05. मथुराखण्ड || अध्याय 11 || कुब्जा और कुवलयापीड के पूर्वजन्मगत वृतान्त का वर्णन
गर्ग संहिता
मथुराखण्ड : अध्याय 11
कुब्जा और कुवलयापीड के पूर्वजन्मगत वृतान्त का वर्णन
बहुलाश्व ने पूछा– देवर्षे ! सैरन्ध्री ने पूर्व काल में कौन-सा परम पुष्कर तप किया था, जिससे देवताओं के लिये भी अत्यन्त दुर्लभ भगवान श्रीकृष्ण उस पर रीझ गये ?।
नारदजी ने कहा– राजन् ! करोड़ों कामदेवों के समान सुनदर श्रीरामचन्द्रजी जब पंचवटी में रहते थे, उस समय शूर्पणखा नामक राक्षसी उन्हें देखकर अत्यन्त मोहित हो गयी। ‘श्रीरघुनाथजी एक पत्नी व्रत के पालन में तत्पर हैं, अत: इनके मन में दूसरे किसी स्त्री प्रति मोह नहीं है’– यह विचार कर रावण की बहिन क्रोध से सीता को खा जाने के लिये दौड़ी। उस समय श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने रूष्ट होकर तीखी धार-वाली तलवार से तत्काल उसकी नाक और कान काट लिये। नाक कट जाने पर उसने लंका में जाकर रावण को यह सब समाचार बता दिया और स्वयं अत्यन्त खिन्नचित होकर वह पुष्कर-तीर्थ में चली गयी। वहाँ जल में खड़ी हो भगवान शंकर का ध्यान तथा श्रीराम को पति रूप में पाने की कामना करती हुई शूर्पणखा ने दस हजार वर्षों तक तपस्या की। इससे प्रसन्न हो देवाधिदेव भगवान उमापति पुष्कर-तीर्थ में आकर बोले– ‘तुम वर माँगों’।
शूर्पणखा ने कहा– परम देवदेव ! आप समस्त कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं, अत: मुझे यह वर दीजिये कि सत्पुरुषों के प्रिय श्रीरामचन्द्रजी मेरे पति हों।
शिव ने कहा– राक्षसी ! सुनो। यह वर तुम्हारे लिये अभी सफल नहीं होगा। द्वापर के अन्त में मथुरापुरी में तुम्हारी यह कामना पूरी होगी, इसमें संशय नहीं है।
नारदजी ने कहते हैं– राजन् ! महामते ! वही इच्छानुसार रूप धारण करने वाली शूर्पणखा नामक राक्षसी श्रीमथुरापुरी में ‘कुब्जा’ नाम से प्रसिद्ध हुई थी। महादेवजी वर से ही वह श्रीकृष्ण की प्रिया हुई। यह प्रसंग मैंने तुम्हे बताया। अब और क्या सुनना चाहते हो ?।
बहुलाश्व बोले– नारदजी ! यह कुवलयापीड पूर्वजन्म में कौन था ? कैसे हाथी की योनि को प्राप्त हुआ ? और किस पुण्य से भगवान श्रीकृष्ण में लीन हुआ ?।
नारदजी ने कहा– राजा बलि के एक विशालकाय एवं बलवान पुत्र था, जिसका नाम था– मन्दगति। वह समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ तथा एक लाख हाथियों के समान बलशाली था। एक समय श्रीरंगनाथ की यात्रा के लिये वह घर से निकला और जन-समुदाय में सम्मिलित हो गया। मन्दगति मतवाले हाथी के समान वेग से भुजाएँ हिलहिलाकर लोगों को कुचलता जा रहा था। रास्ते में उसकी भुजाओं के वेग से बूढे़, त्रित मुनि गिर पड़े। उनहोंने कुपित होकर उस मतवाले बलिष्ठ बलिकुमार को शाप दे दिया।
त्रित ने कहा- 'दुर्मते ! तू हाथी के समान मदोन्मत्त होकर रंग-यात्रा में लोगों को कुचलता जा रहा है, अत: हाथी हो जा।' इस प्रकार शाप मिलने पर वह बलवान दैत्य मन्दगति तत्काल तेजो भ्रष्ट हो गया और उसका शरीर केंचुल की भाँति छूटकर नीचे जा गिरा। मुनि के प्रभाव को जानने वाले उस दैत्य ने तुरंत ही हाथ जोड़ प्रणाम और परिक्रमा करके त्रित मुनि से कह
मन्दगति बोला- हे मुने ! कृपासिनधों ! आप द्विजों में श्रेष्ठ योगीन्द्र हैं। इस गज-योनि से मुझे कब छुटकारा मिलेगा, यह मुझे शीघ्र बताइये। मुने !आज से आप-जैसे महात्माओं की अवहेलना मेरे द्वारा कभी नहीं होगी। ब्रह्मन ! आप-जैसे मुनि वर और शाप-दोनों को देने में समर्थ हैं।
नारदजी कहते हैं- राजन ! उस दैत्य द्वारा इस प्रकार प्रसन्न किये जाने पर महामुनि त्रित का क्रोध दूर हो गया। फिर उन कृपालु ब्राह्मण शिरोमणि ने उस दैत्य से कहा।
त्रित बोले- दैत्यराज ! मेरी बात झूठी नहीं हो सकती, तथापि तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यनत प्रसनन हूँ। इसलिये तुम्हें ऐसा दिव्य वर प्रदान करूँगा, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। दैत्येन्द्र ! शोक न करो। श्रीहरि की नगरी मथुरा में श्रीकृष्ण के हाथ से तुम्हारी मुक्ति होगी, इसमें संशय नहीं है।
नारदजी कहते हैं- राजन ! वही यह मन्दगति दैत्य विनध्यपर्वत कुवलयापीड़ नाम से विख्यात हाथी हुआ, जो बल में अकेला ही दस हजार हाथियों के समान था। उसे मगधराज जरासंध ने लाख हाथियों के द्वारा वन में पकड़ा। विदेहराज ! फिर उसने कंस को दहेज में वह हाथी दे दिया। त्रित मुनि के कथनानुसार उसका तेज श्रीकृष्ण में लीन हुआ। यह प्रसंग मैंने तुमसे कहा, अब और क्या सुनना चाहते हो ?।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीमथुरा खण्ड के अनतर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘कुब्जा और कुवलयापीड के पूर्वजनम का वर्णन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ।
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