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05. मथुराखण्‍ड || अध्याय 24 || बलदेव जी द्वारा कोल दैत्य का वध; उनकी गंगा तटवर्ती तीर्थों में यात्रा;

गर्ग संहिता

मथुराखण्‍ड : अध्याय 24

बलदेव जी द्वारा कोल दैत्य का वध; उनकी गंगा तटवर्ती तीर्थों में यात्रा; माण्डूक देव को वरदान और भावी वृत्तान्त की सूचना देना; फिर गंगा के अन्यान्य तीर्थों में स्नान-दान करके मथुरा में लौट जाना

बहुलाश्व ने पूछा- मुने ! गोपांग्‍नाओं और गोपों को उत्तम दर्शन देकर मथुरा में लौटने के पश्‍चात श्रीकृष्ण तथा बलराम ने क्या किया ? श्रीकृष्ण और बलदेव का चरित्र बड़ा मधुर है। यह समस्त पापों को हर लेने वाला पुण्यप्रद तथा चतुर्वर्गरू फल प्रदान करने वाला है।

श्रीनारदजी ने कहा- राजन् ! अब श्रीकृष्ण और बलदेवजी का दूसरा चरित्र सुनो जो सर्वपापहारी, पुण्यदायक तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है। नरेश्वर ! कोल नामक दैत्य से पीड़ित हुए बहुत-से लोग दीनचित्त हो ब्राह्मणों के साथ कौशारविपुर से मथुरा में आये। उस समय रोहिणी नन्दन बलराम शीघ्रगामी अश्व पर पर आरूढ हो थोडे़-से अग्रगामी लोगों के साथ शिकार खेलने के लिये मथुरा से निकले थे। मार्ग में ही उन्हें प्रणाम करके उनकी विधिवत पूजा करने के पश्चात् सब लोग उनके चरणों में प्रणत हो गये और हाथ जोड़ हर्ष गद्गद वाणी में बोले।

प्रजाजनों ने कहा- राम ! महाबाहु राम ! महाबली देवदेव ! हम सब लोग कोल नामक दैत्य से पीड़ित हो आपकी शरण में आये हैं। कोल दैत्य कंस का सखा हैं। वह महाबली राजा कौशारवि को जीतकर उन्हीं के नगर में राज्य करता है। राजा कौशारवि उसके भय से गंगा तट पर चले गये हैं और वहाँ पुनः अपने राज्य की प्राप्ति के लिये अत्यन्त जितेन्द्रिय हो आपके चरण-कमलों का भजन कर हैं। विभो ! आप उनकी सहायता कीजिये। हम उन्हीं की शुभ प्रजा है, जिनका उन्होंने पुत्र की भाँति पालन किया है। उनके संरक्षण में हम लोग बडे़ सुखी थे। प्रभो ! अब दुष्ट कोल हमें निरन्तर पीड़ा दे रहा है। यद्यपि आपने त्रिभुवन विजयी वीर कंस को मार डाला है। तथापि देवेन्द्र ! जब तक कोल जीवित है, तब तक कंस को भी मरा हुआ नहीं मानना चाहिये। आप प्रकृति से परे होकर भी भक्तों की रक्षा के लिये ही सगुणरूप से अवतीर्ण हुए हैं।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! उनका वचन सुनकर भक्तवत्सल श्रीबलराम गंगा- यमुना के बीच में बसी हुई कौशाम्बी नगरी को गये। बलरामजी को युद्ध के लिये आया हुआ सुनकर प्रचण्ड पराक्रमी कोल भी दस अक्षौहिणी सेना से सुसज्जित हो कौशाम्बी से बाहर निकला। प्रलय-काल के समुद्र की भाँति गर्जना करने वाली वह सेना एक नदी के समान आयी। चंचल घोडे़ उसकी उठती हुई तरंग माला थे। रथ और हाथी आदि उसमें तिमिंगल (मगर-मत्स्य) के समान प्रतीत होते थे। वीर योद्धारूपी भँवर उठ रहे थे। उसे देखकर बलरामजी ने हलका सेतु बाँध दिया और हलाग्रभाग से उस सेना को खींच-खींचकर मुसल के सुदृढ़ प्रहार से मारना आरम्भ किया। उनके प्रहार से एक साथ ही पैदल वीर, घोडे़, रथ और हाथी रणभूमि में फलों की भाँति पिस उठ और करोड़ों की संख्या में सब ओर धराशायी हो गये। शेष योद्धा भय से पीड़ित हो युद्ध मण्डल से भाग निकले। शस्त्रधारी दैत्य कोल बलरामजी के साथ अकेला ही युद्ध करने लगा।

उस दैत्यराज ने बलदेवजी की और अपना हाथी बढ़ाया। उस हाथी के कुम्‍भस्‍थल पर गोमू़त्र में घोले हुए सिन्दूर और कस्तूरी के द्वारा पत्र-रचना की गयी थी। सोने की साँकल से युक्‍त कटिबन्‍ध रत्‍नखचित था। उसके गण्‍ड स्‍थल से मद झर रहा था। उसके चार दाँत थे। घंटे की ध्वनि से वह और भीषण प्रतीत होता था। उसका कद ऊँचा था और दिग्गज के समान चिग्घाड़ता था। उसके शरीर का रंग प्रलयकाल के मेघ के समान काला था। कोल तीखा अंकुश लेकर उसके कान की ओर से उस हाथी चढ़ गया था। कोल के द्वारा प्रेरित उस मतवाले हाथी को अपनी ओर आता देख बलदेवजी ने उसके ऊपर मुसल से उसी प्रकार प्रहार किया, जैसे इन्द्र ने वज्र से किसी पर्वत पर आघात किया हो। मिथिलेश्वर ! मुसल की मार से उस महान गजराज का मस्‍तक उसी प्रकार छिन्‍न-छिन्‍न हो गया, जैसे डंडे मार से कोई मिट्टी का घड़ा टूक-टूक हो गया हो।

कोल का मुँह सूअर के समान था। लाल नेत्रों वाला वह दैत्य हाथी गिर पड़ा। उसने महात्मा माधव बलदेव के ऊपर तीखा शूल चलाया। विदेहराज ! तब बलराम ने मुसल से मारकर उसके शूल के उसी प्रकार सैकड़ों टुकडे़ कर दिये, जैसे किसी बालक ने लाठी के प्रहार से काँच के बर्तन तोड़ डाले हों। तब उस दुष्ट ने सहस्र भार (लगभग 3000 मन) लोहे की बनी हुई एक भारी गदा हाथ में लेकर बलरामजी की छाती पर चोट की और वह मेघ के समान गर्ज उठा। उस गदा के प्रहार को सहकर महाबली बलदेव ने काजल के समान काले शरीर वाले कोल के मस्तक पर मुसल से प्रहार किया। मुसल के प्रहार से उसका सिर फट गया और वह रणभूमि में गिर पड़ा, तो भी उठकर बलदेवजी को मुक्के से भारी चोट पहुँचाकर वह वहीं अन्तर्धान हो गया।

फिर उस मायावी दैत्य ने अत्यन्‍त भयंकर दैत्य-सम्बन्धिनी माया प्रकट की। तुरंत ही बड़ी भारी आँधी से प्रेरित प्रलय-काल के मेघों से, जो अन्धकार फैला रहे थे, आकाश आच्छादित हो गया। जपाके पुष्पों के समान रक्त के बिन्दुओं की निरन्तर वर्षा होने लगी। उसके बाद घनीभूत काले मेघों ने घृणित वस्तुओं की वर्षा प्रारम्भ की। पीब, मेद, विष्ठा, मूत्र, मदिरा और मांस से युक्त अमेध्य जल की वर्षा होने लगी। उस वृष्टि से सब ओर हाहाकार होने लगा। दैत्य द्वारा रची गयी को जानकर महाप्रभु बलदेव ने शत्रुसेना को विदीर्ण करने वाले विशाल मुसल को चलाया। वह समस्त अस्त्रों का घातक स्वच्छ और सुदृढ़ अस्त्र अष्ट धातुओं का बना हुआ था। उसकी लंबाई सौ उसकी लम्‍बाई सौ योजन की थी तथा वह प्रलयाग्न‍ि के समान प्रज्‍वलित हो रहा था। बलदेवजी का अस्‍त्र मुसल दसों दिशाओं में घूमता हुआ बड़ी शोभा पा रहा था। उसने आकाश के बादलों को उसी प्रकार विदीर्ण कर दिया, जैसे सूर्य कुहरे को मिटा देता है। उस मुसल को आकाश में गया हुआ देख भगवान बलभद्र ने स्‍वत: 'हल' नामक अस्‍त्र उठाया और अपने वैभव से सबको खींच-खींचकर बलपूर्वक बीच में ही विदीर्ण कर दिया।

उस दैत्य की माया का नाश हो जाने पर महाबली बलदेव ने अपने बाहुदण्डों से उसके मदोत्कट भुजदण्ड पकड़ लिये और जैसे बालक रूई की राशि को घुमाये, उसी प्रकार इधर-उधर घुमाते हुए उसे पृथ्वी पर इस प्रकार दे मारा मानो किसी बालक ने कमण्डलु पटक दिया हो। उस दैत्य के पतन से पर्वत समुद्र और वन के साथ सारा भूमण्डल एक नाडी (घड़ी) तक काँपता रहा। दैत्य के दाँत टूट गये, नेत्र बाहर निकल आये और वह मूर्च्छित होकर मृत्यु का ग्रास बन गया। इस प्रकार महादैत्य कोल वज्र के मारे हुए वृत्रासुर की भाँति प्राणशून्य हो गया। उस समय स्वर्ग में और धरती पर जय-जयकार होने लगा। देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और वे फूलों की वर्षा करने लगे। इस प्रकार कोल का वध करके श्रीकृष्ण के बडे भाई बलदेव ने कौशाम्बीपुरी राजा कौशारवि को दे दी और स्वयं गर्गाचार्य आदि के साथ वे भागीरथी में स्नान करने के लिये गये। उनका यह कार्य समस्त दोषों के निवारण एंव लोकसंग्रह के लिये था।

उस दैत्य की माया का नाश हो जाने पर महाबली बलदेव ने अपने बाहुदण्डों से उसके मदोत्कट भुजदण्ड पकड़ लिये और जैसे बालक रूई की राशि को घुमाये, उसी प्रकार इधर-उधर घुमाते हुए उसे पृथ्वी पर इस प्रकार दे मारा मानो किसी बालक ने कमण्डलु पटक दिया हो। उस दैत्य के पतन से पर्वत समुद्र और वन के साथ सारा भूमण्डल एक नाडी (घड़ी) तक काँपता रहा। दैत्य के दाँत टूट गये, नेत्र बाहर निकल आये और वह मूर्च्छित होकर मृत्यु का ग्रास बन गया। इस प्रकार महादैत्य कोल वज्र के मारे हुए वृत्रासुर की भाँति प्राणशून्य हो गया। उस समय स्वर्ग में और धरती पर जय-जयकार होने लगा। देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और वे फूलों की वर्षा करने लगे। इस प्रकार कोल का वध करके श्रीकृष्ण के बडे भाई बलदेव ने कौशाम्बीपुरी राजा कौशारवि को दे दी और स्वयं गर्गाचार्य आदि के साथ वे भागीरथी में स्नान करने के लिये गये। उनका यह कार्य समस्त दोषों के निवारण एंव लोकसंग्रह के लिये था।

गर्ग आदि ब्राह्मण आचार्यों ने मंगलमय वेद-मन्त्रों का उच्चारण करते हुए माधव-बलराम को गंगा में स्नान करवाया। विदेहराज ! बलरामजी ब्राह्मणों को एक लाख हाथी, दो लाख रथ, एक करोड़ घोडे़, दस अरब दुधारू गायें, सौ अरब रत्न और जाम्बूनद सुवर्ण के भार दान में देकर मथुरापुरी को चले गये। मिथिलेश्‍वर ! बलराम ने गंगाजी में जहाँ स्नान किया, उस महापुण्मय तीर्थ विद्वान लोग 'रामतीर्थ' के नाम से जानते हैं। जो मनुष्य कार्तिक की पूर्णिमा एवं कार्तिक मास में रामतीर्थ की गंगा में स्‍नान करता हैं, वह हरिद्वार की अपेक्षा सौगुने पुण्‍य का भागी होता है।

बहुलाश्व ने पूछा- महामुने ! कौशाम्बी से कितनी दूर और किस स्थान पर महापुण्यमय “रामतीर्थ” विद्यमान है, यह मुझे बताने की कृपा करें।

नारदजी ने कहा- राजन् ! राजेन्द्र ! कौशाम्‍बी से ईशान कोण में चार योजन की दूरी पर और वायव्य कोण में शूकरक्षेत्र से चार योजन की दूरी पर, कर्णक्षेत्र से छः कोस और नलक्षेत्र पाँच कोस आग्नेय दिशा मे रामतीर्थ की स्थिति बताते हैं। वृद्धकेशी सिद्धपीठ से और बिल्‍वकेश वन से पूर्व दिशा में तीन कोस दूरी पर विद्वानों ने रामतीर्थ की स्थिति मानी है। वंगदेश में दृढाश्व नाम एक राजा थे। 'वे लोमश मुनि को कुरूप देखकर सदा उनकी हँसी उड़ाया करते थे। इससे उस महामुनि ने उन्हे शाप दे दिया। 'ओ महादुष्ट ! तू विकराल शूकरमुख असुर हो जा।' इस प्रकार मुनि के शाप से राजा कोल नामक क्रोडमुख असुर हो गया। फिर बलदेवजी के प्रहार से आसुर-शरीर को छोड़कर महादैत्य कोल ने परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। तब बलराम उद्धव आदि तीनों मन्त्रियों के साथ वहाँ से तत्काल ‘जहुतीर्थ को चले गये, जहाँ जहु के दाहिने कान से गंगाजी का प्रादुर्भाव हुआ था। उस ब्रह्माण-शिरोमणि जहु के नाम पर ही गंगाजी को ‘जाहन्वी' कहा जाता है। वहाँ ब्राह्मणों को दान दे रात भर सब लोग वहीं रहे। तदनन्तर वहाँ से पश्चिम भाग में पाण्डवों का अत्यन्त प्रिय ‘आहार स्थान' नामक स्थान है, जहाँ पहुँचकर उन लोगों ने रात्रि में निवास किया। वहाँ बाह्मणों को दान तथा उत्तम गुणकारक भोजन देकर वे एक योजन दूर माण्डूकदेव के पास गये।'

माण्डूकदेव ने अनन्तदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए बड़ी भारी तपस्या की थी। उसी के लिए अपने समाज के साथ बलदेवजी वहाँ गये। वह मुँह ऊपर किये एक पैर के बल पर खड़ा था। उसके नेत्र ध्यान में निश्चल थे। वह हृदय मे बलदेवजी के स्वरूप का दर्शन करते हुए उन्हीं के साक्षात दर्शन के लिए लोलुप था। बलदेवजी ने उसके हृदय से अपने उस स्वरूप को हटा लिया। तब उसने नेत्र खोलकर अपने आराध्य देव को बाहर देखा। अनन्तदेव के उस पर सुन्दर रूप को उसने देखा। वे वनमाला से सुशोभित थे और एक कान मे कुण्डल धारण किये हुए थे। उनकी अंग-कान्ति गौर थी। तथा वे तालचिन्‍ह से अंकित ध्वजा वाले रथ पर बैठे थे। अनन्तदेव के उस पर परम सुन्दर रूप को देखकर उसने बड़ी भक्ति से उनकी स्‍तुति की। फिर वह अपने आराध्य के चरणों मे गिर पड़ा। बलदेवजी ने उसके मस्तक हाथ रखा और कहा- ‘वर माँगो।' तब वह बोला- 'स्वामिन् ! यदि आप साक्षात भगवान मुझ पर प्रसन्‍न हैं अथवा यदि मैं आपके अनुग्रह का पात्र हूँ, तो शुकदेवजी के मुख से निकली हुई उस सर्वोत्तम भागवत संहिता को मुझे दीजिए, जो समस्त कलिदोषों का विनाश करने वाली एवं श्रेष्ठ है।

बलदेवजी ने कहा- अनघ ! तुम्हें उद्धवजी जी के द्वारा श्रीमद्भगवतसंहिता की प्राप्ति होगी, जिसका कीर्तन कलियुग में सर्वाधिक महत्त्व रखने वाला है।

माण्डूक ने पूछा- स्‍वामिन् ! भगवान ने उद्धवजी को भागवत संहिता सुनाने का मुख्य अधिकार क्यों दिया है ? और उनके साथ मेरा संयोग कब होगा ? आप इस मेरे संदेह का निवारण कीजिये।

बलदेवजी बोले- मैं परम गोपनीय एंव परम अद्भुत रहस्य की बात बताता हूँ। आज भी मेरे निकट ये उद्धवजी विराजते हैं। तुम इनका दर्शन कर लो। यह उत्तम दर्शन तुम्हें परमार्थ प्रदान करने वाला है, परंतु आज तीर्थयात्रा के अवसर पर तुम्हें इनका उपदेश नहीं प्राप्त हो सकता। जिस प्रकार ये भागवत के उपदेशक होंगे, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। मैंने उद्धव को श्रीमान आचार्य के पद पर इसलिये स्थापित किया है कि ये संहिता ज्ञान स्वरूप हैं। नन्द आदि व्रजवासियों तथा गोपांग्‍नाओं की प्रीति के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा था। अपना स्वरूप, परिकर का पद और जो कुछ भी पूर्ण भगवत्ता है, वह सब, अपने स्वभाव और गुण के साथ परमात्मा श्री कृष्ण उद्धव को अर्पित की है। उन्होंने उद्धव को और अपने को एक ही मानकर आचरण किया है। श्रीकृष्ण ने अपना आन्तरिक रहस्य पहिले उद्धव के सिवा और किसी नहीं प्रकट किया था। उन्होंने इनमें अपनी अभिन्नाता का साक्षात्कार किया है।

व्रजवासियों ने इन्हें साक्षात श्रीकृष्ण ही जानकर बडे़ आदर से इनका पूजन किया था। वसन्त और ग्रीष्‍म, दोनों ऋतुओं में इन्‍होंने व्रजभूमि में विचरण किया और श्रीराधा तथा राधाकुण्ड के आस-पास के लोगों का शोक शान्त किया। उद्धव व्रजवासी अनुगामियों के साथ वहाँ की भूमि में यत्र-तत्र सर्वत्र विचरे हैं। इन्हें गौओं तथा नन्द आदि गोपों और गोपांग्‍नाओं 'वियोगार्तिहारी' कहा गया है। ये मन्त्री के अधिकार में कुशल तथा समस्त पार्षदों के अग्रगामी हैं। जब भगवान के अन्तर्धान की वेला आयेगी, उस समय धर्मपालक देहधारी भगवान उद्धव को अपना परम अद्भुत तेज भी दे देंगे। इनका मुद्राधिकार (भगवान की ओर से कुछ भी कहने और उनकी मुद्रिका या मोहर की छाप लगाकर कोई आदेश जारी करने का अधिकार) तो सर्वत्र और सदा ही विराजता है। अन्तर्धान काल में इन्हें भगवान की ओर से विशेष अधिकार दिया जायगा। ये बदरिकाश्रम तीर्थ में विराजमान परिकरों सहित धर्म-नन्द को भगवद रहस्य का बोध करायेंगे। अर्जुन आदि को भगवान के वियोग से जो बड़ी भारी पीड़ा होगी, उसका निवारण उद्धव ही करेंगे। मथुरा में यादवों का उत्तराधिकारी वज्रनाभ होगा। श्रीकृष्ण के पौत्रों तथा महारानियों के समुदाय में जो भगवद वियोग की वेदना होगी उसे दूर करने के लिये साक्षात श्रीहरि के द्वारा उद्धव ही नियुक्‍त किये जायेंगे।

कौरवों के कुल में परीक्षित नाम से विख्यात राजा होगा। उसका अत्यन्त तेजस्वी पुत्र जनमेजय नाम से प्रसिद्ध होगा। वह अपने पिता के शत्रु तक्षक नाग के कुल का नाशक सर्पयज्ञ करेगा, इसमें संशय नहीं हैं। उसको भी सारी यज्ञ सामग्री उद्धव के द्वारा ही प्राप्त होगी। उस समय दिव्य श्रीमद्भागवत पुराण की कथा होगा, उज्‍जवल (सात्तिवक) प्रकृति के लोग समवेत होंगे, इसमें संशय नहीं हैं। महान भगवद्भक्‍तों में उत्तम ब्रह्मर्षि (आस्तीक) के प्रसाद से जनमेजय द्वारा होने वाले सर्पयज्ञ की समाप्ति हो जायेगी। महाराज जनमेजय यज्ञ-संस्कार कराने वाले ब्राह्यणों का पूजन करके उन्हें सौ ग्राम अग्रहार के रूप में देंगे।

तदनन्तर आचार्य प्रवर श्रीप्रसादजी की आज्ञा से राजा जनमेजय शूकरक्षेत्र (सोरों) में जायँगे और वहाँ एक मास ठहरेंगे। उस तीर्थ में अनेक प्रकार के दान-गौ, बड़े-बड़े़ हाथी, घोडे़, रत्न, वस्त्र तथा इच्छानुसार भोजन ब्राह्मणों को देकर वे अपने आचार्य के साथ उस स्थान से लौटकर गंगा तट के तीर्थ स्थानों का दर्शन करते हए सत्पुरुषों से घिरे शयाननगर में आकर सेवकों सहित डेरा डालेंगे। वहाँ श्रीगुरु की आज्ञा से सामग्री और साधन जुटाकर अश्वमेध यज्ञ करेंगे और सर्वजेता (दिग्विजयी) होगे। इस प्रकार एकछत्र राज्य के स्वामी होकर श्रीगुरुदेव की शरण ले शयान नगर से पूर्व दिशा में रमणीय गंगा के तट पर अत्यन्त एकान्तवासी के रूप में तीर्थ सेवन करेंगे। वहाँ धार्मिकों के समाज में बड़े आनन्द के साथ भवरोग विनाशिनी भागवत कथा होगी। उस पूर्ण समाज में एक तुम भी रहोगे और भागवत की कथा सुनोगे। उसे सुनकर तुम्हें निर्मल पद की प्राप्ति होगी। तुमने मेरे लिये तपस्या की है, इसलिये तुम्हारे सामने मैंने इस रहस्य को प्रकाशित किया है। इस प्रकार माण्डूक देव को वर सेवकों सहित बलरामजी वहाँ से चले गये।

शुद्ध शयाननगर से ईशान कोण मे गंगा तट पर स्थित एक रमणीय स्थान है, जो कण्टक तीर्थ से उत्तर है और पुष्पवती नदी से दक्षिण दिशा में विद्यमान है। उसका विस्तार एक कोस में हैं। वहीं ठहरकर संकर्षणदेव दान पुण्य में लग गये। बलरामजी ने बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ दस हजार घोड़ों सौ रथों, एक हजार हाथियों, और दस हजार गौओं का दान किया। वहाँ समस्त देवता तथा तपस्या के धनी ऋषि मुनि आये। उन सबने बडे़ आदर से संकर्षणदेव का पूजन किया। फिर इस प्रकार स्तुति की- * 'प्रभो ! आप कोलेशदैत्य के हन्ता कथा गर्दभासुर (धेनुक) का विनाश करने वाले हैं, आपको नमस्कार है। हलायुध ! आपको प्रणाम है। मुसलास्त्र धारण करने वाले आपको नमस्‍कार है। सौन्दर्य स्वरूप आपको प्रणाम है। तालचिह्मित ध्वजा धारण करने वाले आपको बारंबार नमस्कार है। उन सबके द्वारा की गयी इस स्तुति को सुनकर संकर्षण बोले- 'आप सब लोगों को जो अभीष्ट हो, वह वर मुझसे माँगिये'।

बह्मर्षि और देवता बोले- भगवन् ! जब-जब आपत्ति में पड़कर हम आपके चरणों का चिन्तन करें, तब-तब आपकी आज्ञा से समस्त बाधाओं से मुक्त हो जायँ।

बलराम ने कहा- जब-जब आप लोग मेरी शरण में आकर मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब कलियुग में निश्‍चय ही मैं आप लोगों की रक्षा करूँगा, यह मेरा सत्य वचन है। इस स्थान पर मुनिपुंगवों ने मेरा पूजा करके वर प्राप्त किया, इसलिये कलियुग में यह तीर्थ 'संकर्ष स्थान' के नामसे विख्यात होगा। जो लोग इस तीर्थ में गंगा-स्नान और देवताओं का पूजन करेंगे, ब्राह्मणों को दान देंगे, उन्हें भोजन करायेंगे और विष्णु भगवान की पूजा करेंगे, इस भूतल पर उनका जीवन सफल होगा। वे देवताओं के लोक में जायँगे। अथवा यदि उनके मन में कोई अभीष्ट होगा तो उस अभीष्ट को ही प्राप्त कर लेंगे।

तदनन्तर बलराम सबके साथ अपनी पुरी मथुरा को चल गये। कोल राक्षस का वध और गंगा के जल में स्नान करके उन्होंने लोकसंग्रह के लिये प्रायश्चित किया था। जो मनुष्य बल के देवता बलराम की इस कथा को सुनेंगे, वे सब पापों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होंगे।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'कोलदैत्‍य का वध' नामक चौबीसवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

* नम: कोलेशघाताय खरासुरविघातिने। हलायुध नमस्‍तेऽस्‍तु मुसलास्‍त्राय ते नम: ।।

नम: सौन्‍दर्यरूपाय तालांकाय नमो नम: ।।

(गर्ग0, मथुरा0 24। 99)


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