05. मथुराखण्‍ड || अध्याय 10 || धोबी-दर्जी और सुदामा माली के पूर्वजन्‍म का परिचय

गर्ग संहिता
मथुराखण्‍ड : अध्याय 10

 धोबी, दर्जी और सुदामा माली के पूर्वजन्‍म का परिचय

बहुलाश्व ने पूछा– देवर्षे ! आपके मुख से मैंने भगवान श्रीकृष्‍ण के पावन चरित्र का श्रवण किया, किंतु पुन: अधिकाधिक सुनने की इच्‍छा हो रही है। जैसे प्‍यासा प्राणी जल की इच्‍छा करता है, उसी तरह मेरा मन आज श्रीकृष्‍ण चरित्र को सुनना चाहता है। आपने कंस के जन्‍म–कर्मों का वर्णन किया और मैंने सुना। केशी आदि बड़े-बड़े दैत्‍यों के पूर्वजन्‍म की बातें भी मैंने सुनी। अब यह जानना चाहता हूँ कि अहो ! जिसकी महती ज्‍योति श्रीकृष्‍ण में लीन हुई, वह धोबी पूर्वजन्‍म में कौन था ? और श्री‍हरि ने उसका वध क्‍यों किया ?।

नारदजी ने कहा – विदेहराज ! त्रेतायुग की बात है, अयोध्‍यापुरी में श्रीरामचन्‍द्रजी राज्‍य करते थे। उनके राज्‍यकाल में प्रजा की मनोवृति एवं दु:ख-सुख जानने के लिये गुप्‍तचर घूमा करते थे। एक दिन उन गुप्‍तचरों के सुनते हुए किसी धोबी ने अपनी भार्या से कहा– ‘तू दुष्‍टा है और दूसरे के घर में रहकर आयी है, इसलिये अब तुझे मैं नहीं रखूँगा। स्‍त्री के लोभी राजा राम भले ही सीता को रख ले, किंतु मैं तुझे नहीं स्‍वीकार करूँगा।’ इस प्रकार बहुत-से लोगों के मुख से आक्षेपयुक्‍त बात सुनकर श्रीराघवेन्‍द्र ने लोकापवाद के भय से सहसा सीता को वन में त्‍याग दिया। रघुकुल-तिलक श्रीरामने उस धोबी को दण्‍ड देने की इच्‍छा नहीं की। वही द्वापर के अन्‍त में मथुरापुरी में फिर धोबी ही हुआ। उसने सीता के प्रति जो कुवाच्‍य कहा था, उस दोष की शान्ति के लिये श्रीहरि ने स्‍वयं ही उसका वध किया, तथापि उन श्रीकरूणानिधि ने उस धोबी को मोक्ष प्रदान किया। राजन् ! दयालु श्रीकृष्‍णचन्‍द्र का यह परम अद्भुत चरित्र मैंने तुमसे कहा। अब पुन: क्‍या सुनना चाहते हो?।

बहुलाश्व ने पूछा – मुनिश्रेष्‍ठ ! पूर्वजन्‍म में वह दर्जी कौन था, जिसे भगवान श्रीकृष्‍ण ने अपना सारूप्‍य प्रदान किया ? ।

श्रीनारदजी कहा– राजन् ! पहले मिथिलापुरी एकी दर्जी था, जो भगवान श्रीहरि के प्रति भक्तिभाव रखता था। उसने श्रीराम के विवाह के समय राजा सीरध्‍वज जनक की आज्ञा से श्रीराम और लक्ष्‍मण के दूलह-वेष के लिये महीन डोरों से कपड़े सीये थे। वह वस्‍त्र सीने की कला में अत्‍यंत कुशल था। राजन् ! करोड़ों कामदेवों के समान लावण्‍य वाले सुन्‍दर श्रीराम और लक्ष्‍मण को देखकर को वह महामनस्‍वी दर्जी मोहित हो गया था। उसने मन-ही-मन यह इच्‍छा की कि मैं कभी अपने हाथों से इनके अंगों में वस्‍त्र पहिनाउँ। श्रीरघुनाथजी सर्वज्ञ हैं। उन्‍होंने मन-ही-मन उसे वर दे दिया कि ‘द्वापर के अन्‍त में भारतीय व्रज-मण्‍डल में तुम्‍हारा मनोरथ पूर्ण होगा’ श्रीरामचन्‍द्र जी वरदान से वही यह दर्जी मथुरा में प्रकट हुआ था, जिसने उन दोनों बन्‍धुओं की वेष-रचना करके उनका सारूप्‍य प्राप्‍त कर लिया ।

बहुलाश्व ने पूछा– ब्रह्मन् ! सुदामा माली ने, जिसके घर में परम मनोहर बलराम और श्रीकृष्‍ण स्‍वयं पधारे थे, कौन-सा पुण्‍य किया था ? बताइये ।

नारदजी ने कहा– राजन् ! राजराज कुबेर का एक परम रमणीय सुन्‍दर वन है, जो चैत्ररथ-वन के नाम से प्रसिद्ध है। उसमें फूल लगाने वाला एक माली था, जो हेममाली के नाम से पुकारा जाता था। वह भगवान विष्‍णु के भजन में तत्‍पर, शान्‍त, दानशील तथा महान सत्‍संगी था। उसने भगवान श्रीकृष्‍ण की प्राप्ति के लिये देवताओं की पूजा की। पाँच हजार वर्षों तक प्रतिदिन तीन सौ कमल-पुष्‍प लेकर वह भगवान शंकर के आगे रखता और उन्‍हें प्रणाम करता था। एक समय करूणानिधि त्रिनेत्रधारी भगवान शंकर उसके उपर अत्‍यन्‍त प्रसन्‍न हो बोले– ‘परम बुद्धिमान मालकार ! तुम इच्‍छानुसार वर माँगो।’ तब हेम-माली ने हाथ जोड़कर महादेवजी को नमस्‍कार किया और परिक्रमा करके उनके सामने खड़ा हो मस्‍तक झुकाकर कहा ।

हेममाली बोला– भगवन् ! परिपूर्णतम प्रभु श्रीकृष्‍ण कभी मेरे घर पधारें और मैं इन नेत्रों से उनका प्रत्‍यक्ष दर्शन करूँ– ऐसी मेरी इच्‍छा है। आपके वरदान से मेरी यह अभिलाषा पूर्ण हो ।

श्रीमहादेवजी ने कहा– महामते ! द्वापर के अन्‍त में भारत वर्ष की मथुरापुरी में तुम्‍हारा यह मनोरथ सफल होगा, इसमें संशय नहीं है।

नारदजी कहते हैं– राजन् ! महादेवजी के वरदान से वह महामना हेममाली द्वापर के अन्‍त में सुदामा माली हुआ था इसीलिये साक्षात बलराम और श्रीकृष्‍ण भगवान शिव की वाणी सत्‍य करने के लिये उसके घर पधारे थे। अब और क्‍या सुनना चाहते हो ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘धोबी, दर्जी और सुदामा माली का उपाख्‍यान’ नामक दसवाँ अध्‍याय पूरा हुआ ।

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