05. मथुराखण्‍ड || अध्याय 12 || चाणूर आदि मल्‍ल, कंस के छोटे भाइयों तथा पंजन चदैत्‍यके पूर्वजन्‍मगत वृतान्‍त का वर्णन

गर्ग संहिता
मथुराखण्‍ड : अध्याय 12

 चाणूर आदि मल्‍ल, कंस के छोटे भाइयों तथा पंजन चदैत्‍य के पूर्वजन्‍मगत वृतान्‍त का वर्णन

बहुलाश्व ने पूछा– चाणूर आदि जो मल्‍ल थे, वे पूर्वजन्‍म में कौन थे, जो यहाँ मथुरापुरी में आये थे ? अहो ! उनका कैसा सौभाग्‍य है कि साक्षात् श्रीकृष्‍ण-चन्‍द्र के साथ उन्‍हें युद्ध का अवसर मिला।

नारदजी ने कहा– राजन् ! पूर्वकाल में अमरावतीपुरी में उतथ्‍य नाम से प्रसिद्ध महामुनि निवास करते थे। उनके पाँच पुत्र हुए, जो कामदेव के समान कान्तिमान थे। उन लोगों ने विद्या, स्‍वाध्‍याय और जप छोड़कर मद से उन्‍मत् हो राजा बलि के यहाँ जाकर प्रतिदिन मल्‍ल्‍युद्ध की शिक्षा लेनी आरम्‍भ की। अपने पुत्रों को ब्राह्मणोचित कर्म से सर्वथा भ्रष्‍ट, वेदाध्‍ययन से रहित तथा मदमत्त हुआ देख मुनिश्रेष्‍ठ उतथ्‍य ने रोषपूर्वक उनसे कहा।

उतथ्‍य बोले– शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान तथा आस्तिकता- ये ब्राह्मण के स्‍वाभाविक कर्म हैं। शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्धभूमि में पीठ न दिखाना, दान तथा ऐश्वर्य- ये क्षत्रिय के स्‍वाभाविक कर्म हैं। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्‍य- ये वैश्‍य के स्‍वभावजकर्म हैं तथा सेवात्‍मक कर्म शूद्र के लिये भी स्‍वाभाविक है। दुर्जनो ! तुम लोग ब्राह्मण के पुत्र होकर भी ब्राह्मणोचित कर्म से दूर रहकर क्षत्रियोचित मल्‍ल युद्ध का कार्य कैसे करते हो ? अत: तुम लोग भारत भूमि पर मल्‍ल हो जाओ और असुरों के संग से शीघ्र ही दुर्जन बन जाओ।

 नारदजी कहते हैं– राजन् ! वे उतथ्‍य के पुत्र ही पृथ्‍वी पर मल्‍लों के रूप में उत्‍पन्‍न हुए। नरेश्वर ! उन्‍होंने श्रीकृष्‍ण के शरीर का स्‍पर्श करने मात्र से परम मोक्ष प्राप्‍त कर लिया। इस प्रकार मैंने चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल- इन मल्‍लों के पूर्वचरित्र का वर्णन किया, अब और क्‍या सुनना चाहते हो ?

बहुलाश्व ने पूछा– मुने ! कंस के छोटे भाई जो कंक, न्‍यग्रोध आदि आठ योद्धा थे, वे सब पूर्वजन्‍म में कौन थे ? जो कि परम मोक्ष को प्राप्‍त हुए, यह बताइये !

नारदजी ने कहा– राजन् ! पूर्वकाल की बात है, कुबेर की राजधानी अलका में 'देवयक्ष' नाम से प्रसिद्ध एक यक्ष रहता था। वह ज्ञानी, ज्ञानपरायण, शिव-भक्ति से सम्‍मानित तथा महातेजस्‍वी था। उसके आठ पुत्र हुए जिनके नाम इस प्रकार हैं- देवकूट, महागिरि, गण्‍ड, दण्‍ड, प्रचण्‍ड, खण्‍ड, अखण्‍ड, और पृथु। एक दिन शिवपूजा के निमित्त अरूणोदय की वेला में एक सहस्‍त्र पुण्‍डरीक-पुष्‍प लाने के लिये देवयक्ष की आज्ञा पाकर वे सब गये। उन्‍होंने भ्रमरों के गुंजारव संयुक्‍त सहस्‍त्र कमल-पुष्‍प मानसरोवर से लाकर, उनकी गन्‍ध को लोभ से सूँघकर पिता को अर्पित किये। फूलों की उच्छिष्‍ट करने के दोष से शिवपूजा से तिरस्‍कृत हुए वे मूढ़ यक्ष तीन जन्‍मों के लिये असुर योनि को प्रा‍प्‍त हुए। मिथिलेश्वर ! कंस के छोटे भाईयों के पूर्वजन्‍म का यह वृतान्‍त मैंने कहा, तुम और क्‍या सुनना चाहते हो 

बहुलाश्व ने पूछा– ब्रह्मन् ! यह शंखरूपधारी दैत्‍य पंचजन पूर्वजन्‍म में कौन था, जिसकी अस्थियों का शंख भगवान श्रीकृष्‍ण के करकमल में सुशोभित हुआ ? ।

नारदजी कहते हैं– विदेहराज ! पूर्वकाल से ही ये चक्र आदि त्रिलोकीनाथ श्रीहरि के उपांग रहे हैं। वे सब-के-‍सब उनके तेज से संग्रहीत हुए थे। राजन् ! उनमें से पाञ्चजन्‍य शंख को बड़ी उँची पदवी प्राप्‍त हुई। वह श्रीकृष्‍ण के मुँह से लगकर उनके अधरामृत का पान किया करता था ।

 एक दिन शंखराज ने मन-ही-मन मान का अनुभव किया और इस प्रकार कहा- 'मेरी कान्ति राजहंस के समान श्वेत है। मुझे साक्षात श्रीहरि ने अपने हाथों से गृहीत किया है। मैं दक्षिणावर्त शंख हूँ और युद्ध में विजय प्राप्‍त होने पर श्रीकृष्‍ण मुझे बजाया करते हैं। भगवान श्रीकृष्‍ण जो अधरामृत क्षीरसागर कन्‍या लक्ष्‍मी के लिये भी दुर्लभ है, उसेमैं दिन-रात पीता रहता हूँ, अत: मैं सबसे श्रेष्‍ठ हूँ।' विदेहराज ! इस प्रकार मान प्रकट करते हुए पाञ्चजन्य शंख को लक्ष्‍मी ने क्रोधपूर्वक शाप दिया - 'दुर्मते ! तू दैत्‍य हो जा।' वही शंखराज समुद्र में यह पंचजन नामक दैत्‍य हुआ था, जो वैरभाव से भजन के कारण पुन: देवेश्वर श्रीहरि को प्राप्‍त हुआ। उसकी ज्‍येाति देवेश्वर श्रीकृष्‍ण में लीन हो गयी और अब वह उन्‍हीं के हाथ में शोभा पाता है। उस शंखराज का सौभाग्‍य अद्भुत है, अब तुम और क्‍या सुनना चाहते हो ? ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘चाणूर आदि मल्‍लों, कंस के भाइयों तथा पंचजन दैत्‍य के पूर्वजन्‍म का उपाख्‍यान' नामक बारहवाँ अध्‍याय पूरा हुआ ।

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