07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 10 || यादव-सेना का कोंकण, कुटक, त्रिगर्त, केरल, तैलंग, आदि देशों पर विजय प्राप्‍त कर करुष देश में जाना तथा वहाँ दन्‍तवक्र का घोर युद्ध

श्रीगर्ग संहिता 
07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 10 || यादव-सेना का कोंकण, कुटक, त्रिगर्त, केरल, तैलंग, महाराष्‍ट्र और कर्नाटक आदि देशों पर विजय प्राप्‍त कर करुष देश में जाना तथा वहाँ दन्‍तवक्र का घोर युद्ध

नारदजी कहते हैं- मिथिलेश्‍वर ! तदनन्‍तर मनुतीर्थ में स्‍नान करके प्रद्युम्न बारंबार दुन्‍दुभि बजवाते हुए यादव सेना के साथ कोंकण देश में गये। कोंकण देश का राजा मेधावी गदायुद्ध में अत्‍यन्‍त कुशल था। वह मल्‍लयुद्ध के द्वारा विपक्षी के बल की परीक्षा करने के लिये अकेला ही आया। उसने सेना सहित प्रद्युम्न से कहा- ‘यादवेश्‍वर ! मुझे गदा युद्ध प्रदान करो। प्रभो ! मेरे बल का नाश करो’।

प्रद्युम्न बोले- हे मल्‍ल ! इस भूतल पर एक-से-एक बढ़कर बलवान वीर है; अत: तुम अपने बल पर घमंड न करो। भगवान विष्‍णु की माया बड़ी दुर्गम है। हम लोग बहुत-से वीर यहाँ एकत्र हैं और तुम अकेले ही हमसे युद्ध करने के लिये आये हो। महामल्‍ल ! यह अधर्म दिखायी देता है, अत: इस समय लौट जाओ।

मल्‍ल बोला- जब आप लोग बलशाली वीर होकर भी युद्ध नहीं कर रहे हैं, तो मेरे पैरों के नीचे होकर निकल जाइये तभी अब यहाँ से लौटूँगा।

श्रीनारदजी कहते हैं- मैथिल ! उस मल्‍ल के यों कहने पर समस्‍त यादव-पुंगव वीर क्रोध से भर गये। तब उसके देखते- देखते बलदेवजी के छोटे भाई बलवान वीर गदा लेकर सामने खड़े हो गये। फिर वह भी सबके सम्‍मुख गदा उठाकर खड़ा हो गया। उस महाबली मल्‍ल ने गद के ऊपर एक बड़ी भारी गदा फेंकी। गद ने उसकी गदा को हाथ में थाम लिया और अपनी गदा उके ऊपर दे मारी। गद की गदा से आहत होकर वह पृथ्‍वी पर गिर पड़ा और मुख से रक्‍तवमन करने लगा। अब उसने युद्ध की इच्‍छा त्‍याग दी। तदनन्‍तर कोंकण वासी मेधावी ने श्रीहरि के पुत्र प्रद्युम्न को प्रणाम करके कहा- मैंने आप लोगों की परीक्षा के लिये यह कार्य किया था। आप तो साक्षात भगवान ही हैं। कहाँ आप और कहाँ मुझ जैसा प्राकृत मनुष्‍य ! मेरा अपराध क्षमा कीजिये। मैं आपकी शरण में आया हूँ’।

श्रीनारदजी कहते हैं– राजन्! ज्‍यों कहकर, भेंट देकर और श्रीहरि के पुत्र को नमस्‍कार करके कोंकण देश का राजा क्षत्रिय-शिरोमणी मेधावी अपनी पुरी को चला गया। कुटक देश का स्‍वामी मौलि शिकार खेलने के लिये नगर से बाहर निकला था। उसे जाम्‍बवती कुमार महाबाहु साम्‍बने जा पकड़ा। उससे भेंट लेकर प्रद्युम्न दण्‍डकारण्‍य को गये। वहाँ मुनियों के आश्रम देखते हुए सेना सहित श्रीकृष्‍ण कुमार क्रमश: निर्विध्‍या, मयोष्‍णी तथा तापी नदी में स्‍नान करके महाक्षेत्र शूर्पारक में गये।

वहाँ से आर्या द्वैपायनी देवी का दर्शन करके ऋष्‍यमूक की शोभा देखते हुए प्रवर्षण गिरि पर गये, जहाँ साक्षात भगवान पर्जन्‍य नित्‍य वर्षा करते हैं। वहाँ से गोकर्ण नामक शिवक्षेत्र का दर्शन करते हुए महाबली श्रीकृष्‍ण कुमार अपने सैनिकों के साथ त्रिगर्त और केरल देशों पर विजय पाने के लिए गये। केरल के राजा अम्‍बष्‍ठ ने मेरे मुख से महात्‍मा प्रद्युम्न के शुभागमन की बात सुनकर शीघ्र ही उन्‍हें भेंट अर्पित कर दी। तब वे कृष्‍णावेणी नदी को पार करके अपने सैनिकों की पद-धूलि राशि से आकाश में अन्‍धकार-सा फैलाते हुए तैलंगदेश में गये। तैलंग देश के राजा का नाम विशालाक्ष था। वे अपने नगर के उपवन में सुन्‍दरियों के साथ विहार करते थे। मधुर ध्‍वनियों से व्‍याप्‍त मृदंग आदि बाजे बज रहे थे तथा अप्‍सराएं उत्‍कृष्‍ट रागों द्वारा देवेन्‍द्र के समान उस राजा के सुयश का गान कर रही थी उस समय सुन्‍दरी रमणी रानी मन्‍दामालिनी ने धूल से व्‍याप्‍त आकाश की ओर देखकर राजा से कहा। रानी के बिम्‍बोपम अरुण ओष्‍ठ सूख गये थे। मन्‍दार मालिनी बोली- राजन् ! आप सदा विहार में ही रत रहने कारण दूसरी किसी बात को नहीं जानते हैं, दिन-रात अत्‍यन्‍त कामावेश के कारण चंचल बने रहते हैं। और मैं भी अपके मुख पर छिटकी हुई अलकों की सुगन्‍ध पर लुभायी भ्रमरी होकर कभी यह न जान सकी कि दु:ख क्‍या होता है। परंतु आज द्वारका के राजा उग्रसेन के राजसूय यज्ञ का बीड़ा उठाकर दिग्विजय के लिये निकले हुए वे यदुराज प्रद्युम्न चेदिराज आदि समस्‍त नरेशों को जीतकर यहाँ आ पहुँचे हैं। दुन्‍दुभियों की धुंकार-ध्‍वनि सुनिये। उसके साथ हाथि‍यों के चीत्‍कार और फूत्‍कार की ध्‍वनि भी मिली हुई है। शत्रुओं के कोदण्‍ड की टंकार प्रलयकाल के गर्जन-तर्जन का कोलाहल प्रस्‍तुत कर रही हैं।

शम्‍बर-शत्रु प्रद्युम्न के पास तुरंत भेंट भेज दीजिये। इन भागती हुई भूप सुन्‍दरियों की ओर देखिये, उनके बंधे हुए केशपाशों से फूल झड़ गये हैं। ये श्रमजल (पसीने) की वर्षा कर रही हैं और वन में प्रवेश करने क कारण इनके केशों के श्रृंगार बिगड़ गये हैं स्‍पष्‍ट प्रतीत नहीं हो रहे हैं ।

पत्‍नी की बात सुनकर राजा विशालाक्ष अत्‍यन्‍त प्रसन्‍न हो, भेंट-सामग्री लेकर प्रद्युम्न के सामने आये। उनके द्वारा पूजित और सम्‍मानित हो धुनर्धरों में श्रेष्‍ठ साक्षात प्रद्युम्न पम्‍पा-सरोवर तीर्थ में स्‍नान करके वहाँ से महाराष्‍ट्र की और चल दिये। महाराष्‍ट्र के राजा विमल विष्‍णुभक्‍त थे। उन्‍होंने बडे़ भक्तिभाव से श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न का सब प्रकार से पूजन किया। इसी प्रकार कर्नाटक के राजा सहस्‍त्रित स्‍वयं ही बहुत सी भेंट सामग्री लेकर आये और महात्‍मा प्रद्युम्न को अर्पित करके उन्‍होंने कल्‍याण के लिये उन परम प्रभु जगदीश्‍वर शम्‍बरारिक पूजन किया ।

मि‍थलेश्‍वर ! जैसे योगी देह से होने वाले विषय भोगों पर विजय पाने की चेष्‍टा करता है, उसी प्रकार साक्षात भगवान प्रद्युम्न यादवों के साथ करुष देश को जीतने के लिये गये। नरेश्‍वर ! वहाँ महारंगपुर में परम बुद्धिमान राजा वृद्धशर्मा रहते थे, जो वसुदेव की बहिन श्रुतदेवा के पति थे। उनका पुत्र दन्‍तवक्र श्रीकृष्‍ण का शत्रु कहा गया है। उसने भी शिशुपाल की भाँति कुपित हो यादवों के साथ स्‍वयं युद्ध करने का विचार किया।

य‍द्यपि माता-पिता ने उसे मना किया, तथापि दैत्‍यों के प्रति अनुराग रखने वाले उस दैत्‍य ने ‘मैं यादवों को मार डालूँगा’ इस प्रकार अपना क्रोध प्रकट किया। वह लाख भार की बनी हुई भारी गदा लेकर प्रद्युम्न की सेना के सामने अकेला ही युद्ध करने के लिये गया। दन्‍तवक्र के शरीर का रंग काला था। वह कोयले के पहाड़ सा जान पड़ता था। उसकी जीभ लपलपाती रहती थी और रूप बड़ा भयंकर था। वह दस ताड़ के बराबर ऊँचा था।
मस्‍तक पर किरीट, कानों में कुण्‍डल तथा वक्ष पर सोने के कवच से विभूषित वह करुष-राजकुमार करधनी की लड़ें पहिने हुए था। उसके चंचल चरणों में नूपूर बज रहे थे। वह अपने वेग से पृथ्‍वी को कँपाता, पर्वतों तथा वृक्षों को गिराता और अपनी गदा के प्रहार से शत्रुओं को काल के गाल में भेजता हुआ यमराज के समान दुर्जय प्रतीत होता थ। समरांगण में दन्‍तवक्र को उपस्थित देख समस्‍त यादव भय से थर्रा उठे। उसके आते ही महान कोलाहल मच गया। प्रद्युम्न ने उसके ऊपर बारंबार धनुष की टंकार करती हुई अठारह अक्षौहिणी विशाल सेना भेजी ।

राजन ! जैसे हाथी किसी पर्वत पर चारों ओर से टक्‍कर मारते हों, उसी प्रकार समस्‍त यादवों ने बाणों, फरसों, शघ्रियों तथा भुशुण्डियों से दन्‍तवक्र पर प्रहार करना आरम्‍भ किया। राजेन्‍द्र ! दन्‍तवक्र ने अपनी गदा से रणभूमि में बहुत से उत्‍कट गजराजों के कुम्‍भस्‍थल विदर्ण करके उन्‍हें मार गिराया। किन्‍हीं हाथियों को, जो किकिंणी-जाल से निनादित, साँकलों से सुशोभित, हौदों से अलंकृत और चंचल घंटों क रणत्‍कार से युक्‍त थे, उसने पॉंव पकड़कर उठा लिया और जैसे हवा रुई को दूर उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार आकाश में सौ योजन दूर फेंक‍ दिया। वह दैत्‍यराज किन्‍हीं-किन्‍हीं की कांखों में उभय पार्श्‍वों पैरों से आक्रमण करके वह दैत्‍य कालाग्निरुद्र की भाँति शोभा पाता था।

वह वीर सारथि, घोड़े, ध्‍वजा और महारथियों सहित रथों को आकाश में उसी तरह उठा देता था, जैसे आंधी कमलों को उड़ा ले जाती है। उसने घोड़ों और पैदल सैनिकों को भी बलपूर्वक उठा-उठाकर आकाश में फेंक दिया। बहुत-से महाबली राजकुमार ऊपर या नीचे या मुँह किये शस्‍त्रों तथा रत्‍नमय केयुरों सहित आकाश से गिरते हुए तारों के समान प्रतीत होत थे और मुँह से रक्‍त वमन कर रहे थे। मैथिल ! उस दैत्‍य पुंगव ने अपनी गदा से यादव-सेना को उसी प्रकार मथ डाला, जैसे भगवान श्रीवराह ने प्रलयकाल के समुद्र को अपनी दंष्‍ट्रा से विक्षुब्‍ध कर दिया था ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्‍वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘कोंकण, कुटक, त्रिगर्त, केरल, तैलंग, महाराष्‍ट्र और कर्नाटक पर विजय पाकर यादव सेना का करूष देश में गमन’ नामक दसवां अध्‍याय पूरा हुआ ।

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