02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 01 || सन्नन्द का गोपों को महावन से वृन्दावन में चलने की सम्मति देना और व्रज मण्डल के सर्वाधिक माहात्म्य का वर्णन करना।

श्री गर्ग संहिता 
02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 01 || सन्नन्द का गोपों को महावन से वृन्दावन में चलने की सम्मति देना और व्रज मण्डल के सर्वाधिक माहात्म्य का वर्णन करना।

मंगलाचरण...

कृष्णातीरे कोकिलाकेलिकीरे गुंजापुंजे देवपुष्पादिकुंजे।
कम्बुग्रीवौ क्षिप्तबाहू चलंतौ राधाकृष्णौ मंगलं मे भवेताम॥1॥

श्री यमुना जी के तट पर, जहाँ कोकिलाएँ तथा क्रीड़ा शुक विचरते हैं, गुंजा पुंज से विलसित देवपुष्प (पारिजात) आदि के कुंज में, शंख-सदृश सुन्दर ग्रीवा से सुशोभित तथा एक-दूसरे के गले में बाँह डालकर चलने वाले प्रिया-प्रियतम श्री राधा-कृष्ण मेरे लिये मंगलमय हों।

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया।
चक्षुरून्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम:॥2॥

मैं अज्ञानरूपी रतौंधी से अन्धा हो रहा था; जिन्होंने ज्ञानरूपी अंजन की शलाका से मेरी आँखें खोल दी हैं, उन श्रीगुरूदेव को नमस्कार है।

श्रीनारद जी कहते हैं:- राजन, एक समय की बात है-व्रज में विविध उपद्रव होते देख नन्दराज ने अपने सहायक नन्दों, उपनन्दों, वृषभानुओं, वृषभानुवरों तथा अन्य बड़े-बूढ़े गोपों को बुलाकर सभा में उनसे कहा।

नन्द बोले:- गोपगण, महावन में तो बहुत से उत्पात हो रहे हैं, बताइये, हम लोगों को इस समय क्या करना चाहिये?

श्री नारद जी कहते हैं:- यह सुनकर उन सब में विशेष मंत्र कुशल वृद्ध गोप सन्नन्द ने बलराम और श्रीकृष्ण को गोद में लेकर नन्द राज से कहा।

सन्नन्द बोले:- मेरे विचार से तो हमें अपने समस्त परिकरों के साथ यहाँ से उठ चलना चाहिये और किसी दूसरे ऐसे स्थान में जाकर डेरा डालन चाहिये, जहाँ उत्पात की सम्भावना न हो। 

तुम्हारा बालक श्रीकृष्ण हम सबको प्राणों के समान प्रिय है, व्रजवासियों का जीवन है, व्रज का धन और गोपकुल का दीपक है और अपनी बाल लीला से सबके मन को मोह लेने वाला है। 

हाय, कितने खेद की बात है कि इस बालक पर पूतना, शकट और तृणावर्त का आक्रमण हुआ, फिर इसके ऊपर वृक्ष गिर पड़े; इन सब संकटों से यह किसी प्रकार बचा है, इससे बढ़कर उत्पात और क्या हो सकता है।
इसलिये हम लोग अपने बालकों के साथ वृन्दावन में चलें और जब उत्पात शांत हो जायँ, तब फिर यहाँ आयें।

नन्द ने पूछा:- बुद्धिमानों में श्रेष्ठ सन्नन्द जी, इस व्रज से वृन्दावन कितनी दूर है?
वह वन कितने कोसों में फैला हुआ है, उसका लक्षण क्या है और वहाँ कौन-सा सुख सुलभ हैं, यह सब बताइये।

सन्नन्द बोले:- बहिषत से ईषाण कोण, यदुपुर से दक्षिण और शोणपुर से पश्चिम की भूमि को ‘माथुर-मण्डकल’ कहते हैं। 

मथुरा मण्डबल के भीतर साढ़े बीस योजन विस्तृत भूभाग को मनीषी पुरुषों ने ‘दिव्य माथुर-मण्डल’ या ‘व्रज’ बताया है।

एक बार मैं मथुरा पुरी में वसुदेव जी के घर ठहरा हुआ था; वहीं श्री गर्गाचार्य जी के मुख से मैंने सुना था कि तीर्थराज प्रयाग ने भी इस दिव्य मथुरा-मण्डल की पूजा की है।

यों तो मथुरा-मण्डल में बहुत-से वन है किंतु उन सबसे श्रेष्ठ ‘वृन्दावन’ नामक वन है, जो परिपूर्णतम भगवान के भी मन को हरण करने वाला लीला-स्थल है। 

वैकुण्ठ से बढ़कर दूसरा लोक न तो हुआ है और न आगे होगा, केवल एक ‘वृन्दावन’ ही ऐसा है, जो वैकुण्ठ की अपेक्षा भी परात्पर (परम उत्कृष्ट) है। 

जहाँ ‘गोर्वधन’ नाम से प्रसिद्ध गिरिराज विराजमान है, जहाँ कालिन्दी के तट पर मंगलधाम पुलिन है, जहाँ बृहत्सानु (बरसाना) पर्वत है तथा जहाँ नन्दीश्वर गिरि शोभा पाता है, जो चौबीस कोस के विस्तार में स्थित तथा विशाल काननों से आवृत है; जो पशुओं के लिये हितकर, गोप-गोपी और गौओं के लिये सेवन करने योग्य तथा लता कुंजों से आवृत है, उस मनोहर वन को ‘वृन्दावन’ के नाम से स्मरण किया जाता है।

(सन्नन्द का गोपों को महावन से वृन्दावन में चलने की सम्मति देना और व्रज मण्डल के सर्वाधिक माहात्म्य का वर्णन करना)
नन्द जी ने पूछा:- सन्नन्द जी, तीर्थ राज प्रयाग ने कब इस व्रज की पूजा की है, मैं यह जानना चाहता हूँ, इसे सुनने के लिये मेरे मन में बड़ा कौतूहल बड़ी उत्कण्ठा है। 
सन्नन्द बोले:- नन्दराज, पूर्वकाल में नैमित्तिक प्रलय के अवसर पर एक महान दैत्य प्रकट हुआ, जो शंखासुर नाम से प्रसिद्ध था।
वह वेदद्रोही दैत्यराज समस्त देवताओं को जीतकर ब्रह्मलोक में गया और वहाँ सोते हुए ब्रह्मा जी के पास से वेदों की पोथी चुराकर समुद्र में जा घुसा।

वेदों के जाते ही देवताओं का सारा बल चला गया, तब पूर्ण भगवान यज्ञेश्वर श्री हरि ने अपने चक्र से उस शूल के सैकड़ों टुकड़े कर दिये।

तब शंखासुर ने अपने सिर से भगवान विष्णु के वक्ष:स्थल में प्रहार किया, किंतु उसके उस प्रहार से परात्पर श्री हरि विचलित नहीं हुए।

उस समय मत्स्यरूपधारी श्री हरि ने हाथ में गदा लेकर महाबली शंखरूपधारी उस दैत्य की पीठ पर आघात किया।
गदा के प्रहार से वह इतना पीड़ित हुआ कि उसका चित्त कुछ व्याकुल हो गया; किंतु पुन: उठकर उसने सर्वेश्वर श्री हरि को मुक्के से मारा। 

तब कमल नयन साक्षात भगवान विष्णु ने कुपित हो अपने चक्र से उसके सुदृढ़ मस्तक को सींग सहित काट डाला। 

व्रजेश्वर, इस प्रकार शंखासुर को जीतकर देवताओं के साथ सर्वव्यापी श्री हरि ने प्रयाग में आकर वे चारों वेद ब्रह्माजी को दे दिये।

फिर सम्पूर्ण देवताओं के साथ उन्होंने विधिवत यज्ञ का अनुष्ठान किया और प्रयाग तीर्थ के अधिष्ठता देवता को बुलाकर उसे ‘तीर्थराज’ पद पर अभिषिक्त कर दिया। 

साक्षात अक्षयवट को तीर्थराज के लिये लीला छत्र-सा बना दिया।
मुनि कन्या गंगा तथा सूर्य सुता यमुना अपनी तरंगरूपी चामरों से उनकी सेवा करने लगीं।

उसी समय जम्बू द्वीप के सारे तीर्थ भेंट लेकर बुद्धिमान तीर्थ राज के पास आये और उनकी पूजा और वन्दना करके वे तीर्थ अपने-अपने स्थान को चले गये।

नन्द, जब देवताओं के साथ श्री हरि भी चले गये, तब नारद जी आ पहुँचे और सिन्हासन पर देदीप्यमान तीर्थ राज से बोले।

श्रीनारदजी ने कहा:- महातपस्वी तीर्थराज, निश्चय ही तुम समस्त तीर्थों द्वारा विशेष रूप से पूजित हुए हो, तुम्हें सभी मुख्य मुख्य तीर्थों ने यहाँ आकर भेंट समर्पित की है; परंतु व्रज के वृन्दावन तीर्थ यहाँ तुम्हारे सामने नहीं आये।

तुम तीर्थों के राजाधिराज हो, व्रज के प्रमादी तीर्थों ने यहाँ न आकर तुम्हारा तिरस्कार किया है।

सन्नन्द कहते हैं:- यों कहकर साक्षात देवर्षि-शिरोमणि नारद जी वहाँ से चले गये।

तब तीर्थ राज के मन में बड़ा क्रोध हुआ और वे उसी क्षण श्री हरि के लोक में गये।
श्री हरि को प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके सम्पूर्ण तीर्थों से घिरे हुए तीर्थ राज हाथ जोड़कर भगवान के सामने खड़े हुए और उन श्रीनाथ से बोले।

तीर्थ राज ने कहा:- देवदेव, मैं आपकी सेवा में इसलिये आया हूँ कि आपने तो मुझे ‘तीर्थराज’ बनाया और समस्त तीर्थों ने मुझे भेंट दी, किंतु मथुरा मण्डल के तीर्थ मेरे पास नहीं आये; उन पमादी व्रज तीर्थों ने मेरा तिरस्कार किया है, अत: यह बात आपसे कहने के लिये मैं आपके मन्दिर में आया हूँ।

श्री भगवान बोले:- मैंने तुम्हें धरती के सब तीर्थों का राजा ‘तीर्थराज’ अवश्य बनाया है; किंतु अपने घर का भी राजा तुम्हें ही बना दिया हो, ऐसी बात तो नहीं हुई है।

फिर तुम तो मेरे गृह पर भी अधिकार जमाने की इच्छा लेकर प्रमत्त पुरुष के समान बात कैसे कर रहे हो? 

तीर्थराज, तुम अपने घर जाओ और मेरा यह शुभ वचन सुन लो, मथुरा मण्डल मेरा साक्षात परात्पर धाम है, त्रिलोकी से परे है, उस दिव्यधाम का प्रलय काल में भी सन्हार नहीं होता।

सन्नन्द कहते हैं:- यह सुनकर तीर्थ राज बड़े विस्मित हुए, उनका सारा अभिमान गल गया।

फिर वहाँ से आकर उन्होंने मथुरा के व्रज मण्डल का पूजन और उसकी परिक्रमा करके अपने स्थान को पदार्पण किया।

पृथ्वी का मानभंग करने के लिये यह व्रज मण्ड‍ल पहले दिखाया गया था, मैंने ये सारी बातें तुम्हारे सामने कहीं, अब और क्या सुनना चाहते हो।

(सन्नन्द का गोपों को महावन से वृन्दावन में चलने की सम्मति देना और व्रज मण्डल के सर्वाधिक माहात्म्य का वर्णन करना)

नन्द जी ने पूछा:- गोपेश्वर, किसने पहले पृथ्वी का मानभंग करने के लिये इस व्रज मण्डकल को दिखलाया था, यह मुझे बताइये।

सन्नन्द ने कहा:- इसी वाराहकल्प में पहले श्री हरि ने वराहरूप धारण करके अपनी दाढ़ पर उठाकर रसातल से पृथ्वी का उद्धार किया था।

उस समय उन प्रभु की बड़ी शोभा हुई थी, जल में जाते हुए उन वराहरूपधारी भगवान रमानाथ जनार्दन से उनकी दृष्टा के अग्रभाग पर शोभित हुई पृथ्वी बोली।

पृथ्वी ने पूछा:- प्रभो, सारा विश्व पानी से भरा दिखायी देता है, अत: बताइये, आप किस स्थल पर मेरी स्थापना करेंगे?

भगवान वराह बोले:- जब वृक्ष दिखायी देने लगें और जल में उद्वेग का भाव प्रकट हो, तब उसी स्थान पर तुम्हारी स्थापना होगी, तुम वृक्षों को देखती चलो।

पृथ्वी ने कहा:- भगवन, स्थावर वस्तुओं की रचना तो मेरे ही ऊपर हुई है, क्या कोई दूसरी भी धरणी है, धारणामयी धरणी तो केवल मैं ही हूँ।

सन्नन्द जी कहते हैं:- यों कहती हुई पृथ्वी ने अपने सामने जल में मनोहर वृक्ष देखे।

उन्हें देखकर पृथ्वी का अभिमान दूर हो गया और वह भगवान से बोली:- ‘देव, किस स्थल पर ये पल्लव सहित वृक्ष विधमान हैं?
यह दृश्य मेरे मन में बड़ा आश्चर्य पैदा कर रहा है, यज्ञपते प्रभो, इसका रहस्य बताइये’।

भगवान वराह बोले:- नितम्बिनि, यह सामने दिव्य ‘मथुरा-मण्डल’ दिखायी देता है, जो गोलोक की धरती से जुड़ा हुआ है, प्रलयकाल में भी इसका सन्हार नहीं होता।

सन्नन्द बोले:- यह सुनकर पृथ्वी को बड़ा विस्मय हुआ, वह अभिमान शून्य हो गयी।

अत: महाबाहु नन्द जी, यह व्रज मण्डल समस्त लोकों से अधिक महत्त्वशाली है।

व्रज का माहात्म्य सुनकर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है, तुम ‘मथुरा-व्रज मण्डल’ को तीर्थ राज प्रयाग से भी उत्कृष्ट समझो।

इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में श्री वृन्दावन खण्ड के अंतर्गत नन्द-सन्नन्द संवाद में ‘वृन्दावन में आगमन के उधोग का वर्णन’ नामक पहला अध्याय पूरा हुआ।

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