05. मथुराखण्‍ड || अध्याय 22 || नारद का अनेक लोकों में होते हुए गोलोक में पहुँचकर भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी कला का प्रदर्शन करना तथा श्रीकृष्ण का द्रवरूप होना

गर्ग संहिता
मथुराखण्‍ड : अध्याय 22

नारद का अनेक लोकों में होते हुए गोलोक में पहुँचकर भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी कला का प्रदर्शन करना तथा श्रीकृष्ण का द्रवरूप होना

श्रीभगवान कहते हैं- श्री राधे ! इस रागरूप मनोहर एवं ज्ञान का उपदेश किसको देना चाहिये, इसका बुद्धिपूर्वक विचार करके नारदजी गन्धर्व नगर में गये। वहाँ तुम्बुरू नामक गन्धर्व को अपना शिष्य बनाकर नारदजी मधुर स्वर से वीणा बजाते हुए मेरे गुणों का गान करने लगे। तदनन्तर उनके हृदय में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि ‘किन लोगों के सामने इस मनोहर रागरूप गीत का गान करना चाहिये ? इसको सुनने का पात्र कौन है ?’ इसकी खोज करते हुए नारद इन्द्र के पास आये। उनको इस विषय का आनन्द लेते न देख मुनिश्रेष्ठ नारद सखा तुम्बुरू के साथ राग-रागिनियों का निरूपण लिये सूर्यलोक में गये। वहाँ सूर्यदेव को रथ के द्वारा भागे जाते देख देवर्षि शिरामणि महामुनि नारद वहाँ तत्काल शिवजी के के पास चले गये। राधे ! ज्ञानतत्‍वज्ञ भूतनाथ शिव के नेत्र ध्‍यान में निश्‍चल हैं, यह देख नारदजी ब्रह्मलोक में गये। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को सृष्टि-रचना में व्यग्र देख वे वहाँ भी न ठहर सके, उस स्थान से विष्णु के सर्वलोक वन्दित वैकुण्ठधाम में चले गये। भक्तों के स्वामी भक्तवत्सल भगवान विष्‍णु को किसी भक्त पर कृपा करने लिये कहीं जाते देख योगीन्द्र नारद तुम्बुरू के साथ अन्‍यत्र चल दिये

वृषभानुननन्दिनि ! योगीश्वर संतों की गति त्रिलोकी के भीतर और बाहर भी बतायी गयी है। जो केवल कर्मी हैं। उन्हें वैसी गति प्राप्‍त नहीं होती। मुनीश्वर नारद करोड़ों ब्रह्माण्ड- समूहों को लाँघकर प्रकृति से परे गोलोकधाम में जा पहुँचे। उत्ताल तरंगों से सुशोभित विरजा नदी को पार करके वे शीघ्र ही भ्रमरों की ध्वनि से निना‍दित रमणीय वृन्दावन में गये, जो वसन्त ऋतु से युक्त और जहाँ के लता भवन मन्दमारूत के झोंके से कम्पायमान रहते हैं। वृन्दावन से गोवर्धन पर्वत का दर्शन करते हुए नारदजी मेरे निकुंज में आये। निकुंजद्वार पर सखियों ने पूछा- ‘आप दोनों कौन हैं? कहाँ से आये हैं और यहाँ क्या कार्य है ? ऐसा प्रश्‍न होने पर मुनि और तुम्बुरू दोनों बोले- सुन्दरियों ! हम दोनो गान-विद्या में कुशल गायक हैं और अपनी वीणा की मधुर ध्वनि साक्षात परिपर्णूतम भगवान राधावल्लभ श्रीकृष्ण को सुनाने के लिये आये हैं। हम वन्दीजनों में उत्तम हैं। हमारी यह बात महात्‍मा श्रीकृष्‍ण से निवेदित कर देनी चाहिये’।

यह सुनकर सखियों ने उनका संदेश मेरे पास पहुँचाया और मेरी आज्ञा से लौटकर मधुरवाणी में उन वन्दियों को भीतर चलने का आदेश दिया। करोड़ों सूर्यों की ज्योति से व्याप्त मेरे निकुंज के आँगन में जहाँ सब ओर कौस्तुभमणि जड़ी थी, मनोहर चँवर डुलाये जा रहे थे, हिलते हुए मोतियों की झालरों से युक्त छत्र तने थे और करोड़ों सखियाँ विराजमान थीं, आकर महापद्यमय आसन पर तुम्हारे साथ बैठे हुए मुझे श्रीकृष्ण का उन दोनों ने दर्शन किया। फिर प्रणाम और परिक्रमा करके वे मेरी आज्ञा से वहाँ बैठे और मेरी स्तुति करके मेरे गुणों का गान करने के लिये उद्यत हुए। आतोद्य (वाद्य विशेष) को दबाते और देवदत्त स्वरामृतमयी वीणा को झंकृत करते तुम्बुरू सहित नारद ने वीणावादन की अद्वितीय कलाको प्रस्तुत किया। मैं उससे बहुत संतुष्ट हुआ और सिर हिलाता हुआ उस वीणाकी प्रशंसनीय स्वर-लहरी की सराहना करने लगा। अन्ततोगत्वा प्रेम के वशीभूत हो अपने-आपको देकर मैं जलरूप हो गया। मेरे दिव्य शरीर से जो जल प्रकट हुआ उसे ‘ब्रह्मद्रव’ के नाम से लोग जानते हैं। उसके भीतर कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड राशियाँ लुढ़कती रहती हैं। उस उन्नत एवं शुभ जलराशि में लुढकते हुए वे इन्द्रायण के फल के समान प्रतीत होते हैं।

राधे ! यह ब्रह्माण्ड ‘पृश्रिगर्भ’ नाम से प्रसिद्ध हैं जो मेरे त्रिविक्रम रूप के पदाघात से फूट गया था। उसका भेदन करके जो साक्षात ब्रह्मद्रव का जल यहाँ आया, उसे इस शुभ मन्वन्तर मे पूर्ववर्ती लोगों ने पापहारिणी स्वर्धुनी ‘गंगा’ के नाम से जाना था। उस गंगा द्युलोक में ‘मन्दाकिनी’ पृथ्वी पर ‘भागीरथी’ और अधोलोक-पाताल में ‘भोगवती’ कहा गया हैं। इस प्रकार एक ही गंगा त्रिपथगामिनी होकर तीन नामों से विख्यात हुई। इसमें स्नान करने के लिये प्रणत भाव से जाते हुए मनुष्य के लिये पग-पग पर राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल दुर्लभ नहीं रह जाता। * जो सैकड़ों योजन दूर से भी ‘गंगा-गंगा’ का उच्चारण करता है, वह पापों से छूट जाता और विष्णुलोक में जाता है। कलियुग में गंगा का दर्शन करने से सौ जन्मों का जल पीने से दौ सौ जन्मो का और स्नान करने से एक सहस्र जन्मों का पाप नष्ट कर देती है। जो जाहन्‍वी गंगा का दर्शन करते हैं उनका जन्‍म सफल है। जो उनके दर्शन से व‍ंचित रह जाते है, उनका जन्म व्यर्थ चला गया।

रम्भोरू राधे ! जैसे विरजा तुम्‍हारे भय से द्रवरूपता को प्राप्त हो गयी, जैसे विरजा के सातों पुत्र सात समुद्रों के रूप में द्रवभाव को प्राप्त हो गये, जैसे विष्णु 'कृष्णा' नदी हुए, जैसे शिवदेव 'वेणी' नदी हुए, जैसे ब्रह्मा 'ककुद्यिनी गंगा' हुए और जैसे अप्सरा 'गण्डकी' नदी हो गयी, उसी प्रकार ये ऋभु नामक मुनि भी ब्रह्माभाव को प्राप्त हुए हैं। यह ऋभु की प्रेमलक्षणा-भक्ति सम्भव हुआ है। इसमें संशय नहीं है। जो इस पपपहारिणी पवित्र कथा का श्रवण करता हैं, वह मनुष्य सब लोकों को लाँघकर मेरे गोलोकधाम में चला जाता है।

श्रीनारदजी कहते है- राजन् ! इस प्रकार अपनी प्रिया श्रीराधा से कहकर श्रीहरि ऋभु के आश्रम से श्री राधा के साथ ही मालती-वन में चले आये। फिर गोपियों की विरह-व्यथा को जान भक्त-वत्सल भगवान श्रीकृष्ण श्रीराधा के साथ यमुना के मंगलमय पुलिन पर चले आये। उस समय समस्त गोपीगणों का मान और व्यथा-भार दूर हो गया। उन्होंने जैसे चपलाएँ मेघ का आलिंगन करती हैं, उसी प्रकार घनश्याम को अपनी भुजाओं में भर लिया। तब श्रीहरि वृन्दावन में यमुना के मनोहर तट पर गोपांग्‍नाओं के साथ मधुर स्वर में वंशी बजाने लगे। भगवान के उस मधुर राग से गोपकन्याएँ मूर्च्छित हो गयीं, नदियों वेग रूक गया, पक्षी अचल हो गये। समस्त देवताओं ने मौन धारण कर लिया देवनायक स्तब्ध हो गये, वृक्षों से जल बहने लगा तथा सारा जगत मानो निद्रा में निमग्न हो गया। रात्रिकाल में रास रचाकर श्रीराधिका और गोपियों के मनोहर पूर्ण करके ब्राह्म मुहूर्त में भगवान श्रीकृष्ण नन्द भवन को लौट आये। गोपिकाओं के साथ श्रीराधिका भी अपना आनन्दमय मनोरथ प्राप्त करके वृषभानुवर के सुन्दर मन्दिर में चली गयीं।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'नारदोपाख्‍यान’ नामक बाइसवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।
गंगा गंगेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि। 
मुच्‍यते सर्वपापेभ्‍यो विष्‍णुलोकं स गच्‍छति।।
दृष्‍टा जन्‍मशतं पापं पीत्‍वा जन्‍मशतद्वयम्। स्‍त्रात्‍वा जन्‍मसहस्‍त्रेण हन्ति गंगा कलौ युगे ।।
सफलं जन्‍म वै तेषां ये पश्‍यन्ति हि जाह्नवीम्। वृथा जन्‍मगतं तेषां ये न पश्‍यन्ति जाह्नवीम् ।।-(गर्ग0, मथुरा0 22। 27-29)

  1.  गंगा गंगेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि मुच्‍यते सर्वपापेभ्‍यो विष्‍णुलोकं स गच्‍छति।।
    दृष्‍टा जन्‍मशतं पापं पीत्‍वा जन्‍मशतद्वयम्। स्‍त्रात्‍वा जन्‍मसहस्‍त्रेण हन्ति गंगा कलौ युगे ।।
    सफलं जन्‍म वै तेषां ये पश्‍यन्ति हि जाह्नवीम्। वृथा जन्‍मगतं तेषां ये न पश्‍यन्ति जाह्नवीम् ।।-(गर्ग0, मथुरा0 22। 27-29)


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