05. मथुराखण्ड || अध्याय 19 || श्रीकृष्ण का उद्धव के साथ व्रज में प्रत्यागमन और यमुना-तट पर गौओं का उनके रथ को चारों ओर से घेर लेना, गोपों के साथ उनकी भेंट, नन्दगाँव से नन्दरायजी एवं यशोदा-का गोपों एवं गोपियों को लेकर गाजे-बाजे के साथ उनकी अगवानी के लिये निकलना तथा सबके साथ श्रीकृष्ण का नन्द नगर में प्रवेश
गर्ग संहिता
मथुराखण्ड : अध्याय 19
श्रीकृष्ण का उद्धव के साथ व्रज में प्रत्यागमन और यमुना-तट पर गौओं का उनके रथ को चारों ओर से घेर लेना, गोपों के साथ उनकी भेंट, नन्दगाँव से नन्दरायजी एवं यशोदा-का गोपों एवं गोपियों को लेकर गाजे-बाजे के साथ उनकी अगवानी के लिये निकलना तथा सबके साथ श्रीकृष्ण का नन्द नगर में प्रवेश
श्रीनारदजी कहते हैं– राजन् ! इस प्रकार भक्त का वचन सुनकर भक्त वत्सल अच्युत ने अपने कहे हुए वचन को याद करके व्रज में जाने का विचार किया। समस्त कार्यभारों पर दृष्टि रखने के लिये बलदेवजी को मथुरा ही छोड़कर चंचल घोड़ों से जुते हुए किंकिणीजालमण्डित सुवर्ण जटित सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर उद्धव के साथ आरूढ़ हो भगवान श्रीकृष्ण भक्तों को दर्शन देने के लिये नन्दगाँव को गये। गोवर्धन, गोकुल और वृन्दावन को देखते हुए श्रीकृष्ण यमुना के मनेाहर तट पर पहुँचे। व्रजेश्वर श्रीकृष्ण को देखते ही कोटि-कोटि गौएँ चारों ओर से दौड़ती हुई उनके पास आ गयीं। उन सबके स्तनों से स्नेह के कारण दूध झर रहा था। वे कान और पूँछ उठाकर रँभा रही थीं। उनके साथ बछडे़ भी थे। मुख में घास के ग्रास लिये खड़ी हुई गौएँ नेत्रों से आनन्द के आँसू बहा रही थीं। उनकी व्यथा-वेदना दूर हो गयी थी।
राजन् ! जैसे बादल रथ, अरूण और अश्वों सहित शरत्काल के सूर्य को ढक लेते हैं, उसी प्रकार उद्धव के देखते-देखते गौओं ने उस रथ को सब ओर से घेर लिया। गोपाल श्रीहरि उन सब गौओं को अलग-अलग नाम बोलकर अपने श्रीहस्त से उनके अंगों को सहलाते हुए बडे़ हर्ष को प्राप्त हुए। गौओं के समुदाय को उनके समीप गया देख श्रीदामा आदि व्रज-बालक विस्मित हो परस्पर कहने लगे।
गोप बोले– सखाओं ! उस वायु के समान वेगशाली तथा कांस्यपत्र (झाँझ) की ध्वनि के समान शब्द करने वाले, कलश और ध्वज सहित रथ को, जिसमें सैकड़ों अश्व जुते हैं तथा जो शत सूर्यों के समान शोभाशाली है, गौओं ने कैसे घेर लिया है ? गौओं के इस हर्ष से यह सूचित होता है कि इस रथ पर दूसरा कोई नहीं, साक्षात व्रजराजनन्दन ही आ रहे हैं, क्योंकि हमारे दाहिने अंग भी फड़क रहे हैं और नीलकण्ठ पक्षी हमारे ऊपर उठकर बंदनवार का-सा विस्तार करते हैं।
श्रीनारदजी कहते है– राजन् ! मन-ही-मन ऐसा विचार करके वे सब गोप वहाँ आ गये। आने पर उन लोगों ने अपने मित्र माधव को उसी प्रकार देखा, जैसे साधारण जन अपनी खोयी हुई वस्तु के मिल जाने पर उसे देखते हैं। उन पर दृष्टि पड़ते ही साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण रथ से कूद पड़े और उन सबको आगे करके, प्रेमविह्वल हो अपनी दोनों भुजाओं से भेंटने लगे। नेत्र कमलों से अश्रुधारा बहाते हुए उन्होंने पृथक-पृथक सबको हृदय से लगाया। अहो ! इस भूतल पर भक्ति के माहात्म्य का वर्णन कौन कर सकता है ? मिथिलेश्वर ! वे सब गोप नेत्रों से आँसू बहाते हुए फूट-फूटकर रोने लगे। श्रीकृष्ण के वियोग से वे इतने विह्वल हो गये थे कि मिल जाने पर भी सहसा उनसे कुछ कहने में समर्थ न हो सके। तब साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीहरि उन प्रेमानन्द से विह्वल सखाओं को मधुर वाणी से आश्वासन दिया। श्रीकृष्ण ने ग्वाल-बालों के साथ उद्धव को अपने आने का समाचार देने के लिये भेजा। उद्धव ने नन्द-नगर में जाकर बताया कि ‘श्रीकृष्ण पधारे हैं’ ।
गोपवल्लभ नन्दनन्दन श्रीकृष्ण का आगमन सुनकर समस्त गोप परिपूर्ण मनोरथ होकर उन्हें लिवा लाने के लिये निकले। भेरी, मृदंग, पटह आदि बाजे मधुरस्वर में बजने लगे। भरे हुए कलश लिये ब्रह्मण-लोग वेदमन्त्रों का उच्चारण करने लगे। लाजा (खील) आदि मांगलिक वस्तुओं से मिश्रित गन्ध और अक्षत साथ ले यशोदा के साथ श्रीनन्दराज अगवानी के लिये गये। तत्पश्चात् सिन्दूर-रंचित सूँड में सोने की साँकल धारण किये मदोन्मत हाथी को आगे रखकर भानुतुल्य तेजस्वी श्रीवृषभानुवर अपनी रानी कलावती के साथ वहाँ आये। नन्द, उपनन्द, वृषभानु, बुढे, जवान और बालक गोप पूर्णमनोरथ हो, फूलों के हार, बाँसुरी, गुंजा और मोरपंख लिये नगर से बाहर निकले। नरेश्वर ! गोप-बालक श्रीकृष्ण के दर्शन की बड़ी भारी लालसा लिये, हाथों में वंशी, बेंत और विषाण (सींग) धारण किेये, बडे़ हर्ष के साथ नन्दनन्दन के गुण गाते और पीले वस्त्र हिला-हिलाकर नाचते थे।
सखियों के मुख से श्रीहरि के शुभागमन का शुभ संवाद सुनकर श्रीराधा शयन से उठ खड़ी हुई और महान हर्ष से युक्त हो उन्होंने उन सबको अपने भूषण उसी प्रकार लुटा दिये, जैसे प्रसन्न हुई नूतन पद्यिनी अपनी सुगन्ध लुटाया करती है। मिथिलेश्वर ! गोपांग्नाओं के आठ, सोलह, बत्तीस और दो यूथों के राधा मनोहर शिविका पर आरूढ़ हो श्रीधर के दर्शन के लिये आयीं। नृपेश्वर ! इसी प्रकार करोड़ों गोपियाँ अपने घर का सारा काम-काज छोड़कर, उलटे-सीधे वस्त्र और आभूषण धारण किये वहाँ आयीं। प्रेम के कारण वे मन के समान तीव्र गति से चल रही थीं। ऐसा लगता था कि वृक्ष, गौ, मृग और पक्षियों सहित सारा व्रजमण्डल श्रीकृष्ण को आया हुआ देख प्रेम से आतुर हो उठा है।
श्रीकृष्ण ने मस्तक पर अंजलि बाँधे पिता श्रीनन्दराज को और मैया यशोदा को प्रणाम किया। बहुत दिनों के बाद आये हुए अपने पुत्र को दोनों भुजाओं में भरकर और हृदय से लगाकर श्रीनन्दराज ने अपने नेत्र जल से उनको नहला दिया। यशोदा सहित श्रीनन्द का मनोरथ आज चिरकाल के बाद पूर्ण हुआ था। नन्द, उपनन्द और वृषभानु आदि सम्पूर्ण बडे़-बूढे़ गोपों को प्रणाम करके, उनके आशीर्वाद ले श्रीकृष्ण समवयस्क मित्रों से परस्पर गले मिले और अपने छोटे सखाओं-का हाथ पकड़कर उनके साथ बैठे।
तदनन्तर श्रीहरि यशोदा सहित नन्द को हाथी पर चढ़ाकर स्वयं रथ पर बैठे और उपनन्द तथा गो-समुदाय के साथ श्रीनन्दराज के नगर मे प्रविष्ट हुए। उसी समय देवताओं ने उन पर फूलों की वर्षा की और पुरवासिनी गोपांग्नाओं ने अचार प्राप्त लावा (खील) बिखेरें। श्रीहरि के घर पधारने पर गोपों वहाँ “जय हो, जय हो”- ऐसे मांगलिक शब्द का बांरबार उच्चारण किया। उस समय आर्त हुए गोपगण गद्गदवाणी मे कहने लगे- ‘लाला ! तुम्हारा यह सखा उद्धव परम धन्य है, क्योंकि इसने गोपजनों के साक्षात तुम्हारा दर्शन करा दिया’। नृपेश्वर ! इस प्रकार मैंने श्रीहरि के व्रज मे पुनरागमन का वृत्तान्त तुमसे कह सुनाया, अब और क्या सुनना चाहते हो ? श्रीहरि का यह विचित्र चरित्र देवताओें और असुरों के लिए भी परम कल्याणप्रद है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘श्रीकृष्ण का व्रज में आगमनोत्सव’ नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ।
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