02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 04 || श्री बलराम और श्रीकृष्ण के द्वारा बछड़ों का चराया जाना तथा वत्सासुर का उद्धार
गर्ग संहिता
02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 04 || श्री बलराम और श्रीकृष्ण के द्वारा बछड़ों का चराया जाना तथा वत्सासुर का उद्धार
श्री नारद जी कहते हैं:- राजन, सन्नन्द जी की बात सुनकर महामना नन्दराज समस्त गोपगणों के साथ बड़े प्रसन्न हुए और वृन्दावन में जाने को तैयार हो गये।
यशोदा, रोहिणी तथा समस्त गोपांगनाओं के साथ घोड़ों, रथों, वीर पुरुषों तथा विप्र मण्ड़ली से मण्ड़ित हो, परम बुद्धिमान नन्दराज दोनों पुत्र बलराम और श्रीकृष्ण सहित रथ पर आरूढ़ हो वृन्दावन की ओर चल दिये।
उनके साथ गौओं का समुदाय भी था, बूढ़े, बालक और सेवकों सहित अनेक छकड़े चल रहे थे।
यात्रा के समय शंख बजे और नगारों की ध्वनियाँ हुईं, बहुत-से गायक नन्दराज का यशोगान कर रहे थे ।
गोप वृषभानुवर अपने पत्नि के साथ हाथी पर बैठकर, पुत्री राधा को अंक में लिये, गायकों से यशोगान सुनते हुए, मृदंग, ताल, वीणा और वेणुओं को मधुर ध्वनि के साथ वृन्दावन को गये, उनके साथ भी बहुत से गोप और गौओं का समुदाय था।
नन्द, उपनन्द, और छहों वृषभानु भी अपने समस्त परिकरों के साथ वृन्दावन में गये।
समस्त गोपों ने अपने सेवकों सहित वृन्दावन में प्रवेश करके अलग-अलग गोष्ठ बनाये और इधर-उधर निवास आरम्भ किया।
वृषभानु ने अपने लिये वृषभानुपुर (बरसाना) नामक नगर का निर्माण कराया, जो चार योजन विस्तृत दुर्ग के आकार में था।
उसके चारों ओर खाइयाँ बनी थीं, उस दुर्ग के सात दरवाजे थे, दुर्ग के भीतर विशाल सभा मण्ड़प था।
अनेक सरोवर उस दुर्ग की शोभा बढ़ा रहे थे, बीच-बीच में मनोहर राजमार्ग का निर्माण कराया गया था, एक सहस्त्र कुंजे उस पुर की शोभा बढ़ाती थी।
श्रीकृष्ण नन्द नगर (नन्द गाँव) तथा वृषभानुपुर (बरसाने) में बालकों के साथ क्रीड़ा करते हुए घूमते और गोपंगनाओं की प्रीति बढ़ाते थे।
राजन, कुछ दिनों बाद सम्पूर्ण गोपों के साथ समादर-भाजन मनोहर रूप वाले बलराम और श्रीकृष्ण वृन्दावन में बछड़े चराने लगे।
वे दोनों भाई ग्वाल-बालों के साथ गाँव की सीमा तक जाकर बछड़े चराते थे।
कालिन्दी के निकट उसके पावन पुलिन पर सुशोभित निकुंजों और कुंजों में बलराम और श्रीकृष्ण इधर-उधर लुका छिपी के खेल खेलते और कहीं-कहीं रंगते हुए चलकर वन में सानन्द विचरते थे।
उन दोनों के कटिप्रदेश में करधनी की लड़ियाँ शोभा देती थी, खेलते समय उनके पैरों के मंजीर और नूपुर मधुर झंकार फैलाते थे।
बलराम के अंगो पर नीलाम्बर शोभा पाता था और श्रीकृष्ण के अंगो पर पीतपट, वे दोनों भाई हार और भुज बन्दों से भूषित थे।
कभी बालकों के साथ क्षेपणों (ढ़ेलवासों) द्वारा ढ़ेले फेंकते और कभी बाँसुरी बजाते थे।
कुछ ग्वाल-बाल अपने मुख से करधनी के घुँघुरूओं की-सी ध्वनि करते हुए दौड़ते और उनके साथ वे दोनों बन्धु-राम और श्याम भी पक्षियों की छाया का अनुसरण करते भागते हुए सुशोभित होते थे।
सिर पर मयूरपिच्छ लगाकर फूलों और पल्लवों के शृंगार धारण करते थे।
श्री बलराम और श्रीकृष्ण के द्वारा बछड़ों का चराया जाना तथा वत्सासुर का उद्धार:-
नरेश्वर, एक दिन उनके बछड़ों के झुंड़ में कंस का भेजा हुआ वत्सासुर आकर मिल गया, श्रीकृष्ण को यह बात विदित हो गयी और वे उसके पास गये।
वह दैत्य गोप-बालकों के बीच में सब ओर पूँछ उठाकर बार-बार दौड़ता हुआ दिखायी देता था।
उसने अचानक आकर अपने पिछले पैरों से श्रीकृष्ण के कन्धों पर प्रहार किया।
अन्य गोप-बालक तो भाग चले, किंतु श्रीकृष्ण ने उसके दोनों पकड़ लिये और उसे घुमाकर धरती पर पटक दिया।
इसके बाद श्री हरि ने फिर उसे हाथों से उठाकर कपित्थ-वृक्ष पर दे मारा, फिर तो वह दैत्य तत्काल मर गया।
उसके धक्के से महान कपित्थ-वृक्ष ने स्वयं गिर कर दूसरे-दूसरे वृक्षों को भी धराशायी कर दिया, यह एक अद्भुत सी बात हुई।
समस्त ग्वाल बाल आश्चर्य से चकित हो कन्हैया को वहाँ साधुवाद देने लगे।
देवता लोग आकाश में खड़े हो जय-जयकार करते हुए फूल बरसाने लगे, उस दैत्य की विशाल ज्योति श्रीकृष्ण में लीन हो गयी।
बहुलाश्व ने पूछा:- मुने, यह तो बड़े आश्चर्य की बात है, बताइये तो, इस वत्सासुर के रूप में पहले का कौन-सा पुण्यात्मा पुरुष प्रकट हो गया था, जो परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्ण में विलीन हुआ?
श्री नारद जी बोले:- राजन, मुर के एक पुत्र था, जो महादैत्य ‘प्रमील’ के नाम से विख्यात था, उसने देवताओं को भी युद्ध में जीत लिया था।
एक दिन वह वसिष्ठ मुनि के आश्रम पर गया, वहाँ उसने मुनि की होम धेनु नन्दिनी को देखा।
उसे पाने की इच्छा से वह ब्राह्मण का रूप धारण करके मुनि के पास गया और उस मनोहर गौ के लिये याचना करने लगा।
महर्षि दिव्यदर्शी थे; अत: सब कुछ जानकर भी चुप रह गये, कुछ बोले नहीं, तब गौ ने स्वयं कहा।
श्री नन्दिनी बोली:- दुर्मते, तू मुर का पुत्र दैत्य है, तो भी मुनियों की गौ का अपहरण करने के लिये ब्राह्मण बनकर आया है; अत: गाय का बछड़ा हो जा।
श्री नारद जी कहते हैं:- राजन, नन्दिनी के इतना कहते ही वह मुर पुत्र महान गोवत्स बन गया।
तब उसने मुनिवर वसिष्ठ तथा उस गौ की परिक्रमा एवं प्रणाम करके कहा-‘मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये’।
गौ बोली:- महादैत्य, द्वापर के अंत में जब तू श्रीकृष्ण के बछड़ों में घुस जायगा, उस समय तेरी मुक्ति उनके हाथों से होगी।
श्री नारद जी कहते हैं:- उसी शाप और वरदान के कारण परिपूर्णतम पतित पावन साक्षात भगवान श्रीकृष्ण में दैत्य वत्सासुर विलीन हुआ, इसमें विस्मय की कोई बात नहीं है।
इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में श्रीवृन्दावन खण्ड के अंतर्गत ‘वत्सासुर का मोक्ष’ नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ।
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