया और कुछ कुपित हो धीरे से अन्‍त:पुर में चला गया।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘कंस की मन्‍त्रणा’ नामक पहला अध्‍याय पूरा हुआ।

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य