07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 08 || शिशुपाल के मित्र द्युमान तथा शक्‍त का वध

गर्ग संहिता विश्वजित खण्‍ड  || अध्याय 08 || शिशुपाल के मित्र द्युमान तथा शक्‍त का वध

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! शिशुपाल अपनी सेना को साथ ले माता-पिता का तिरस्‍कार करके चन्द्रिकापुर से बाहर निकला। दुष्‍टों का ऐसा स्‍वभाव ही होता है। उसके सात ‘वाहिनी’ और ‘ध्‍वजिनी’ सेनाओं से युक्‍त द्युमान और शक्‍त निकले। शिशुपाल के दो मन्त्रियों के नाम थे, रंग और पिंग। वे दोनों क्रमश: पृतना’ और ‘अक्षौहिणी’ सेना लिये युद्ध के लिये नगर से बाहर आये ।

नरेश्‍वर ! शिशुपाल की महासेना प्रलयकाल के महासगार के समान उमड़ती हुई आ रही थी। उसे देखकर यदुवंशी वीर भगवान श्रीकृष्‍ण को ही जहाज बनाये, उस सैन्‍य सागर से पर होने के लिये सामने आये। महाबली द्युमान शिशुपाल से प्रेरित हो ‘वाहिनी’ सेना सहित आगे बढ़कर योद्धाओं के साथ युद्ध करने लगा। समरांगण में दोनों सेनाओं की बाण-वर्षा से अन्‍धकार छा गया। घोड़ा की टापों से इतनी धूल उड़ी कि आकाश आच्‍छादित हो गया। नरेश्‍वर ! दौड़ते हुए घोड़े उछलकर हाथियों के मस्‍तक पर पांव रख देते थे और घायल हुए हाथी युद्धभूमि में पैरों से शत्रुओं को गिराते ओर सूँड की फुफकारों से इधर-उधर फेंकते-कुचलते आगे बढ़ रहे थे। उनके मस्‍तक पर कस्‍तूरी और सिन्‍दूर से पत्र-रचना की गयी थी और पीठ पर लाल रंग की ढूल उनकी शोभा बढ़ाती थी। पैदल सैनिक बाणों, गदाओं, तलवारों, शूलों और शक्तियों की मार से अंग-अंग कट जाने के कारण धराशायी हो रहे थे। उनके पैर, घुटने और बाहुदण्‍ड छिन्‍न-भिन्‍न हो गये।

राजन्! कोई अपनी तीखी तलवार से युद्ध में घोड़ों के दो टुकडे़ कर देता था। कितने ही वीर हाथियों के दाँत पकड़कर उनके मस्‍तों पर चढ़ जाते थे और सिंह की भाँति महावतों तथा हाथी-सवारों को चीर-फाड़ डालते थे। बहुत-से महाबली घुड़सवार योद्धा हाथियों के समूह को फाँदकर शत्रु-सैनिकों पर खड्ग का प्रहार करते और उन्‍हें घोड़ों की पीठ से उनका स्‍पर्श ही नहीं होता है। वे नटों की तरह विद्युत-वेग से घोड़ा पर चढ़ते-उतरते रहते थे ।

शत्रुओं की सेना का वेगपूर्वक आक्रमण होता देख अक्रूर सामने आये। वर्षा की वर्षा से दुर्दिन का दृश्‍य उपस्थित कर दिया। द्युमान ने भी अपने धनुष से छूटे हुए बाण-समूहों की बौछार से अक्रुर को आच्‍छादित कर दिया- ठीक उसी तरह, जैसे बादल वर्षकाल के सूर्य को ढक देता है।

गान्दिनी पुत्र अक्रूर ने क्रोध से मुर्च्छित हो द्युमान के बाण-समूहों पर विजय पाकर उस वीर के ऊपर शक्ति से प्रहार किया। उस प्रहार से द्युमान का अंग विदीर्ण हो गया। वह दो घड़ी के लिये अपनी चेतना खो बैठा। परंतु युद्ध आरम्‍भ कर दिया। द्युमान ने लाख भार लोहे की बनी हुई एक भारी गदा हाथ में ली और उसके द्वारा अक्रूर की छाती पर चपेट करके मेघ के समान गर्जना की। उसके प्रहार से अक्रूर मन-ही-मन मन किंचित व्‍याकुल हो उठे। तब बार-बार अपने धनुष की टंकार करते हुए युयुधान सामने आये। उन्‍होंने खेल-खेल में एक ही बाण मारकर तुरंत द्युमान का मस्‍तक काट डाला। द्युमान के गिर जाने पर उसके वीर सैनिक युद्ध का मैदान छोड़कर भाग चले।

उसी समय अपनी सेना को भागती देख शक्‍त वहाँ आ पहुँचा। उसने बुद्धिमान युयुधान पर सहसा शूल चलाया। युयुधान ने अपने बाण-समूहों से उस शूल क टुकडे़ कर दिये। इतने में ही महाबली वीर कृतवर्मा वहाँ आ पहुँचा। उसने बाण मारकर अश्वसहित शक्‍त के भी रथ को चूर-चूर कर दिया। तब शक्‍त ने भी गदा की चोट से कृतवर्मा ने रथ छोड़कर शक्‍त को रोषपूर्वक पकड़ लिया और उसे गिराकर दोनों भुजाओं से उछालकर एक योजन दूर फेंक दिया। उस युद्धभूमि में शक्‍त के गिर जाने पर शिशुपाल की आज्ञा से उसके दोनों मन्‍त्री रंग और पिंग क्रमश: ‘पृतना’ और ‘अक्षौहिणी’ सेनाओं के साथ बाण-वर्षा करते ओर युद्ध में शत्रुओं को कुचलते हुए आये। मैथिलेश्‍वर ! ऐसा जान पड़ता था, मानो अग्नि और वायु देवता एक साथ पहुँचे हैं। उन दोनों की उन दोंनों की सेना को देख पिता के समान पराक्रमी यादवेन्‍द्र प्रद्युम्न धनुष हाथ में लेकर भरी सभा में इस प्रकार बोले।

प्रद्युम्न ने कहा- योद्धाओं ! रंग और पिंग के साथ होने वाले युद्ध में अग्रगामी होकर आऊँगा; क्‍योंकि रंग और पिंग महान बल-पराक्रम से सम्‍पन्न दिखायी देते हैं ।

श्रीनारदजी कहते हैं- प्रद्युम्न की यह बात सुनकर श्रीकृष्‍ण के बलवान पुत्र नीतिवेता महाबाहु भानु सबसे आगे होकर अपने बडे़ भाई से बोले।

भानु ने कहा- जब तीनों लोक एक साथ युद्ध के लिये आपके सम्‍मुख उपस्थित दिखायी दें, तब आपके धनुष की टंकार होगी, इसमें संशय नहीं हैं। मैं केवल तलवार से ही रंग और पिंग के मस्‍तक काटकर तरबूज के दो टुकड़ों की भाँति हाथ में लिये यहाँ प्रवेश करुँगा ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्‍वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्रीनारद बहुलाश्‍व संवाद में ‘द्युमान और शक्त का वध’ नामक आठवां अध्‍याय पूरा हुआ।

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