05. मथुराखण्‍ड || अध्याय 20 || श्रीकृष्ण का कदली-वन मे श्रीराधा और गोपियों के साथ मिलन, रासोत्सव तथा उसी प्रसंग मे रोहिताचल पर महामुनि ऋभु का मोक्ष

गर्ग संहिता
मथुराखण्‍ड : अध्याय 20

श्रीकृष्ण का कदली-वन मे श्रीराधा और गोपियों के साथ मिलन, रासोत्सव तथा उसी प्रसंग मे रोहिताचल पर महामुनि ऋभु का मोक्ष

बहुलाश्र्व ने पूछा- मुने ! साक्षात भगवान ने व्रज मण्डल मे पधाकर आगे कौन-सा कार्य किया ? श्रीराधा तथा गोपांग्‍नाओं को किस प्रकार दर्शन दिया ! गोपियों के मनोरथ पूर्ण करके वे पुनः मथुरा मे कैसें आये ? विप्रेन्‍द्र ! आप परापरवेत्ताओं मे सर्वश्रेष्ठ है, अतः ये सब बातें मुझे बताइयें ।

श्रीनारदजीने कहा- राजन् ! संध्याकाल मे श्रीराधा बुलावा पाकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण सदा शीतल कदली-वन के एकान्त प्रदेश मे गये। वहाँ, जिसमें फुहारे चलते थे, ऐसा मेघमहल था, रम्भा द्वारा चन्दन छिड़का जाता था, यमुनाजी को छूकर प्रवाहित होने वाली मन्द वायु ठंडे जल के कण बिखेरती थी और सुधाकर चन्द्रमा की रश्मियों से निरन्तर अमृत झरता रहता था। ऐसा शीतल कदली-वन भी श्रीराधा के विरहानल की आँच से भस्मीभूत हो गया था। श्रीकृष्ण से मिलन की आशा ही श्रीराधा की निरन्तर रक्षा कर रही थी। वहीं गोपियों सारें के सारे यूथ आ जुटे, जो सैकड़ों की संख्या में थे। उन्‍होंने श्रीराधा से निवेदन किया कि ‘माधव पधारे हैं।’ यह सुनकर साक्षात वृषाभानुवर की पुत्री श्रीराधा सहसा उठी सखियों से घिरी हुई वे श्रीकृष्ण को लिवा लाने के लिए आयीं। उन्‍होंने श्रीहरि को आसन दिया। पाद्य, अर्घ्‍य और आचमन आदि मनोहर उपचार प्रस्तुत किये। साथ ही कुशल पूछने में अत्यन्त चतुर श्रीराधा श्रीहरि से आदरपूर्वक कुशल भी पूछती जा रही थीं।

कोटि-कोटि तरूण कंदर्पों के माधुर्य को हर लेने वाले श्रीहरि का दर्शन करके राधाने सम्पूर्ण दुःख उसी प्रकार त्याग दिया, जैसे ब्रह्म का बोध प्राप्त होने पर ज्ञानी गुणों के प्रति तादात्म्य का भाव छोड़ देता है। कीर्तिकुमारी ने प्रसन्‍न होकर श्रृंगार धारण किया। श्रीकृष्ण जब परदेश के पाथिक होकर गये थे, तब से उन्होंने अपने शरीर पर श्रृंगार धारण नहीं किया था, न कभी चन्दन लगाया, न पान खाया, न सुधासदृश स्वादिष्ट भोजन ही ग्रहण किया। न दिव्य सेज की रचना की ओर न कभी किसी के साथ हास-परिहास ही किया। परिपूर्णतम भगवान की प्रियतमा आनन्‍द के आँसू बहाती हुई अपने परिपूर्णतम प्रियतम श्रीकृष्ण से गद्गद वाणी मे बोली।

 श्री राधा ने कहा- प्यारे ! यादव पुरी मथुरा कितनी दूर है, जो अबतक नहीं आयें ? वहाँ तुम क्या करते रहे ? मैं अपने एकान्त दुःख को कैसे बताऊं ? तुम तो सब के साक्षी हो, अतः सब जानते हो। राजा सौदास की रानी मदयन्ती, नल की प्यारी रानी दमयन्ती तथा मिथिलेशनन्दिनी सीता- इन तीनों मे कोई यहाँ नहीं है। फिर किसको सामने रखकर इस इस वैरी विरह के दुःख का मैं वर्णन करूँ ? ये गोपांग्‍नाएँ भी मेरी-जैसी परिस्थिति में ही हैं, अत: वे भी कभी इस दु:ख का निरूपण करने मे समर्थ नही हैं। जैसे चकोरी शरत्काल के चन्द्रमा को और मयूरी नूतन मेघ को देखना चाहती है, उसी प्रकार मैं तुम श्रीवृन्दावनचन्द्र तथा घनश्याम को देखने के लिए उत्कण्ठित रहती हूँ। तुम्हारे सखा उद्धव धन्‍य हैं, जिन्‍होंने शीघ्र ही तुम्‍हारा दर्शन करा दिया। इस व्रज मे दूसरा कोई ऐसा नही है, जिसके प्रेम से यहाँ आते ।

नारदजी कहते है- राजन् ! इस प्रकार कहती और निरन्तर रोती हुई श्रेष्ठ लक्ष्मी रूपा श्रीराधा को देखकर श्यासुन्दर का अंग-अंग करूणा से विह्वल हो गया। उनके नेत्रों से भी अश्रु झरने लगें। उन्‍होंने तत्काल दोनों हाथों से खीचंकर प्रियतमा को हृदय से लगा लिया और नीतियुक्त वचनों से धीरज बँधाया।

श्री भगवान बोले- राधे ! शोक न करो, मैं तुम्हारे प्रेम से ही यहाँ आया हूँ। हम दोनों का तेज एवं भेदरहित एवं एक है। लोगों ने इसे दो मान रखा है। शुभे ! जैसे दूध और उसकी धवलता एक है, उसी प्रकार सदा हम दोनों एक हैं। जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम सदा विराजमान हो। हम दोनों का वियोग कभी होता ही नहीं। मैं पूर्ण परबह्म हूँ और तुम जगन्माता तटस्था शक्ति हो। हम दोनों के बीच मे वियोग की कल्पना मिथ्या ज्ञान के कारण है, तुम इसे समझों। वरान ने ! जैसे आकाश में नित्‍य विराजमान महान वायु सर्वत्र व्‍यापक है, जैसे जल सूक्ष्‍मरूप से सर्वत्र व्याप्त है, जैसे काष्ठ मे अग्रि व्याप्त रहती और जैसे भीतर और बाहर स्थित यह पृथग्भूता पृथ्वी परमाणु रूप से सर्वत्र व्याप्त है, उसी प्रकार मैं निर्विकार भाव से सर्वत्र विधमान हूँ। जैसे जल विविध रंगों से युक्त होने पर उनसे पृथक है, उसी प्रकार मैं त्रिगुणात्मक भावों के सम्‍पर्क मे रहकर भी उनसे सर्वथा असम्पृक्त हूँ।

इसी प्रकार तुम मेरे स्वरूप को देखो और समझों, इससे सदा आनन्द बना रहेगा। सुमुखि ! 'मैं' और 'मेरा'- इन दो भावों के कारण द्वेत की कल्पना होती है। जब तक सूर्य से ही उत्पन्न हुआ मेघ सूर्य और सूर्य और दृष्टि के बीच में विद्यमान है, तब तक दृष्टि अपने ही स्‍वरूपभूत सूर्य का दर्शन नहीं कर पाती। इस प्रकार जब तक प्राकृत गुण व्‍यवधान बनकर खडे़ है, तब तक जीवात्‍मा अपने ही स्‍वरूपभूत परमात्‍मा को नहीं देख पाता। इन तीनों गुणों का आवरण दूर होने पर ही परमात्‍मा साक्षात्‍कार कर पाता है। यदि मन गुणों (विषयों) में आसक्‍त है तो वह बन्‍धनकारक होता है और यदि परम पुरुष परमात्‍मा में संलग्‍न है तो मोक्ष की प्राप्‍ति कराने वाला हो जाता है। इस प्रकार मन को बन्‍धन और मोक्ष- दोनों का कारण बताया गया है। उस मन को जीतकर पृथ्‍वी पर असंख्‍य होकर विचरे। भामिनि ! लोक में मन का सम्‍पूर्ण भाव (सम्‍बन्ध) दोनों ओर से परस्‍पर की अपेक्षा रखकर होता है, एक ओर से नहीं होता। किंतु प्रेम स्‍वयं ही किया जाता है, अत: मुझ में अपनी ओर से ही प्रेम करना चाहिये। प्रेम के समान इस भूतल पर दूसरा कोई भी मेरी प्राप्ति का साधन नहीं हैं ।

नारदजी कहते हैं- राजन् ! श्रीहरि का यह वचन सुनकर कीर्तिनन्दिनी श्रीराधा ने गोपियों के साथ उन माधव श्रीकृष्ण का पूजन किया। तदनन्तर कार्तिक पूर्णिमा की रात में गोपियों और श्रीराधिका के साथ रासमण्डल में उपस्थित हो साक्षात श्रीहरि ने मुरली बजायी।

राजन् ! यमुना के निकट रास की रंगभूमि में श्रीराधा तथा अन्य सुन्दरी व्रजरमणियों के साथ राधावल्लभ श्रीकृष्ण शोभा पाने लगे। रास में जितनी गोपांग्‍नाएँ थी, उतने ही रूप धारण करके वृन्दावन अधीश्वर श्रीहरि दिव्य वृन्दावन में विहार करने लगे। उनके चरणों के नूपुर और मंजीर बज रहे थे। वनमाला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। पीताम्‍बर पहिने, एक हाथ में कमल लिये प्रातःकालिक सूर्य के समान कान्तिमान मुकूट धारण किये, विद्युल्लता के तुल्य जगमगाते हुए सुवर्णमय कुण्डलों से मण्डित हो बेंत की छड़ी लिये, वंशी बजाते हुए मेघ की-सी कान्ति वाले श्रीहरि नटवर-वेष में सुशोभित हुए। अत्यन्त प्रकाशमान कौस्तुभ रत्‍न उनके वक्ष:स्थल पर दिव्य प्रभा बिखेर रहा था। कानोंमे चिकने और चमकीले कुण्डल हिल रहे थे। रासमण्डल में श्रीराधा के साथ वे उसी प्रकार सुशोभित हुए जैसे रति के साथ रतिपति। जैसे स्वर्ग में शची के साथ इन्द्र तथा आकाश में चपला के साथ मेघ शोभा पाते हैं, वृन्दावन में वृन्दा के साथ वृन्दावनेश्वर की वैसी ही शोभा हो रही थी। वे वृन्दावन, यमुना-पुलिन, वन और उपवन की शोभा निहारते हुए गोपी-समुदाय के साथ गोवर्धन पर्वत पर गये। भगवान व्रजेश्वर ने देखा सौ यूथवाली गोपांग्‍नाओं अपने सौभाग्य पर अभिमान हो उठा है, तब वे श्रीराधा के साथ वहीं अन्तर्धान हो गये ।

अब वे गोवर्धन से तीन योजन दूर चन्दन की गन्ध से सुवासित सुन्दर रोहिताचल को चले गये। श्रीराधा के साथ वहाँ के लता-कुंजों और निकुंजों को देखते तथा वार्तालाप करते हुए सुनहरी लताओं के आश्रयभूत उस पर्वत पर करते विचरने लगे। वहाँ बदरीनाथ के दारा निर्मित रमणीय देवसरोवर है, जो बड़े-बड़े़ मत्स्यों, कछुओं और मगर आदि जल-जन्तुओं तथा हंस-सारस आदि पक्षियों सें व्यास था। सहस्रदल कमल उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। इधर-उधर मँडराते हुए भ्रमरों की मधुर ध्वनि से युक्त नर-कोकिलों की काकली वहाँ सब ओर व्यास थी। उसके तट पर मन्द-मन्द वायु चल रही थी और प्रफुल्ल कमलों की सुगन्ध छायी हुई थी। रमास्वरूपा राधा के साथ माधव उस सरोवर के किनारे बैठ गये। उसी सरोवर के कूल पर महामुनि ऋभु एक पैर से खडे़ होकर तपस्या कर रहे थे और निरन्तर श्रीकृष्ण के चिन्तन में तत्पर थे। साठ सौ वर्षो से वे निराहार और निर्जल रहकर शान्तभाव से तपस्या में लगे। श्रीकृष्ण ने उन्हें देखा। राधा ने उन्हें देखकर मुस्कराते हुए पूछा- 'ये कौन हैं ?' माधव बोले- प्रिये ! इनका माहात्म्य बढ़ाओ। ये भक्त हैं। इन महामुनि की भक्ति देखो- कहकर श्रीकृष्ण ने 'हे ऋभो !' यह नाम लेकर उच्चस्वर से पुकारा। किंतु उन्होंने उनका वह शुभ वचन नहीं सुना क्योंकि वे ध्यानकी चरमावस्था (समाधि) में पहुँच गये थे। तब श्रीहरि उस समय मुनि के हृदय से तत्काल तिरोहित हो गये। श्रीहरि को ध्यान से निर्गत होने के कारण न देखकर मुनीन्द्र ऋभु अत्यन्त विस्मित हो गये। फिर तो उन्होंने आँखें खोल दीं और अपने सामने चपला के साथ मेघ की भाँति राधा के साथ श्रीकृष्ण को देखा, जो अपनी प्रभाव से दसों दिशाओं को अनुरंचित प्रकाशित कर रहे थे। यह देख वे हरिभक्ति परायण महात्मा शीघ्र उठे और राधा सहित श्रीहरि की परिक्रमा करके, मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हुए उनके चरणों मे गिर पड़े। फिर अत्यन्त गद्गद वाणी में श्रीकृष्ण से बोले ।

श्रीऋभु ने कहा- श्रीकृष्ण और कृष्णा को नमस्कार। श्रीराधा और माधव को नमस्कार। परिपूर्णतमा और परिपूर्णतम को नमस्कार। देव घनश्याम और श्यामा को सदा नमस्कार है। रासेश्वर नित्य-निरन्तर बारंबार नमस्कार है। गोलोकातीत लीला वाले श्रीकृष्ण को तथा लीलावती श्रीराधा को बारंबार नमस्कार है। असंख्य ब्रह्याण्डों की अधिदेवी तथा असंख्य ब्रह्याण्डों की निधि को नमस्कार है। आप दोनों भूभार-हरण करने के लिये इस भूतल पर अवतीर्ण हुए हैं और मुझे शान्ति प्रदान करने के लिये यहाँ पधारे हैं। परस्पर संयुक्त विग्रह वाले आप दोनों श्रीराधा और श्रीहरि को मेरा नमस्कार है।[1]

नारदजी कहते हैं- राजन् ! यों कहकर श्रीकृष्ण के चरणारविन्‍दों में प्रेमाश्रु की वर्षा करते हुए प्रेमानन्द निमग्न महामुनि ऋभु ने प्राण त्याग दिये। उसी समय उनके शरीर से दस सूर्यों के समान दीप्तिमती ज्योति निकली और दसों दिशाओं में घूमती हुई श्रीकृष्ण में लीन हो गयी। भक्त की यह प्रेमलक्षणा भक्ति देखकर श्रीकृष्ण ने अपने नेत्रों से आनन्द के अश्रु बहाते हुए बडे़ प्रेम से उनका नाम लेकर पुकार। तब श्रीकृष्ण का-सा रूप धारण किये वे मुनि श्रीकृष्ण के चरण-कमल से पुनः प्रकट हुए। उस समय उनका सौन्दर्य कोटि-कोटि कंदर्पों को तिरस्कृत कर रहा था और वे विनय से सिर झुकाये हुए खडे़ थे। करूणा निधि श्रीकृष्ण ने उन्हें भुजाओं में भरकर हृदय से लगा लिया और आश्वासन दें, अपना दिव्य कल्याणकारी हाथ उनके मस्तक पर रखा। मिथिलेश्वर ! तत्पश्चात् श्रीकृष्ण और श्री राधा की परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम कर, मुनिवर ऋभु एक मनोहर विमान पर आरूढ़ हो, अपने तेज से सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, गोलोकधाम को चले गये। महामुनि ऋभु की यह परा मुक्ति देखकर वृषभानुनन्दिनी श्रीराधिका को बड़ा विस्मय हुआ। वे बहुत देर तक आनन्द के आँसू बहाती रहीं। फिर श्रीकृष्ण से बोलीं ।

 इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में रासोत्‍सव के प्रसंग में 'ऋभु का मोक्ष’ नामक बीसवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

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