05. मथुराखण्ड || अध्याय 21 || श्रीकृष्ण का की द्रवरूपता के प्रसंग में नारदजी का उपाख्यान
गर्ग संहिता
मथुराखण्ड : अध्याय 21
श्रीकृष्ण का की द्रवरूपता के प्रसंग में नारदजी का उपाख्यान
राधा ने कहा- माधव ! ये मुनिश्रेष्ठ धन्य हैं, जो तुम्हारे इतने बड़े भक्त और महान प्रेमी थे। इन्होंने तुम्हारा सारूप्य प्राप्त कर लिया और तुम भी इनके लिये आँसू बहाते रहे। पापनाशन ! अब तुम्हें इनके शरीर का दाह संस्कार भी करना चाहिये। इनका यह शरीर तपस्या के प्रभाव से अभी तक निर्मल आकार में प्रकाशित हो रहा है।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! वहाँ श्रीराधा इस प्रकार कह ही रही थीं कि मुनि का शरीर एक नदी के रूप में परिणत हो गया। रोहिताचल पर बहाती हुई वह पापनाशिनी नदी आज भी देखी जाती है। उनके शरीर को नदी के रूप में परिणत देख राधा को और भी अधिक विस्मय हुआ। तब वे वृषभानुवर नन्दिनी नन्दराजकुमार से इस प्रकार बोलीं।
राधाने कहा- श्यामसुन्दर ! इन महामुनि का यह शरीर जल रूप में कैसे परिणत हो गया ? देव! मेरे इस संशय को तुम पूर्णरूप से मिटा दो।
श्रीभगवान ने कहा- रम्भोरू ! ये मुनीश्रर प्रेम लक्षणा भक्ति से संयुक्त थे, इसीलिये इनका यह शरीर द्रवभाव को प्राप्त हुआ है। तुम्हारे साथ मुझे वर देने के लिये आया देख महामुनि ऋभु अत्यन्त हर्षित हुए थे, इसीलिये इनका कलेवर उसी प्रकार जलरूप में परिणत हो गया, जैसे मैं पहले द्रवभाव को प्राप्त हुआ था।
श्रीराधा ने पूछा- देवदेव ! दयानिधे ! तुम कैसे द्रवभाव को प्राप्त हुए थे। यह बात मुझे बड़ी विचित्र लग रही है, तुम विस्तार से सब बात बताओ।
श्रीभगवान ने कहा- इस विषय में जानकार लोग इस प्राचीन इतिहास को सुनाया करते हैं, जिसके श्रवणमात्र से पापों का पूर्णतया नाश हो जाता हैं। पूर्वकाल में प्रजापति ब्रह्मा मेरे नाभि-कमल से प्रकट हो प्राकृत जगत की सृष्टि करने लगे। वे अपनी तपस्या और मेरे वरदान से शक्तिशाली रहे। एक समय सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की गोद से सुन्दर पुत्र नारदजी का जन्म हुआ। वे मेरी भक्ति से उन्मत्त होकर भूमण्डल पर भ्रमण करते हुए मेरे नाम पदों का कीर्तन करने लगे। एक दिन प्रजापति ब्रह्मदेव ने नारदजी से कहा- 'महामते ! यह व्यर्थ घूमना छोड़ों और प्रजा सृष्टि करो।' उनकी बात सुनकर ज्ञानमार्ग परायण नारद ने इस प्रकार कहा- 'पिताजी ! मैं सृष्टि नहीं करूँगा, क्योंकि वह शोक-मोह पैदा करने वाली हैं। मैं तो श्रीहरि के नामों का कीर्तन और उनकी भक्ति करूँगा। आप भी इस सृष्टि व्यापार में लगकर दुःख से अत्यन्त आतुर रहते हैं अतः आप भी सृष्टि-रचना छोड़ दीजिये'।
यह सुनकर ब्रह्माजी के अधर क्रोध से फड़कने लगे। उन्होंने कुपित हो शाप देते हुए कहा– ‘दुर्मते ! तुम एक कल्प तक सदा गाने-बजाने में ही लगे रहने-वाले गन्धर्व हो जाओ।’ श्रीराधे ! इस प्रकार ब्रह्मा के शाप से नारदजी उपबर्हण नामक गन्धर्व हो गये। वे एक कल्प तक देवलोक में गन्धर्वराज के पद पर प्रतिष्टत रहे। एक दिन स्त्रियों से घिरे हुए वे ब्रह्माजी के लोक में गये। वहाँ सुन्दरियों में मन लगा रहने के कारण उन्होंने बेताला गीत गाया। तब ब्रह्मा ने पुनः शाप दे दिया- ‘दुर्मते ! तू शूद्र हो जाये।’ इस प्रकार ब्रह्माजी के शाप से वे दासी पुत्र हो गये। राधे ! फिर तदनन्तर पुनःभक्ति भाव से उन्मत्त हो भूतल पर विचरते हुए वे मेरे पदों का गान एवं कीर्तन करने लगे। मुनीन्द्र नारद वैष्णवों में श्रेष्ठ मेरे प्रिय तथा ज्ञान के सूर्य हैं। वे परम भागवत हैं और सदा मुझमें ही मन लगाये रहते हैं।
एक दिन विभिन्न लोकों का दर्शन करते हुए गान-तत्पर नारद, जिनकी सर्वत्र गति है इलावृतखण्ड में गये जहाँ प्रिय ! जम्बूफल के रस से प्रकट हुई श्यामवर्णा जम्बू नदी प्रवाहित होती है तथा जाम्बुनद नामक सुवर्ण उत्पन्न होता है। उस देश में रत्नमय प्रासादों से युक्त तथा दिव्य नर-नारियों से भरा हुआ एक ‘वेदनगर नामक नगर हैं, जिस योगी नारद ने देखा। वहाँ कितने ही लोगों के पैर नहीं थे, गुल्फ नहीं थे और घुटने नहीं थे जांघ अथवा जघनभाग का भी कितने ही लोगों के पास अभाव था। वे विकलांग और कृशोदर थे और कितनों के पीठ के मध्यभाग में कूबर निकल आयी थी, दाँत गिर गये थे या ढीले हो गये थे, कंधे ऊँचे थे, मुख झुका हुआ था और कितनों के गर्दन ही नहीं थी। इस प्रकार नारदजी ने वहाँ की स्त्रियाँ और पुरुषों का अंग-भंग देखा। उन सबको देखकर मुनि ने कहा– ‘अहो ! यह क्या बात है ? यह सब तो विचित्र ही दिखायी देता है। आप सब लोगों के मुँह कमल के समान हैं। शरीर दिव्य हैं और वस्त्र भी अच्छे हैं। आप लोग देवता हैं उपदेवता अथवा कोई ऋषि श्रेष्ठ है ! आप सब लोग बाजों के साथ हैं तथा रमणीय गीत गाने में संलग्न हैं। आपके अंग-भंग कैसे हो गये, यह बात शीघ्र मुझे बताइये।’ उनके इस प्रकार पूछने पर वे सब दीलचित्त होकर बोले।
रागों ने कहा- मुने ! हमारे शरीर में स्वतः बड़ा भारी दुःख पैदा हो गया है। परंतु यह सब उसके आगे कहना चाहिये, जो उसे दूर कर सके। महर्षें ! हम लोग राग हैं और वेदपुर में निवास करते हैं। मानद ! हम अंग-भंग कैसे हो गये, इसका कारण बताते हैं, सुनिये, हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी के एक पुत्र पैदा हुआ है, जिसका नाम है नारद। वह महामुनि प्रेम से उन्मत्त होकर बेसमय ध्रुवपद गाता हुआ इस पृथ्वी विचरा करता है। उसके ताल-स्वर से रहित असामयिक गानों-विगानों से हम सबके अंग-भंग हो गये हैं।
उनकी यह बात सुनकर नारदजी को बड़ा विस्मय हुआ। उनका गर्व गल गया और वे रागों से हँसते हुए से बोले।
मुनि ने कहा- रागगण ! मुझे शीघ्र बताओ। नारद मुनि को किस प्रकार से काल और ताल का ज्ञान हो सकता है, जिससे वे स्वर युक्त गीत गा सकें।
रागों ने कहा- साक्षात वैकुण्ठनाथ की प्रिय भार्याओं में मुख्य सरस्वती देवी नारद को संगीत की शिक्षा दे सके तो वे मुनि कौन-सा राग किस समय किस ताल स्वर से गाना चाहिये, इसे जान सकते हैं। उनकी यह बात सुनकर दीनवत्सल नारद सरस्वती का कृपा-प्रसाद प्राप्त करने लिये तुंरत ही शुभ्रगिरि पर चले गये। वहाँ उन्होंने सौ दिव्य वर्षों तक निरन्तर अत्यन्त दुष्कर तपस्या की। व्रजेश्वरि ! उन्होंने अन्न-जल छोड़कर केवल सरस्वती के ध्यान में मन लगा लिया था। नारदजी की तपस्या से वह पर्वत अपना ‘शुभ्र’ नाम छोड़कर ‘नारदगिरि’ के नाम से प्रख्यात हो गया। वह सारा पर्वत उनकी तपस्या से पवित्र हो गया। तपस्या का पर्यवसान होने पर साक्षात वाग्देवता विष्णुप्रिया श्रीसरस्वती वहाँ आयीं। नारदजी ने उन दिव्यवर्णा देवी देखा। देखकर वे सहसा उठ खडे़ हुए और उन्हें नमस्कार करके परिक्रमापूर्वक नतमस्क हो, वे मुनीश्वर सरस्वती देवी रूप, गुण और माधुर्य की स्तुति करने लगे।
नारदजी बोले- नवीन सूर्य के बिम्ब की द्युति को उगलने और हिलने वाले रत्नमय कर्णफूल, केयूर किरीट और कंकण जिनकी शोभा बढ़ाते हैं तथा जो चमकते और झनकारते हुए नूपुरों के शिकंज-रव से रंजित होती हैं, उन कोटि चन्द्रमाओं से अधिक उज्ज्वल मुख वाली सरस्वती देवी को मैं नमस्कार करता हूँ। जो चंचल चरण और चंचुपुट वाले उड़ते कल हंस पर विराजमान होती तथा निर्मल मुक्ता फलों के अनेक हार करती हैं, उन सौभाग्य शालिनी सरस्वती देवी को मैं प्रणाम करता हूँ। जो अपने दोनों पार्श्व के दो-दो निर्मल हाथों मे क्रमश: वर अभय, पुस्तक और उत्तम वीणा धारण करती हैं, उन जगन्मयी, ब्रह्ममयी, शुभदा एंव मनोहरा सरस्वती देवी को मैं नमस्कार करता हूँ। श्वेतवर्ण की लहरदार साड़ी पहनने वाली अतीव मंगलस्वरूप सरस्वति ! मुझे स्वर-ताल का ज्ञान प्रदान कीजिये, जिससे मैं अविनाशी एंव सर्वोत्कृष्ट रासमण्डल में सर्वोपरि और अद्वितीय संगीतज्ञ हो जाऊँ।[1]
श्रीभगवान कहते हैं– श्रीराधे ! सरस्वती का यह नारदोक्त दिव्य स्तोत्र जड़ता का नाश करने वाला है। जो प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करेगा वह इस लोक में विद्यावान होगा। तब प्रसन्न हुई वाग्देवता ने महात्मा नारद को भगवत्प्रदत्त स्वरब्रह्म से विभूषित एक वीणा प्रदान की। साथ ही राग-रागिनी उनके पुत्रदेश कालादिकृत भेद तथा ताल, लय और स्वरों का ज्ञान भी दिया। ग्रामों के छप्पन कोटि भेद असंख्य अवान्तर-भेद नृत्य वादित्र तथा सुन्दर मूर्च्छना- इन सबका ज्ञान नारदजी प्राप्त हुआ। वैकुण्ठपति की प्रियाओं में मुख्य सरस्वती देवी ने स्वरगम्य सिद्धपदों द्वारा नारदजी को संगीत की शिक्षा दी। राधे ! नारद को रासमण्डल के उपयुक्त अद्वितीय रागोभ्दावक बनाकर विष्णुवल्लभा वाग्देवी वैकुण्ठधाम को चलीं।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'नारदोपाख्यान’ नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।
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