07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 11 || दन्तवक्र की पराजय तथा करुष देश पर यादव-सेना की
वह रासमण्डल में रसिया बनकर नाचता था, किंतु अब जरासंध के भय से उसने भी समुद्र की शरण ले ली है। जो कालयवन के सामने डरपोक की तरह भागा था, वही आज ‘यदुनाथ’ बना है। उसके दिये हुए थोड़े से राज्य को पाकर उग्रसेन उस अल्पसार के लिये यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ करेगा ! काल की गतिदुर्लंघय है। अहो ! सारा संसार विचित्र हो गया। अत्यन्त दुर्बल सियार, सिंह और व्याघ्र पर शासन करने चला है।
श्रीप्रद्युम्न ने कहा- ओ निन्दक ! पहिले कुण्डिनपुर में तूने यादवों के बढ़े-चढे़ बल को शायद नहीं देखा था, किंतु आज यहाँं देख लेना। करुषराज ! तुम लोग मेरे सम्बन्धी हो, यह जानकर मैं तुमसे युद्ध नहीं करना चाहता था। किंतु तूने बलपूर्वक युद्ध छेड़ दिया। यह तेरे द्वारा धर्मशास्त्रानुमोदित कार्य ही तो किया गया है। नन्दराज साक्षात द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुल में अवतीर्ण हुए हैं। गोलोक में जो गोपालगण हैं, वे साक्षात श्रीकृष्ण के रोम से प्रकट हुए हैं और गोपियॉं श्रीराधा के रोम से उद्भुत हुई हैं।
वे सब की सब यहाँ व्रज में उतर आयी हैं। कुछ ऐसी भी गोपांगनाएं हैं, जो पूर्वकृत पुण्यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्ण को प्राप्त हुई हैं। भगवान श्रीकृष्ण साक्षात परिपूर्णतम परमात्मा हैं, असंख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति, गोलोक के स्वामी तथा परात्पर ब्रह्म हैं। जिनके अपने तेज में सम्पूर्ण तेज विलीन होते हैं, उन्हें ब्रह्मा आदि उत्कृष्ट देवता साक्षात ‘परिपूर्णतम’ कहते हैं, पूर्वकाल में जो चक्रवर्ती राज मरुत थे, वे ही श्रीकृष्ण के वरदान से यादवराज उग्रसेन हुए हैं। तू निरंकुश और महामूर्ख है, जो महान गुणशाली महापुरुष की निन्दा कारता है।
जैसे सिंह गीदड़ की आवाज पर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार महाराज उग्रसेन अथवा भगवान अथवा भगवान श्रीकृष्ण तेरी बकवास पर कोई विचार नहीं करेंगे ।
नारदजी कहते हैं- राजन! प्रद्युम्न की ऐसी बात सुनकर मदमत दन्तवक्र एक भारी गदा लेकर उनके रथ पर टूट पड़ा। उसने अपनी गदा से चोट करे उस रथ के सहस्त्र घोड़ा को गिरा दिया और गर्जना करने लगा। उसका भयंकर रूप देखकर सब घोडे़ भाग चले। तब प्रद्युम्न ने भी गदा लेकर उसकी छाती मे बडे़ जोर से प्रहार किया। उस प्रहार से दैत्यराज दन्तवक्र मन-ही-मन कुछ व्याकुल हो उठा। तब उन दोनों में गदा से घोर युद्ध होने लगा। गदाओं से परस्पर प्रहार करते हुए वे दोनों वीर एक-दूसरे को रणभूमि में रौंदने और गर्जने लगे।
राजन् ! उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो पर्वत पर दो सिंह आपस में जूझ रहे हों ।दन्तवक्र ने दोनों हाथों से श्रीकृष्ण कुमार का पकड़कर भूमि पर उसी प्रकार गिरा दिया, जैसे एक सिंह ने दूसरे सिंह को बलपूर्वक पटक दिया हो। प्रद्युम्न ने भी उठकर बलपूर्वक उसके दोनों हाथ पकड़ लिये और भुजाओं द्वारा घुमाकर उसे पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसकी हडि्डयां चूर-चूर हो गयीं शरीर शिथिल हो गया। उसे मूर्च्छा आ गयी।
वह आकृति से घबराया हुआ प्रतीत होने लगा। दन्तवक्र इन्द्र के वज्र से आहत हुए पर्वत की भाँति भूपृष्ठ पर सुशोभित हो रहा था। उसके शरीर के धक्के से समुद्र सहित पृथ्वी हिलने लगी, दिग्गज विचलित हो उठे, तारे खिसक गये और समुद्र कांपने लगे।
राजेन्द्र ! उसके गिरने के धमाके से तीनों लोकों के कान बहरे हो गये। उसी समय करुषराज महात्मा वृद्धशर्मा रानी श्रुतदेवा के साथ महारंगपुर से वहाँ आ पहुँचे। वे यादवों के साथ सुन्दर ढंग से संधि करना चाहते थे। मिथिलेश्वर ! वे शम्बराशत्रु प्रद्युम्न का भेंट देकर, पुत्र को साथ ले, संधि करके यदुपुंगवों से पूजित हो, पुन: महारंगपुर को चले गये ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘दन्तवक्र के साथ युद्ध में करूष देश पर विजय’ नामक ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ।
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