07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 06 || प्रद्युम्न मरुधन्‍व देश के राजा गय को हराकर मालव नरेश तथा माहिष्‍मती पुरी के राजा से बिना युद्ध किये ही भेंट प्राप्‍त करना

गर्ग संहिता 
विश्वजित खण्‍ड  || अध्याय 06 || 
प्रद्युम्न मरुधन्‍व देश के राजा गय को हराकर मालव नरेश तथा माहिष्‍मती पुरी के राजा से बिना युद्ध किये ही भेंट प्राप्‍त करना 

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार कलिंगराज पर विजय पाकर यादवेश्वर प्रद्युम्न मरुधन्‍व (मारवाड़) देश में इस प्रकार गये, मानो अग्नि ने जल पर आक्रमण किया हो। धन्‍वदेश का राजा गया पर्वतीय दुर्ग में गये और राज सभा में प्रवेश करके गय से बोले- ‘महामते नरेश ! मेरी बात सुनिये। यादवों के स्‍वामी महान राज-राजेश्‍वर उग्रसेन जम्‍बूद्वीप के राजाओं को जीतकर राजसूययज्ञ करेंगे। साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍ण जो असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति हैं, उन महाराज के मन्‍त्री हुए हैं। उन्‍होंने ही धनुर्धरों श्रेष्‍ठ साक्षात प्रद्युम्न को यहाँ भेजा हैं। आप यदि अपने कुल का कुशल-क्षेम चाहें तो शीघ्र भेंट लेकर उनके पास चलें । श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्‍ ! यह सुनकर शौर्य और पराक्रम के मद से उत्‍मत रहने वाले महाबली राज गय ने कुछ कुपित होकर उद्धव से कहा । गय बोले- महामते ! मैं युद्ध किये बिना उनके लिये भेंट नहीं दूँगा। आप जैसे यादव लोग अभी थोडे़ ही दिनों से वृद्धि को प्राप्‍त हुए हैं- नये धनी हैं । राजन्‍ उसके यों कहने पर उद्धवजी ने प्रद्युम्न के पास आकर समस्‍त यादवों के सामने राजा गय की हुई बात दुहरा दी। फिर ते उसी समय रुक्मिणी पुत्र ने गिरिदुर्ग पर आक्रमण किया। गय के सैनिकों का यादवों के साथ घोर युद्ध हुआ। हाथियों के पैरों से नागरिकों तथा भूमि पर लेने वाले लोगों को कुचलता ओर वृक्षों को रौंदवाता हुआ राजा गय दो अक्षौहिणी सेना के साथ युद्ध के लिये निकला। रथी रथियों के साथ, बड़े-बड़े़ गज गजराजाओं के साथ, घुड़सवार घुड़सवारों के साथ तथा वीरों के साथ परस्‍पर युद्ध करने लगे। तीखे बाण-समूहों, ढाल, तलवार, गदा, ऋर्षि, पाश, फरसे, शतघ्री, और भुशुण्‍डी आदि अस्‍त्र–शस्‍त्रों की मार से भयातुर हो गये के सैनिक यादवों से परास्‍त हो अपना-अपना रथ छोड़कर सब-के-सब दसों दिशाओं में भाग चले। अपनी सेना के पलायन करने पर महाबली गय बार-बार धनुष की टंकार करता हुआ अकेला ही युद्ध के लिये आगे बढ़ा।

तेजस्‍वी श्रीकृष्‍णपुत्र दीप्तिमान ने धनुष से छोड़ हुए बाणों से शत्रु के घोड़ों को मार डाला। एक बाण से सारथि को नष्‍ट करके दो बाणों से उसकी ऊँची ध्‍वजा काट डाली। बीस बाणों से रथ को तोड़-फोड़कर पांच बाणों से उसके कवच को छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया। फिर महाबली दीप्तिमान ने सौ बाण से मारकर गय के धनुष को भी खण्डित कर दिया। गय ने दूसरे धनुष को लेकर बीस बाणों द्वारा श्रीकृष्‍णपुत्र दीप्तिमान को घायल कर दिया। फिर वह बलवान वीर मेघ के समान गर्जना करने लगा। समरांगण में उसके प्रहार से दीप्तिमान के हृदय में कुछ व्‍याकुलता हुई, तथापि उन्‍होंने एक ज्‍योतिर्मयी सुदृढ़ शक्ति हाथ में ली और उसे घुमाकर महात्‍मा गय के ऊपर चलाया। उस शक्ति ने राजा के हृदय को विदीर्ण करके उसका बहुत मूर्च्छित हो गया। दीप्तिमान अपने धनुष की कोटि शत्रु के गले में डालकर उसे घसीटते हुए प्रद्युम्न के सामने उसी प्रकार ले आये, जैसे गरुड़ किसी नाग को खींच लाया हो। उस समय मानवों तथा देवताओं की दुन्‍दुभियां एक साथ ही बज उठीं। देवता आकाश से और पार्थिव नरेश भूतल से फूलों की वर्षा करने लगे। राजन् ! तब गय ने भी शम्‍बरारि श्रीकृष्‍णपुत्र प्रद्युम्न के चरणों का पूजन किया । वहाँ से महात्‍मा प्रद्युम्न अवन्तिकापुर को गये, उसी प्रकार जैसे भ्रमर सुनहरी कर्णिका पर टूट पडे़। उनका आगमन सुनकर मालवनरेश जयसेन ने उनकी भली-भाँति पूजा की। मिथिलेश्‍वर ! वे प्रद्युम्न के प्रभाव को जानते थे, अत: उनके अपनी पराजय स्‍वीकार करके उन्‍होंने बडे़-बूढों को बुलवाया और उनके द्वारा महात्‍मा प्रद्युम्न को उत्तम भेंट-सामग्री अर्पित की। वहाँ अपने पिता की बुआ राजाधिदेवी को प्रणाम करके महामनस्‍वी प्रद्युम्न ने अपने फुफेरे भाई विन्‍द और अनुविन्‍द को गले से लगाया और मालवदेश के योद्धाओं से सादर घिरकर वे बड़ी शोभा को प्राप्‍त हुए । वहाँ से धनुर्धारियों में श्रेष्‍ठ प्रद्युम्न माहिष्‍मती पुरी को गये और यादवों तथा अपने सैनिकों के साथ वहाँ उन्‍होंने नर्मदा नदी का दर्शन किया। 

जल के कल्‍लोलों से सुशोभित नर्मदा मानो श्रृंगार-तिलक धारण किये हुए थी और छपी हुई पगड़ी की भाँति पुष्‍पसमूहों को बहा रही थी। बेंत, बॉस तथा अन्‍य वृक्षों से फूले हुए माधव-तरुओं से घिरी हुई नर्मदा मूर्तिमान तेजस्‍वी देवताओं से घिरी हुई आकाश गंगा की–सी शोभा पाती थी। उसके तट पर छावनी डालकर यादवेश्‍वर प्रद्युम्न यादवों के साथ इस प्रकार विराजमान हुए, मानो देवताओं के साथ देवराज इन्‍द्र शोभा पा रहे हों। महाराज ! माहिष्‍मती पुरी के स्‍वामी इन्‍द्रनील बडे़ ज्ञानी थे, उन्‍होंने महात्‍मा प्रद्युम्न के पास अपना दूत भेजा। दूत ने प्रद्युम्नराज के शिबिर में आकर हाथ जोड़ प्रणाम किया और सबके सुनते हुए वहाँ बात कही। दूत बोला- प्रभो ! हस्तिनापुर के राजा बुद्धिमान धृतराष्‍ट्र ने इन अत्‍यन्‍त बलवान वीर इन्‍द्रनील को माहिष्‍मती पुरी के राज्‍य पर स्‍थापित किया है, अत: ये किसी को बलि या भेंट नहीं देंगे। दुर्योधन को स्‍वेच्‍छा से ही ये द्रव्‍यराशि भेंट करते हैं, परंतु यहाँ युद्ध से कोई लाभ नहीं होगा। श्रीप्रद्युम्न ने कहा- दूत ! जैसे राजा गय और कलिंगराज ने अपमानित होने पर भेंट दी, उसी तरह यहाँ के राजा भी पराजित होकर भेंट देंगे। माहिष्‍मती के राजा बडे़ राजाधिराज बने हैं, परंतु ये महाराज उग्रसेन को नहीं जानते ।। श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यों कहने पर दूत ने तत्‍काल जाकर राजसभा में माहिष्‍मतीपति से प्रद्युम्न की कही हुई बात कह सुनायी। माहिष्‍मती के राजा ने देखा कि यादवों की सेना बड़ी उदंड है (अत: उससे युद्ध करना ‍ठीक न होगा) इसलिये वे पांच हजार हाथी, एक लाख घोड़े और दस हजार विजयशील रथ लेकर निकले ओर महात्‍मा प्रद्युम्न से मिलकर वह सब कुछ उन्‍हें भेंट कर दिया।

 इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्‍वजीत खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘माहिष्‍मतीपुरी पर विजय’ नामक छठा अध्‍याय पूरा हुआ । 

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