05. मथुराखण्ड || अध्याय 06 || सुदामा माली और कुब्जा पर कृपा, धनुर्भंग तथा मथुरा की स्त्रियों पर श्रीकृष्ण के मधुर-मोहन रूप का प्रभाव
गर्ग संहिता
मथुराखण्ड : अध्याय 6
सुदामा माली और कुब्जा पर कृपा, धनुर्भंग तथा मथुरा की स्त्रियों पर श्रीकृष्ण के मधुर-मोहन रूप का प्रभाव
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर ग्वालबालों सहित नन्दनन्दन श्रीकृष्ण और बलराम सुदामा नाम वाले एक माली के घर गये, जो फूलों के गजरे बनाया करता था। उन दोनों भाइयों को देखते ही माली उठकर खड़ा हो गया। उसने हाथ जोड़कर नमस्कार किया और फूल के सिंहासन पर बिठाकर गद्गद वाणी में कहा।
सुदामा बोला- देव ! यहाँ आपके शुभागमन से मेरा कुल तथा घर दोनों धन्य हो गये। मैं ऐसा समझता हूँ कि मेरी माता के कुल की सात पीढ़ियां, पिता के कुल की सात पीढ़ियां पत्नी के कुल की भी सात पीढ़ियां वैकुण्ठलोक में चली गयीं। आप दोनों परिपूर्णतम परमेश्वर हैं और भूतल का भार उतारने के लिये इस यदुकुल में अवतीर्ण हुए हैं। मुझ दीनातिदीन के घर आये हुए आप दोनों भाइयों को नमस्कार है। आप परात्पर जगदीश्वर हैं।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! यों कहकर माली ने पुष्पनिर्मित सुन्दर हार और भ्रमरों की गुंजार से निनादित मकरन्द (इत्र, फुलेल आदि) निवेदन करके प्रणाम किया। बलराम सहित भगवान श्रीहरि उस पुष्प-राशि को धारण करे निवकटवर्ती गोपों को भी दिया और हँसते हुए मुख से उस माली से बोले- 'सुदामन ! मेरे चरणारविन्दों में सदा तुम्हारी गुरुतर भक्ति बनी रहे, मेरे भक्तों का संग प्राप्त हो और इसी जन्म में तुम्हें मेरे स्वरूप की प्राप्ति हो जाय।' तदनन्तर बलदेवजी ने भी इसे उसके कुल में निरन्तर बढ़ने वाली लक्ष्मी प्रदान की राजन् ! फिर वे दोनों भाई वहाँ से उठकर दूसरी गली में गये। वहाँ मार्ग में एक कमलनयनी कामिनी जा रही थी। उसके हाथों में चन्दन का अनुलेप-पात्र था। अवस्था में वह युवती थी, किंतु शरीर से कुबड़ी दिखायी देती थी। माधव ने उससे पूछा।
सैरन्ध्री बोली- सुन्दर-शिरोमणे ! मैं कंस की दासी हूँ। महामते ! मेरा नाम कुब्जा है। मेरे हाथ का घिसा हुआ चन्दन भोजराज कंस को बहुत प्रिय है। अब तक तो मैं कंस की ही दासी रही हूँ, किंतु इस समय आपके सामने उपस्थित हूँ। हाथी के शुण्डदण्ड की भाँति जो आपके ये बलिष्ठ भुजण्ड हैं, इनमें मेरा मन लग गया है। आप दोनों भाइयों को छोड़कर दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो इस चन्दनानुलेप के योग्य हो। आप दोनों भाइयों के समान सुन्दर रूप तो त्रिभुवन में कहीं नहीं है।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! हर्ष से भरी हुई कुब्जा ने उन दोनों भाइयों के लिये स्त्रिग्ध अनुलेपन प्रदान किया। उस अंगराग ने वे दोनों बन्धु- बलराम और श्रीकृष्ण बड़ी शोभा पाने लगे। व्रज के अन्य बालकों ने भी थोड़ा-थोड़ा वह दिव्य चन्दन ग्रहण किया। कुब्जा तीन जगह से टेढ़ी थी। श्रीकृष्ण ने उसे तत्काल सीधा करने का विचार किया। उन सर्वव्यापी परमेश्वर अपने चरणों द्वारा उसके पैरों के अग्रभाग को दबाकर उत्तान हाथ की दो अंगुलियों से उसकी ठोढ़ी पकड़ ली ओर लोगों के देखते-देखते उसके तीन जगह टेढ़े शरीर को उचका दिया। फिर तो वह उसी समय छड़ी के समान देहवाली, अत्यन्त रूप-सौन्दर्य से सम्पन्न तन्वंग्डी तरूणी हो गयी और अपनी दीप्ति से रम्भा को भी तिरस्कृत-सी करने लगी। उसके हृदय में कामभाव का उदय हुआ और उससे विहृल हो उस पवित्र मुस्कान वाली सैरन्ध्री ने श्रीहरि का वस्त्र पकड़कर इस प्रकार कहा।
सैरन्ध्री बोली – सुन्दरप्रवर ! अब तुम शीघ्र ही मेरे घर चलो, निश्चय ही मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकूँगी। तुम तो सबके मन की जानने वाले हो, मुझपर कृपा करे। रसिकशेखर ! मानद ! तुमने मेरे मन को बड़े वेग से मथ डाला है।
श्रीनारदजी कहते हैं– राजन् ! तब सब गोप ‘अहो ! यह क्या !’ परस्पर यो कहते हुए ताली पीट-पीटकर हँसने लगे। बलरामजी भी बड़े गौर से यह सब देख रहे थे। उस सुन्दरी के अपने घर चलने-के लिये प्रार्थना करने पर भगवान श्रीहरि ने यह उत्तम बात कही।
श्रीभगवान बोल – अहो ! यह मथुरापुरी अत्यन्त धन्य है, जहाँ बड़े सौम्य स्वभाव के लोग निवास करते हैं, जो अपरिचित राहगीरों को भी अपने घर बुला ले जाते हैं। सुन्दरी ! मैं घूम-फिरकर मथुरापुरी का दर्शन करके तुम्हारे घर आउँगा।
नारदजी कहते हैं– राजन् ! स्त्रेहमयी वाणी द्वारा यो कहकर श्रीकृष्ण ने उसके हाथ से अपने दुपट्टे का छोर खींच लिया और राजमार्ग पर आगे बढते हुए उन्हें कुछ धनी वैश्य दिखायी दिये। उन उत्तम बुद्धिवाले वैश्यों ने पान, फूल, इत्र, दूध और फल आदि द्वारा श्रीहरि का पूजन करके उन्हें उत्तम आसन पर बिठाया और उनके चरणों में प्रणाम किया।
वैश्य बोले– देव ! यदि यहाँ आपका राज्य स्थापित हो जाय तो आप हम आत्मीयजनों का सदा ध्यान रखे, हम आपकी प्रजा हैं। प्राय: राज्य मिल जाने पर कोई किसी का स्मरण नहीं करता। नारदजी कहते हैं– राजन् ! तब अच्युत ने सुन्दर मन्द मुस्कराहट के साथ उन वैश्यों से पूछा– ‘धनुष का स्थान कौन है ?’ किंतु वे वैश्य बड़े चालक थे। उन्हें धनुष के तोड़ दिये जाने की आशंका हुई, इसलिये वे भगवान को उसका स्थान नहीं बता रहे थे। किंतु उनके रूप, गुण माधुर्य से मोहित जो अन्य मथुरावासी थे, वे उन्हें धनुष दिखाने की इच्छा से बोले– ‘कुमार ! आइये, देखिये वह धनुष’ ।
तब उनके दिखाये हुए मार्ग से श्रीकृष्ण धनुष-शाला में प्रवेश किया। वे मथुरावासी समवयस्क पुर-बालकों के साथ मैत्रीभाव की स्थापना भी करते जाते थे। वह धनुष सुनहरे बेल-बूटों से विचित्र था। उसकी लम्बाई सात ताड़ के बराबर थी। वह देखने में इन्द्रधनुष-सा जान पड़ता था। वह इतना अधिक भारी था कि पाँच हजार मनुष्य एक साथ मिलकर ही उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जा सकते थे। उसका निर्माण आठ धातुओं से हुआ था। वह कठोर धनुष एक लाख भार के समान भारी था और चतुर्दशी तिथि को पुरवासियों द्वारा पूजित हो यज्ञमण्डल में स्थापित किया गया था। पूर्वकाल में भृगुकुलनन्दन परशुरामजी ने राजा यदु को वह धनुष दिया था। माधव श्रीकृष्ण ने उसे देखा, वह कुंडली मारकर बैठे हुए शेषनाग के समान प्रतीत होता था। लोग मना करते रह गये, किंतु श्रीकृष्ण ने हठपूर्वक उस धनुष को उठा लिया और पुरवासियों के देखते-देखते खेल-खेल में उसके ऊपर प्रत्यंचा चढ़ा दी।
राजन् ! फिर श्रीहरि अपने भुजदण्डों से उस धनुष को कान तक खींचा और जैसे हाथी ईख के डंडे को तोड़ डालता है, उसी प्रकार उसको बीच से खण्डित कर दिया। टूटते हुए उस धनुष की टंकार बिजली की गड़गड़ाहट के समान प्रतीत हुई। इससे ‘भू:’ आदि सात लोकों तथा सातों पातालों सहित सारा ब्रह्माण्ड गूँज उठा, दिग्गज विचलित हो गये, तारे टूटने लगे, भूखण्ड-मण्डल काँप उठा, पृथ्वी पर रहने वाले लोगों के कान तत्काल बहरे-से हो गये। वह शब्द दो घड़ी तक कंस के हृदय को विदीर्ण करता रहा। उस धनुष की रक्षा करने वाले आततायी असुर अत्यन्त कुपित होकर उठे और श्रीकृष्ण को पकड़ लेने की इच्छा से परस्पर कहने लगे– ‘बाँध लो इसे।’ उन्हें सशस्त्र आक्रमण करते देख बलराम और श्रीकृष्ण ने धनुष के दोनों टुकडे लेकर उन दुर्मद दैत्यों को बड़े वेग से पीटना आरम्भ किया। धनुष-खण्डों के अत्यन्त प्रबल प्रहार से कितने ही वीर तत्काल मूर्च्छित हो गये, किन्हीं के पाँव टूटे, किन्हीं के नख फूटे और कितनों ही के कंधे एवं बाहुदण्ड खण्डित हो गये। इस प्रकार पाँच हजार दैत्यवीर भूमि पर प्राणशून्य होकर सो गये। समस्त मथुरा-वासियों में हलचल मच गयी। बहुत- से लोग उस घटना को देखने के लिये दौडे़ आये। नगरी में सब ओर कोलाहल होने लगा और वहाँ के लोगों के मन में बड़ा भारी भय समा गया। भोजराज कंस के सभामण्डप का छत्र अकस्मात् टूटकर गिर पड़ा।
नरेश्वर ! ग्वाल-बालों तथा बलरामजी के साथ श्रीकृष्ण संध्या के समय धनुषशाला से नन्दराज के निकट आ गये, मानो वे अत्यन्त डर गये हों। गोविन्द का वह अद्भुत सुन्दर रूप देखकर मथुरापुरी की वनिताएँ विशेषरूप से मोहित हो गयीं। उनके वस्त्र खिसक गये, गूँथी हुई चोटियाँ ढीली पड़ गयीं, हृदय में प्रेमजनित पीड़ा जाग उठी और वे अपनी सखियों से परस्पर इस प्रकार कहने लगीं।
पुरस्त्रियाँ बोलीं– सखियों ! करोड़ों कामदेवों की कान्प्ति धारण किये श्रीहरि बड़ी उतावली के साथ मथुरापुरी में स्वछन्द विचरने लगे हैं और जिन किन्हीं युवतियों ने उन्हें देखा है, उन हम जैसी सभी स्त्रियों के समस्त अंगों में वे अंग बनकर समाविष्ट हो गये
कुछ चतुरा स्त्रियों ने कहा- क्या इस पुरी में एसी क्रूर स्त्रियाँ नहीं हैं, जो अनंगमोहन श्रीकृष्ण के सारे अंगों को घूर-घूरकर देखती हैं ? हम सब उन परमानन्दमय सर्वांगसुन्दर श्रीकृष्ण को भर आँख नहीं निहारती ? सखी ! किसी के किसी एक ही अंग में सौन्दर्य-माधुर्य दिखायी देता है और वहीं हमारे नेत्र पतंग के समान टूट पड़ते है, परंतु जो सर्वांगसुन्दर एवं मनोहर हैं, उन्हें केवल नेत्र से पूर्णतया कैसे देखा जा सकता है ? नन्दनन्दन का अंग-अंग सुन्दर है, उसमें जहाँ-जहाँ भी दृष्टि पड़ती है, वहीं-वहीं परम सुख पाकर वहाँ लौटने का नाम नहीं लेती। वे लावण्य के महासागर हैं। उनमें हमारा चित्त किस तरह लगा है, मानों उसी में डूब गया हो। मिथिलेश्वर ! नगर की जिन स्त्रियों ने दिन में व्रजरानन्दन को देखा, उन्होंने स्वप्न में भी उन्हीं का दर्शन किया। फिर जिन्होंने स्वप्न में भी उन्हीं का दर्शन किया। फिर जिन्होंने रासमण्डल में उनके साथ रासलीला की, वे गोपांग्नाएँ उनके मधुर मनोहर रूप का कैसे निरन्तर स्मरण न करें।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘मथुरा दर्शन' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ।
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