05. मथुराखण्ड || अध्याय 17 || श्रीकृष्ण को स्मरण करके श्रीराधा तथा गोपियों के करूण उद्गार
गर्ग संहिता
मथुराखण्ड : अध्याय 17
श्रीकृष्ण को स्मरण करके श्रीराधा तथा गोपियों के करूण उद्गार
श्रीनारद जी कहते हैं– राजन् ! श्रीकृष्ण का यह संदेश सुनकर प्रसन्न हुई गोपांग्नाएँ आँसू बहाती हुई गदगद कण्ठ से उद्धव से बोलीं।
गोलोकवासिनी गोपियों ने कहा- उद्धव ! पहले के प्रियजनों को त्यागकर श्रीकृष्ण परदेश चले गये, उस पर भी वहाँ से उन्होंने योग लिख भेजा है। अहो ! निर्मोहीपन का बल तो देखो।
द्वारपालिका गोपिकाएँ बोलीं- सखियों ! देखो, चन्द्रमा की चकोर पर, सूर्य की कमल पर, कमल की भ्रमर पर तथा मेघ की चातक पर जैसे कभी प्रीति नहीं होती, उसी प्रकार श्याम सुन्दर का हमलोगों पर प्रेम नहीं है।
श्रृंगार धारण कराने वाली गोपियों ने कहा- सखियों ! चकोर चन्द्रमा का मित्र है, पंरतु उसके भाग्य में सदा आग की चिनगारियाँ चबाना ही बदा है। विधाता ने जिसके भाग्य जो कुछ लिख दिया है, कभी कम नहीं होता।
शय्योपकारिका गोपियाँ बोलीं- वधिक भी मृगों को बाण मारकर तुरंत आतुर हो उनकी सुध लेता है, किंतु कटाक्षों से अपने प्रियजनों को घायल करके कोई निर्मोही उनका स्मरण तक न करे- यह कैसा आश्चर्य है ?
पार्षदा गोपियों ने कहा- विरहजनित दु:ख को कोई विरही ही जानता है, दूसरा कोई भी कभी उस दु:ख को नहीं समझ सकता- जैसे जिसके अंगों में काँटा गड़ा है, उसकी पीड़ा को वही जानता है, जिसके पहले कभी काँटा गड़ चुका है, जिसके शरीर में कभी काँटा गड़ा ही नहीं, वह उसके दर्द को क्या जानेगा ?
वृन्दावन पालिका गोपियाँ बोलीं- निष्काम प्रेम के सुख को निष्काम प्रेमी ही जानता है। जो किसी कारण या कामनाओं को लेकर प्रेम करता है, वह निष्काम प्रेम के सुख को क्या जानेगा ? क्या कभी कर्मेन्द्रियाँ रस का अनुभव कर सकती हैं।
गोवर्धन-वासिनी गोपियों ने कहा- पुरवनिताओं से प्रेम करने वाला अब सैरन्ध्री (कुब्जा) का नायक बन बैठा है। उसे पर्वत एवं वन में रहने वाली स्त्रियों से क्या लेना है। इस विषय में अधिक कहना व्यर्थ है।
कुंजविधायिका गोपियाँ बोलीं- हाय ! मत वाले भ्रमरों के गुंजारव से व्याप्त माधवी कुंज-पुंज में से जिनको हम सदा अपनी आँखों में बसाये रखती थी, उनकी आज यह कथा सुनी जाती है।
निकुंजवासिनी गोपियों ने कहा- वृन्दावन में मत वाले भ्रमरों के समुदाय से युक्त यमुनातटवर्ती कदम्ब-कुंज में धीरे-धीरे बलराम, गवाल-बाल और गोधन के साथ विचरते हुए नन्दनन्दन का हम भजन करती हैं ।
यमुनाजी के यूथ में सम्मिलित गोपियाँ बोलीं- कब हमारा भी वैसा ही समय होगा, जैसा आज मथुरा-पुरवासिनी स्त्रियों का देखा जाता है ? व्रजांग्नाओं ! शोक न करो। किसी की कभी सदा जय या पराजय नहीं होती। विधाता के हृदय मे तनिक भी दया नहीं है, जैसे बालक खिलौनों को अलग करता और मिलता है, उसी प्रकार वह विधाता समस्त भूतों को संयुक्त और वियुक्त करता रहता है। जो पहले कुबड़ी थी, वह आज सीधी और समान अंग वाली हो गयी, जो दासी थी, वह कुलीन हो गयी तथा जो कुरूपा थी, वह रूपवती होकर चमक उठी है। अहो ! चार ही दिनों में वह अपनी विजय के नगारे पीटने लगी है।
विरजा-यूथ की गोपियों ने कहा- किसी की भी बाँह सदा प्रिय के कंधे पर नहीं रहती, किसी भी वन में सदा वसन्त नहीं होता, कोई भी सदा जवान नहीं रहता, ये देवराज इन्द्र भी सदा राज्य नहीं करते हैं। कोई चार दिनों के लिये भले ही खूब मानकर ले।
ललिता-यूथ की गोपियाँ बोलीं- मन्थरा भी कुबड़ी थी, जिसने अयोध्यापुरी में श्रीरामचन्द्रजी के राज्यभिषेक को रोकवाकर उसमें विघ्न उपस्थित कर दिया। वह कुब्जा ही यह मथुरापुरी में आ गयी है। गोपिकाओं ! जो कुब्जा है, वह क्या-क्या नहीं कर सकती ?
विशाखा-यूथ की गोपियों ने कहा- जो गौएँ चराने के लिये अनुगामी ग्वाल-बालों के साथ वन में जाते हैं और लौटते समय वंशीनाद के द्वारा नगर-गाँव के लोगों को अपने आगमन का बोध करा देते हैं तथा जो अपनी गति से मतवाले हाथी की चाल का अनुकरण करते है, उन नन्दनन्दन को हम भुला नहीं सकतीं।
माया-यूथ की गोपियाँ बोलीं- साँकरी गलियों में हमारा आँचल पकड़कर, हठात हमें अपनी भुजाओं में भरकर और हृदय से लगाकर परस्पर की खींचातानी से हर्ष और भय का अनुभव करने वाले उन श्रीहरि को हम कब अपने घरों में ले जायेगी ?
अष्टसखियों ने कहा- उद्धव ! उन सर्वांग सुन्दर नन्दनन्दन को निहारकर हमारे नेत्र अब संसार की ओर नहीं देखते- नहीं देखना चाहते। वे ही नन्द-राजकुमार मथुरापुरी में विराज रहे हैं। शीघ्र बताओ, अब हमारा क्या होगा ?
षोडश सखियाँ बोलीं- वन में प्रेमपीड़ा को बढ़ाने वाली बाँसुरी की मधुर तान सुनकर हमारे दोनों कान अब संसारी गीत नहीं सुनना चाहते, वे तो कौओं की 'काँव-काँव' के समान कड़वे लगते हैं।
बत्तीस सखियों ने कहा- अपने मित्र को प्रीति से, शत्रु को नीति से, लोभी को धन से, ब्राह्मण को आदर से, गुरु को बारंबार प्रणाम से तथा रसिक को रस से वश में किया जाता है, परंतु निर्मोही को कोई कैसे वश में कर सकता है ?
श्रुतिरूपा गोपियाँ- जो जाग्रत आदि अवस्था में व्याप्त होकर भी उनसे परे हैं तथा इस जगत के हेतु होते हुए भी वास्तव में अहेतु हैं, ये समस्त गुण जिनसे ही प्रेरित होकर अपने-अपने विषयों की ओर प्रवाहित होते है, तथा जैसे आग से निकली हुई चिनगारियाँ पुन: उसमें प्रविष्ट नहीं होती, उसी प्रकार महत्तत्व, इन्द्रिय समुदाय जिनमें प्रवेश नहीं पाते, उन परमात्मा को नमस्कार है।
ऋषिरूपा गोपियों ने कहा- बलवानों में भी अत्यन्त बलिष्ठ यह काल जिन पर अपना शासन चलाने में समर्थ नहीं है, माया भी जिनको वशीभूत नहीं कर पाती तथा वेद भी जिन्हें अपनी विधिवाक्यों का विषय नहीं बना पाता, उस अमृतस्वरूप, परम प्रशान्त, शुद्ध परात्पर पूर्णब्रह्म की हम शरण लेती हैं।
देवांग्नास्वरूपा गोपियाँ बोलीं - जिन परमेश्वर के अंशांश, अंश कला, आवेश तथा पूर्ण आदि अवतार होते हैं, और जिनसे ही इस जगत की सृष्टि, पालन एवं संहार होते है, उन पूर्ण से भी परे परिपूर्णतम श्रीकृष्ण को हम प्रणाम करती हैं।
यज्ञसीतारूपा गोपियों ने कहा- ये श्याम-सुन्दर निकुंज लतिकाओं के लिये कुसुमाकर (वसन्त) हैं, श्रीराधा के हृदय तथा कण्ठ को विभूषित करने वाले हार हैं, श्रीरासमण्डल के अधिपति हैं, व्रजमण्डल के ईश्वर हैं तथासतस्त ब्रह्मण्डों के महीमण्डल का परिपालन करने वाले हैं।
रमा वैकुण्ठवासिनी गोपियाँ बोलीं- जिन्होंने समस्त गोपीयूथ को अलंकृत किया, अपनी चरण-रज से वृन्दावन तथा गिरिराज गोवर्धन को विभूषित किया तथा जो सम्पूर्ण लोगों के अभ्युदय के लिये इस भूमण्डल पर आविर्भूत हुए, उन नागराज के समान परिपुष्ट भुजा वाले अनन्त लीला-विलासशाली श्रीश्यामसुन्दर का हम भजन करती हैं।
श्वेतद्वीप की सखियों ने कहा- जैसे बालक कुकुरमुत्ते को बिना श्रम के उठा लेता है और जैसे गजराज अपनी सूँड से अनायास ही कमल को उठा लेता है, उसी प्रकार जिन्होंने खिलवाड़ में ही पर्वत को एक हाथ उठाकर अद्भुत शोभा प्राप्त की, वे कृपानिधान श्रीव्रजराजनन्दन हमें कभी विस्मृत नहीं होते।
उर्ध्ववैकुण्ठवासिनी गोपियाँ बोलीं - हमारी श्यामवर्णमयी आँखे सारे जगत को श्याम मय ही देखती हैं, इन्हें द्वैत तो दीखता ही नहीं, फिर ये योग का सेवन क्या करेंगी ?
लोकाचलवासिनी गोपियों ने कहा- स्नेह का पाश दृढ़ होता है। वह कभी टूटने-कटने वाला नहीं है। हम उसे नहीं काट सकतीं श्रीहरि के सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं कर सकता। एकमात्र वे ही ऐसे हैं, जो नागपाश को काटने वाले गरुड़ की भाँति इस स्नेहपाश को काटकर मथुरा चले गये।
अजितपदाश्रिता गोपियाँ बोलीं- हमारे दोनों नेत्र श्रीकृष्ण में लग गये हैं, दसों दिशाओं मे दौड़ लगाने पर भी अन्यत्र कहीं उसी प्रकार नहीं टिक पाते, जैसे कमल से जिसकी लगन लगी है, वह भ्रमर अन्य फूलों पर कदापि नहीं जाता।
श्रीसखियों ने कहा- लोग अपनी कृपणता से यश को, क्रोध से गुणसमूह के उदय को, दुर्व्यसनों से धन को तथा कपटपूर्ण बर्ताव से मैत्री को नष्ट कर देते हैं ।।30।। मिथिलावासिनी स्त्रियाँ बोली- धन देकर तन की रक्षा करे, तन देकर लाज बचाये तथा मित्र का कार्य सिद्ध करने के लिये आवश्यकता पड़ जाये तो धन, तन और लाज-तीनों का उत्सर्ग कर दे।
कोसलप्रान्तवासिनी गोपियों ने कहा - वियोगजनित दु:ख की दशा को जीवात्मा के बिना दूसरा कोई नहीं जानता है, परंतु वह उसे बताने में असमर्थ है। (बताती है वाणी, किंतु उसे उस दु:ख का अनुभव नहीं है।) भले ही बाणों से आघात से हृदय विदीर्ण हो जाय, किंतु कभी किसी को प्रिय-वियोग का कष्ट न प्राप्त हो।
अयोध्यापुरवासिनी गोपियाँ बोलीं- पहले निराश करके फिर आशा दे दी और अपने मथुरा की आशा (दिशा) में चले गये ? उसके ऊपर हमारे लिये योग लिखा है। अहो ! निर्मोही जनों का चित्र (या चित्त) विचित्र होता है।
पुलिन्दी गोपियों ने कहा- पूर्वकाल की बात है, दण्डकवन में शूर्पणखा अत्यन्त विहृल होकर इन्हें अपना पति बनाने के लिये इनके पास आयी, किंतु इन्होंने सुमित्रा कुमार को प्रेरणा देकर बलपूर्वक उसे कुरूप बना दिया। ऐसे पुरुष से आप सबको कृपा की आशा कैसे हो रही है ?
सुतलवासिनी गोपियाँ बोलीं- राजा बलि भगवत्भक्त, सत्यपरायण और बहुत अधिक दान करने वाले थे, परंतु उनसे भेंट-पूजा लेकर जिन्होंने कुपित हो उन्हें बन्धन में डाल दिया था, उस वामनरूपधारी कपट-ब्रह्मचारी बने हुए श्रीहरि की न जाने लक्ष्मी जी या अन्य भक्तजन कैसे सेवा करते हैं ?
जालंधरी गोपियों ने कहा- पूर्वकाल में असुर-श्रेष्ठ भक्तप्रवर कयाधूकुमार प्रह्लाद को बहुत अधिक कष्ट सहन करना पड़ा, तब कहीं नृसिंहरूप धारण करके इन्होंने उनकी सहायता की। अहो ! इनमें निष्ठुरता की पराकाष्ठा प्रत्यक्ष देखी जाती है।
भूमिगोपियाँ बोलीं - अहो ! अत्यन्त निर्मोही जनका चरित्र अत्यन्त विचित्र होता है, वह कहने-योग्य नहीं हैं। मुख से और ही बात निकलेगी, किंतु हृदय में कोई और ही विचार रहेगा। ऐसे लोगों को देवता भी नहीं समझ पाते, फिर मनुष्य कैसे जान सकता है ?
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘श्रीकृष्ण की याद में गोपियों के वचन' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ।
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