05. मथुराखण्‍ड || अध्याय 07 || मल्‍ल क्रीड़ा महोत्‍सव -कुवलया पीड़ वध व श्रीकृष्‍ण-बलराम मल्‍लयुद्ध

गर्ग संहिता
मथुराखण्‍ड : अध्याय 7

मल्‍ल क्रीड़ा महोत्‍सव की तैयारी, रंगद्वार पर कुवलया पीड़ का वध तथा श्रीकृष्‍ण और बलराम का चाणूर और मुष्टिक के साथ मल्‍लयुद्ध में प्रवृत्त होना

श्रीनारद जी कहते हैं- राजन ! रजक के मस्‍तक का छेदन, धनुष का भंजन तथा रक्षकों के वध का समाचार सुनकर कंस को बडा भय हुआ। तत्‍काल उसके सामने अपशकुन प्रकट हुए। उसके बायें अंग फड़कने लगे, उसे स्‍वप्‍न में अपना अंग-भंग दिखायी देने लगा। इससे दैत्‍यों के राजा कंस को रातभर नींद नहीं आयी। उसने स्‍वप्‍न में यह भी देखा था कि वह प्रेतों से घिरा हुआ है। उसके सारे शरीर में तेल मला गया है तथा वह नंगधडंग जापाकुसुम की माला पहिने भैंस पर चढकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है

प्रात:काल उठकर उसने कार्यकर्ताओं को बुलवाया और उन्‍हें मल्‍लक्रीड़ा महोत्‍सव प्रारम्‍भ करने की आज्ञा दी। सभामण्‍डप के सामने ही विशाल प्रांगण से युक्‍त स्‍थान पर रंगभूमि की रचना की गयी। वहाँ सोने के खंभे लगाये गये, सुनहरे चँदोवे ताने गये और उनमें मोतियों की लडियाँ लटका दी गयीं। नरेश्वर ! सुन्‍दर सोपानों और सुवर्णमय मंच्‍चों से वह रंगभूमि बड़ी शोभा पाने लगी। राजा के लिये रत्‍नमय सुन्‍दर मंच स्‍थापित किया गया। उस पर इत्र लगाया गया। उस मंच पर इन्‍द्र का सिंहासन लगा दिया गया। उसके उपर सुन्‍दर बिछावन और तकिये सुसज्जित कर दिये गये। चन्‍द्रमण्‍डल के समान मनोहर दिव्‍य छत्र तथा हीरे की बनी हुई मूठवाले हंस की-सी आभा से युक्‍त व्‍यजन और चामरों से सुशोभित विश्वकर्मा द्वारा रचित वह दस हाथ उँचा सिंहासन बड़ा ही चित्ताकर्षक था। उस पर आरूढ़ हो राजा कंस पर्वत शिखर पर बैठे हुए सिंह के समान शोभा पा रहा था। वहाँ गायकों द्वारा गीत गाये जाने लगे, वारांग्‍नाएँ नृत्‍य करने लगीं और मृदंग पटह, ताल, भेरी तथा आनक आदि बाजे बजने लगे।

राजन् ! छोटे-छोटे मण्‍डलों के शासन नरेश तथा नगर और जनपद के निवासी बड़े लोग पृथक-पृथक मंच पर बैठकर मल्‍लयुद्ध देख रहे थे। चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल आदि पहलवान व्‍यायामोपयोगी मुद्गगरों से युक्‍त हो परस्‍पर युद्ध का अभ्‍यास कर रहे थे। कंस के द्वारा बुलाये गये नन्‍दराज आदि गोप मस्‍तक झुकाये राजा को उत्तम भेंट अर्पित करके एक-एक मंच का आश्रय ले बैठ गये। नरेश्वर ! वहाँ यदुराज कंस के लिये बाणासुर, जरासंध और नरकासुर के नगर से भी उपहार आये। अन्‍य जो शम्‍बर आदि भूपाल थे, उनके पास से भी बहुत-सी भेंट-सामग्रियाँ आयीं।

तदनन्‍तर माया से बालक रूप धारा किये बलराम और श्रीकृष्‍ण दोनों भाई मल्‍लों के खेल देखने के लिये उस रंगशाला में आये। रंगमण्‍डप के द्वार पर कुवलयापीड़ नामक हाथी खड़ा था, जिसके कुम्‍भस्‍थल पर गोमुत्र में सने हुए सिन्‍दूर ओर कस्‍तूरी से पत्र-रचना की गयी थी। रत्‍नमय कुण्‍डलों से मण्डित उस महामत्त गजरात के गण्‍डस्‍थल से मद झर रहा था। द्वार पर हाथी को खड़ा देख श्रीकृष्‍ण ने महावत से गंभीर वाणी में कहा– ‘अरे ! इस गजराज को दूर हटा ले और मेरी इच्‍छा के अनुसार मार्ग दे दे। नहीं तो तुझको और तेरे हाथी को अभी भूतलपर मार गिराउँगा’। तब कुपित हुए महावत ने सम्‍पूर्ण दिशाओं में जोर-जोर से चिग्‍घाड़ते हुए उस मतवाले हा‍थी को नन्‍दनन्‍दन पर आक्रमण करने के लिये आगे बढ़ाया। गजराज ने तत्‍काल ही श्रीहरि को सूँड से पकड़कर उठा लिया। परंतु अपना भार अधिक बढ़ाकर श्रीहरि उसकी पकड़ से बाहर निकल गये। जैसे वृन्‍दावन के निकुंजों में श्रीहरि इधर-उधर लुकते-छिपते थे, उसी प्रकार इधर-उधर घूमकर वे कुवलयापीड के पैरों के बीच में छिप गये।

हाथी ने अपनी सूँड बढाकर उन्‍हें पकड़ लिया, किंतु उसकी सूँड को दोनों हाथों से दबाकर श्री‍हरि पीछे की ओर से निकल गये। तब हाथी ने बगल की दिशा में घूमकर उन्‍हें पकड़ने चेष्‍टा की, किंतु माधव उसके मस्‍तक पर मुक्‍के से प्रहार करके आगे की ओर भागे। विदेहराज ! उस गजराज भागते हुए श्रीहरि पीछा किया। उस समय मथुरापुरी में कोहराम मच गया। फिर श्रीहरि चक्‍कर देकर इधर पीछे की ओर निकल आये। उधर महाबली बलदेव ने, जैसे गरुड़ सर्प को पकड़ते है, उसी प्रकार अपने बाहुदण्‍डों से उसकी पूँछ पकड़कर उसे पीछे की ओर खींचा। तब हँसते हुए भगवान श्रीकृष्‍ण ने अपने दोनों हाथों से बलपूर्वक उसकी सूँड पकड़कर उसी तरह आगे की ओर खींचना आरम्‍भ किया, जैसे मनुष्‍य कूएँ रस्‍सी को खींचता है। नृपेश्वर ! उन दोनों भाइयों के आकर्षण से वह हाथी व्‍याकुल हो उठा। तब सात महावत बलपूर्वक उस हाथी पर चढ़ गये। साथ ही दूसरे महावत श्रीकृष्‍ण का वध करने के लिय तीन सौ हाथी वहाँ ले आये। महावतों के अंकुश की चोट करने से कुपित हुआ वह मतवाला हाथी पुन: श्रीकृष्‍ण की ओर झपटा। तब बलदेवजी के देखते-देखते साक्षात भगवान श्रीकृष्‍ण ने उसकी सूँड पकड़ ली और इधर-उधर घुमाकर उसे उसी प्रकार पृथ्‍वी पर दे मारा, जैसे कोई बालक कमण्‍डलु पटक दे। उस पर चढे हुए सातों महावत इधर-उधर दूर जा गिरे और वहाँ जुटे हुए साधु-पुरुषों के देखते-देखते वह हाथी प्राणशून्‍य हो गया। विदेहराज ! उसके शरीर से एक ज्‍योति निकली और श्रीघनश्‍याम में विलीन हो गयी।

महाबली बलराम और श्रीकृष्‍ण ने उस हाथी के दोनों दाँत उखाड़ लिये और जैसे दो हिंसक बच्‍चे बहुत-से मृगों का संहार कर डालें, उसी प्रकार समस्‍त महावतों को मौत के घाट उतार दिया। हाथी के मारे जाने पर जो अन्‍य महावत बचे थे, वे सब इधर-उधर भागकर उसी प्रकार छिप गये, जैसे वर्षाकाल व्‍यतीत हो जाने पर बादल जहाँ-के-तहाँ विलीन हो जाते हैं। इस प्रकार कुवलयापीड का वध करके पसीने की बूँदों और हाथी के मद से अंकित हुए बलराम और श्रीकृष्‍ण, दोनों बन्‍धु गोपों तथा शेष दर्शनार्थियों के मुख से अपनी जय-जयकार सुनते हुए बड़ी उतावली के साथ रंगशाला में प्रविष्‍ट हुए। उस समय उन दोनों के मुख अधिक परिश्रम के कारण लाल हो गये थे, उनके हाथों में हाथी के दाँत थे। वे दोनों दिशाओं में एक साथ चलने वाले अनिल और अनल की भाँति बड़े वेग से रंगभूमि में पहुँचे। उस समय मल्‍लों ने उन्‍हें महामल्‍ल समझा और नरों ने नरेन्‍द्र ! नारियों ने उन्‍हें कामदेव माना और गोपगणों ने व्रज का स्‍वामी। पिता की दृष्टि में वे पुत्र जान पड़े और दुष्‍टों को दण्‍डधारी यमराज के समान प्रतीत हुए। कंस ने उनको अपनी मृत्‍यु समझा और ज्ञानी पुरुषों ने उन्‍हें विराट ब्रह्म के रूप में देखा। उस समय बलराम के साथ रंगशाला में गये हुए श्रीकृष्‍ण को योगिशिरोमणि महात्‍मा पुरुषों ने परमतत्त्व के रूप में अनुभव किया। सभी तरह के लोगों ने अपनी पृथक-पृथक भावना के अनुसार उन परिपूर्ण देव श्रीहरि को विभिन्‍न रूपों में देखा और समझा।

हाथी को मारा गया सुनकर और उन महाबली बन्‍धुओं को देखकर मनस्‍वी कंस मन-ही-मन भयभीत हो उठा तथा मंचों पर बैठे हुए दूसरे-दूसरे लोग मन-ही-मन हर्ष से उल्‍लसित हो उठे और जैसे चन्‍द्रमा को देखकर चकोर सुखी होते है, उसी प्रकार वे उन्‍हें देखकर परमान्‍द में निमग्न हो गये। नगर के लोग अत्‍यन्‍त उत्‍सुक हो एक-दूसरे के कान-से-कान सटाकर परस्‍पर कहने लगे- 'ये दोनों वसुदेवनन्‍दन साक्षात परमपुरुष परमेश्वर हैं। अहो! व्रजमण्‍डल अत्‍यन्‍त रमणीय एवं श्रेष्‍ठ है, जहाँ ये साक्षात माधव विचरते रहे हैं और जिनका आज दुर्लभ दर्शन पाकर हम सर्वतो-भाव से कृतार्थ हो रहे हैं।

 नारदजी कहते हैं- मैथिल ! जब पुरवासी लोग इस प्रकार बात कर रहे थे और भाँति-भाँति के बाजे बज रहे थे, उस समय चाणूर ने बलराम और श्रीकृष्‍ण दोनों के पास जाकर कहा।

चाणूर बोला- हे राम ! हे कृष्‍ण ! आप दोनों बड़े बलवान है, अत: महराज के सामने अपने बल का प्रदर्शन करते हुए युद्ध कीजिये। यदुकुलतिकल महाराज कंस यदि इस युद्ध में प्रसन्‍न हो गये तो आप लोगों की और हमारी कौन-कौन-सी भलाई नहीं होगी ? (अर्थात् सब होगी)।
 
श्रीभगवान ने कहा- राजा के कृपा-प्रसाद से तो हमारी पहले से ही बहुत भलाई हो रही है। किंतु इतना ध्‍यान रखो कि हम लोग बालक है, अत: समान बल वाले बालकों के साथ ही हमारा युद्ध होगा, किसी बलवान के साथ नहीं। इसकी यथोचित्त व्‍यवस्‍था होनी चाहिए, यहाँ अधर्म युद्ध कदापि न होने पाये।

चाणूर ने कहा- न तो आप बालक हैं और न बलरामजी ही किशोर हैं। आप साक्षात बलवानों में भी बलिष्‍ठ हैं, क्‍योंकि सहस्‍त्र मतवाले हाथियों का बल धारण करने वाले कुवलयापीड़ को आप दोनों ने खिलवाड़ में ही मार डाला।

नारदजी कहते हैं- राजन् ! चाणूर की ऐसी बात सुनकर अघमर्दन भगवान श्रीकृष्‍ण चाणूर के साथ और बलवान बलरामजी मुष्टिक के साथ मल्‍ल युद्ध करने लगे। वे एक-दूसरे के भुजदण्‍डों को दोनों भुजाओं से पकड़कर अपनी ओर खींचते और पीछे ढकेलते थे। लोगों के देखते-देखते वे दोनों भाई विजय की इच्‍छा से लड़ने वाले दो हाथियों की भाँति अपने शत्रुओं से भिड़ गये। साक्षात श्रीहरि चाणूर के शरीर को दोनों हाथों से उठाकर उसके देहभार को उसी प्रकार तौला, जैसे ब्रह्माजी पुण्‍यात्‍माओं के पुण्‍यभार को तौला करते हैं। फिर महावीर चाणूर ने भगवान श्रीहरि को एक ही हाथ से उसी प्रकार लीलापूर्वक उठा लिया, जैसे नागराज शेष भूमण्‍डल को अपने एक ही फन पर धारण करते हैं। माधव ने अपनी भुजाओं के वेग से चाणूर की गर्दन और कमर में हाथ लगकार उसे उठा लिया और सहसा पृथ्‍वी पर दे मारा। एक ओर श्रीकृष्‍ण और चाणूर तथा दूसरी ओर बलराम और मुष्टिक एक दूसरे को हाथों, घुटनों, पैरों, भुजाओं, छातियों, अंगुलियों और मुक्‍कों से मारने लगे। बलराम और श्रीकृष्‍ण के मुखों पर परिश्रमजनित पसीने की बूँदे देखकर दया से द्रवित हो उस समय महल की खिड़कियों के पास बैठी हुई राजरानियाँ आपस में कहने लगीं।

स्त्रियाँ बोलीं- अहो ! राजा के मौजूद रहते उनके सामने सभा में यह बहुत बडा अधर्म हो रहा है ! कहाँ तो व्रज के समान सुदृढ़ शरीर वाले वे दोनों पहलवान और कहाँ फूल के सदृश सुकुमार बलराम और कृष्‍ण। अहो ! हम मथुरापुरवासियों कैसा अभाग्‍य है कि हमें आज इतने दिनों बाद इनका दर्शन भी हुआ तो युद्ध के अवसर पर। वनवासी गोपों का महान् सौभाग्‍य अत्‍यन्‍त धन्‍यवाद के योग्‍य है, जिन्‍हें रास-रस के साथ श्रीकृष्‍ण-बलराम का दर्शन होता आ रहा है। सखियों ! आश्चर्य की बात तो यह है कि इस दुष्‍ट-चित्त राजा के रहते हुए कोई भी कुछ कहने को समर्थ नहीं हो सकता। इसलिये हमारे पुण्‍य के बल से दोनों बन्‍धु शीघ्र ही अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्‍त करें।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘मल्‍लयुद्ध का वर्णन' नामक सातवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

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