07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 07 || गुजरात-नरेश ऋष्‍य पर विजयप्राप्‍त करके यादव-सेना का चेदिदेश के स्‍वामी दमघोष के यहाँ जाना राजा का यादवों से प्रेमपूर्ण बर्ताव करने का निश्‍चय, किंतु शिशुपाल का माता-पिता के विरुद्ध यादवों से युद्ध का आग्रह

गर्ग संहिता 
विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 07 || गुजरात-नरेश ऋष्‍य पर विजयप्राप्‍त करके यादव-सेना का चेदिदेश के स्‍वामी दमघोष के यहाँ जाना राजा का यादवों से प्रेमपूर्ण बर्ताव करने का निश्‍चय, किंतु शिशुपाल का माता-पिता के विरुद्ध यादवों से युद्ध का आग्रह 

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! महापराक्रमी प्रद्युम्न माहिष्‍मती के राजा को जीतकर अपनी विशाल सेना लिये गुजरात के राजा के यहाँ गये। जैसे पक्षिराज गरुड़ अपनी चोंच से सर्प को पकड़ लेती हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्‍ण कुमार प्रद्युम्न ने गुर्जरदेश के अधिपति महाबली वीर ऋष्‍य को सेना द्वारा जा पकड़ा। उनके तत्‍काल भेंट वसूल करके महाबली यादवेन्द्र अपनी विशाल वाहिनी साथ लिये हुए चेदिदेश में जा पहुँचे। चेदिराज दमघोष वसुदेवजी के बहनोई थे; किंतु उनका पुत्र शिशुपाल श्रीकृष्‍ण का पक्‍का शत्रु कहा गया है। बुद्धिमानों में श्रेष्‍ठ और उनको प्रणाम करके बोले । उद्धव ने कहा- राजन ! महाराज उग्रसेन को बलि दीजिये। वे समस्‍त राजाओं को जीतकर राजसूय यज्ञ करेंगे। श्रीनारदजी कहते हैं- मिथिलेश्‍वर ! उद्धवजी का यह वचन सुनकर दमघोष के दुष्ट पुत्र शिशुपाल के ओष्‍ठ फड़कने लगे। वह अत्‍यनत कुपित हो राजसभा में तुरंत इस प्रकार बोला । शिशुपाल ने कहा- अहो ! काल की गति दुर्लंघय है। यह संसार कैसा विचित्र है ! कालात्‍मा विधाता के प्राजापत्‍य पर भी कलह या विवाद खड़ा हो गया है (अर्थात लोक विधाता ब्रह्मा और घट-निर्माता कुम्‍भकार में झगड़ा हो रहा है कि प्रजापति कौन हैं) कहाँ राजहंस और कहाँ कौआ ! कहाँ पण्डित तथा कहाँ मूर्ख ! जो सेवक है, वे चक्रवर्ती राजा को अपने स्‍वामी को जीतने की इच्‍छा रखते हैं। राजा ययाति के शाप से यदुवंशी राज्‍य-पद से भ्रष्‍ट हो चुके हैं; किंतु वे छोटे–राज्‍य पाकर उसी तरह इतरा उठे हैं, जैसे छोटी नदियां थोड़ा सा जल पाकर उमड़ने लगती हैं- उच्‍छलित होने लगती हैं। जो हीनवंश का होकर राजा हो जाता है, अथवा जो सदा का निर्धन कभी धन पा जाता है, वह घमंड से भरकर सारे जगत को तृणवत मारने लगता है। उग्रसेन कितने दिनों से राजपदवी को प्राप्‍त हुआ ।

वासुदेव मन्त्री बना है और उग्रसेन उसी के बल से ओर केवल उसी से पूजित होकर राजा बन बैठा है। उसके मन्त्री वासुदेव ने जरासंध के भय से भागकर अपनी पुरी मथुरा को छोड़कर समुद्र की शरण ली है। वह पहले ‘नन्द’ नामक अहीर का भी बेटा कहा जाता था। उसी को वसुदेव लाजहया छोड़कर अपना पुत्र मानने लगे हैं। वसुदेव तो गोरे रंग के हैं, उनके उत्‍पन्‍न हुआ यह कृष्‍ण श्‍यामवर्ण का कैसे हो गया ? केवल पिता ही नहीं, पितामह भी गोरे हैं। उनके कुल की सं‍तति में इस वासुदेव की गणना हो, यह बडे़ दुख सेना सहित जीतकर भूण्‍मडल को यादवों से शून्‍य कर देने के लिये कुशस्‍थली पर चढा़ई करुँगा ।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् यों कहकर धनुष और अक्षय बाणों से भरे दो तरकस लेकर शिशुपाल को युद्ध के लिये जाने को उद्यत देख चेदिराज ने उससे कहा ।

दमघोष बोले- बेटा ! मैं जो कहता हूँ, उस सुनो। क्रोध न करो, न करो। जो सहसा कोई कार्य करता है, उसे सिद्धि नहीं प्राप्‍त होती। क्षमा के समान धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन दूसरा कोई नहीं है। इसलिये सामनीति से काम लेना चाहिये। साम के तुल्‍य दूसरा कोई सुखद उपाय नहीं हे। दान से समा की शोभा होती है और समा की सत्‍कार से। सत्‍कार की भी तभी शोभा होती है, जब वह यथायोग्‍य गुण देखकर किया जाय। यादव ओर चेदिप सगे सम्‍बन्‍धी माने गये हैं; अत: मैं वास्‍तव में यही चाहता हूँ कि यादवों तथा चेदियों में कलह न हो ।

श्रीनारदजी कहते हैं- बुद्धिमान दमघोष के समझाने पर भी शिशुपाल अनमना हो गया, कुछ बोला नहीं। वह महाखल चुपचाप बैठा रहा। राजन्! चेदिराज की रानी श्रुतिश्रवा शूरनन्‍दन वसुदेव की बहिन थी। वे अपने पुत्र शिशुपाल के पास आकर अच्‍छी तरह विनय युक्‍त होकर बोली ।

श्रुतिश्रवा ने कहा- बेटा ! खेद न करो। यादवों तथा चेदिपों में कभी कलह नहीं होना चाहिये। शूरनन्‍दन वसुदेव तुम्‍हारे मामा हैं और उनके पुत्र श्रीकृष्‍ण भी तुम्‍हारे भाई ही हैं। उनके जो प्रद्युम्न आदि सैकड़ों महावीर पुत्र आये हैं, वे सब मेरे और तुम्‍हारे द्वारा लाड़-प्‍यार पाने के योग्‍य तथा समादरणीय हैं। उनके साथ युद्ध करना उचित नहीं होगा। तात ! मैं तुम्‍हारे साथ स्‍वयं स्‍नेहार्द्रचित होकर उन समागत यादवों को लेने के लिये चलूँगी। चिरकाल से मेरे मन में उन सबको देखने की उत्‍कण्‍ठा है। मैं बडे़ उत्‍सव एवं उत्‍साह के साथ उनका घर लाऊँगी। ऐसा अवसर फिर कभी नहीं आयेगा ।

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