02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 05 || भगवान श्री कृष्ण द्वारा वकासुर का उद्धार

श्री गर्ग संहिता 
02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 05 || भगवान श्री कृष्ण द्वारा वकासुर का उद्धार

श्री नारद जी कहते हैं:- एक दिन बलराम तथा ग्वाल-बालों के साथ बछड़े चराते हुए श्री हरि ने यमुना के निकट आये हुए वकासुर को देखा।

वह श्वेत पर्वत के समान ऊँचा दिखायी देता था, बड़ी-बड़ी टाँगें और मेघ-गर्जन के समान ध्वनि, उसे देखते ही ग्वाल-बाल ड़र के मारे भागने लगे। 

उसकी चोंच वज्र के समान तीखी थी, उसने आते ही श्री हरि बालकृष्ण को अपना ग्रास बना लिया, यह देख सब ग्वाल-बाल रोने लगे, रोते-रोते वे निष्प्राण-से हो गये। 

उस समय हाहाकार करते हुए सब देवता वहाँ आ पहुँचे, इन्द्र ने तत्काल वज्र चलाकर उस महान वक पर प्रहार किया।

वज्र की चोट से वकासुर धरती पर गिर पड़ा, किंतु मरा नहीं, वह फिर उठकर खड़ा हो गया।

तब ब्रह्मा जी ने भी कुपित होकर उसे ब्रह्मदण्ड से मारा, उस आघात से गिर कर वह असुर दो घड़ी तक मूर्च्छ्ति पड़ा रहा।

फिर अपने शरीर को कँपाता हुआ जँभाई लेकर वह बड़े वेग से उठ खड़ा हुआ, उसकी मृत्यु नहीं हुई, वह बलवान दैत्य मेघ के समान गर्जना करने लगा। 

इसी समय त्रिनेत्रधारी भगवान शंकर ने उस महान असुर पर त्रिशूल से प्रहार किया।
उस प्रहार से दैत्य की एक पाँख कट गयी,तो भी वह महाभंयकर असुर मर न सका। 

तदनंतर वायुदेव ने वकासुर पर वायव्यास्त्र चलाया; उससे वह कुछ ऊपर की ओर उठ गया, परंतु पुन: अपने स्थान पर आकर खड़ा हो गया। 

इसके बाद यम ने सामने आकर उस पर यम दण्‍ड से प्रहार किया, परंतु प्रचण्‍ड-पराक्रमी वकासुर की उस दण्‍ड से भी मृत्यु नहीं हुई।

यम राज का वह दण्‍ड भी टूट गया, किंतु वकासुर को कोई क्षति नहीं पहुँची।

इतने में ही प्रचण्‍ड किरणों वाले चण्ड़पराक्रमी सूर्य देव उसके सामने आये, उन्होंने धनुष हाथ में लेकर वकासुर को सौ बाण मारे।
वे तीखे बाण उसकी पाँख में धँस गये, फिर भी वह मर न सका। 

तब कुबेर ने तीखी तलवार से उसके ऊपर चोट की, इससे उसकी दूसरी पाँख भी कट गयी, किंतु वह दैत्य पुंगव मृत्यु को नहीं प्राप्त हुआ। 

तदनंतर सोम देवता ने उस महावक पर नीहारास्त्र का प्रयोग किया।
उसके प्रहार से शीत पीड़ित हो वकासुर मूर्च्छित तो हो गया, किंतु मरा नहीं; फिर उठकर खड़ा हो गया। 

अब अग्नि देवता ने उस महावक पर आग्नेयास्त्र से प्रहार किया; इससे उसके रोएँ जल गये, परंतु उस महादुष्ट दैत्य की मृत्यु नहीं हुई। 

तत्पश्चात जल के स्वामी वरूण ने उसको पाश से बाँध कर धरती पर घसीटा, घसीटने से वह महापापी असुर क्षत-विक्षत हो गया; किंतु मरा नहीं ।

तदनंतर वेगशालिनी भद्रकाली ने आकर उस पर गदा से प्रहार किया।
गदा के प्रहार से मूर्च्छ्ति हो वकासुर अत्यंत वेदना के कारण सुध-बुध खो बैठा। 

उसके मस्तक पर चोट पहुँची थी, तथापि वह अपने शरीर को कँपाता और फड़फड़ाता हुआ फिर उठकर खड़ा हो गया और वह महादुष्ट दैत्य धीरतापूर्वक समरांण में स्थित हो मेघों की भाँति गर्जना करने लगा। 

उस समय शक्तिधारी स्कन्द ने बड़ी उतावली के साथ उसके ऊपर अपनी शक्ति चलायी, उसके प्रहार से उस पक्षिप्रवर असुर की एक टाँग टूट गयी, किंतु वह मर न सका। 

तदनंतर विद्युत की गड़गड़ाहट के समान गर्जना करते हुए उस दैत्य ने सहसा क्रोधपूर्वक धावा किया और अपनी तीखी चोंच से मार-मारकर सब देवताओं को खदेड़ दिया।

आकाश में आगे-आगे देवता भाग रहे थे और पीछे से वकासुर उन्हें खदेड़ रहा था। 

इसके बाद वह दैत्य पुन: वहीं लौट आया और समस्त दिंमण्‍डल को अपने सिंहनाद से निनांदित करने लगा ।

उस समय समस्त देवर्षियों,ब्रह्मर्षियों तथा द्विजों ने श्री नन्दनन्दन सफल आशीर्वाद प्रदान किया। 

उसी समय श्रीकृष्ण ने वकासुर के शरीर के भीतर अपने ज्योतिर्मय दिव्य देह को बढ़ाकर विस्तृत कर लिया।
फिर तो उस महावक का कण्ठ फटने लगा और उसने सहसा श्रीकृष्ण को उगल दिया।

फिर तीखी चोंच से श्रीकृष्ण को पकड़ने के लिये जब वह पास आया, तब श्रीकृष्ण ने झपट कर उसकी पूँछ पकड़ ली और उसे पृथ्वी पर दे मारा; किंतु वह पुन: उठकर चोंच फैलाये उनके सामने खड़ा हो गया। 

तब श्रीकृष्ण ने दोनों हाथों से उसकी दोनों चोंचें पकड़ ली और जैसे हाथी किसी वृक्ष की शाखा को चीर ड़ाले, उसी तरह उसे विदीर्ण कर दिया ।

उस समय मृत्यु को प्राप्त हुए दैत्य की देह से एक ज्योति निकली और श्रीकृष्ण में समा गयी। 

फिर तो देवता जय-जयकार करते हुए दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे।

तब समस्त ग्वाल-बाल आश्चर्यचकित हो, सब ओर से आकर श्रीकृष्ण से लिपट गये और बोले:- ‘सखे, आज तो तुम मौत के मुख से कुशलपूर्वक निकल आये’।

इस प्रकार वकासुर को मारने के पश्चात बछड़ों को आगे करके श्रीकृष्ण बलराम और ग्वाल-बालों के साथ गीत गाते हुए सहर्ष राजभवन में लौट आये। 

परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्ण के इस विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उसे सुनकर समस्त गोप अत्यंत विस्मित हुए।

भगवान श्री कृष्ण द्वारा वकासुर का उद्धार:-
वकासुर के वध की कथा सुनने के बाद राजा बहुलाश्व ने नारदजी से पूछा:- देवर्षे, यह वकासुर पूर्वकाल में कौन था और किस कारण से उसको बगुले का शरीर प्राप्त हुआ था?
वह पूर्णब्रह्म सर्वेश्वर श्रीकृष्ण में लीन हुआ, यह कितने सौभाग्य की बात है।

श्री नारद जी ने कहा:- नरेश्वर, ‘हयग्रीव’ नामक दैत्य के एक पुत्र था, जो ‘उत्कल’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

उसने समरांगण में देवताओं को परास्त करके देवराज इन्द्र के छत्र को छीन लिया था।

उस महाबली दैत्य ने और भी बहुत से मनुष्यों तथा नरेशों की राज्य-सम्पत्ति का अपहरण करके सौ वर्षों तक सर्ववैभवसम्पन्न राज्य का उपभोग किया। 

एक दिन इधर-उधर विचरता हुआ दैत्य उत्कल गंगासागर संगम पर सिद्ध मुनि जाजलि की पर्णशाला के समीप गया और पानी में बंसी डालकर बारम्बार मछलियों को पकड़ने लगा, यद्यपि मुनि ने मना किया, तथापि उस दुर्बुद्धि ने उनकी बात नहीं मानी।

मुनिश्रेष्ठ जाजलि सिद्ध महात्मा थे, उन्होंने उत्कल को शाप देते हुए कहा:- ‘दुर्मते, तू बगुले की भाँति मछली पकड़ता और खाता है, इसलिये बगुला ही हो जा।’ 

फिर क्या था, उत्कल उसी क्षण बगुले के रूप में परिणत हो गया। 

तेजोभ्रष्ट हो जाने के कारण उसका सारा गर्व गल गया, उसने हाथ जोड़कर मुनि को प्रणाम किया और उनके दोनों चरणों में पड़कर कहा।

उत्कल बोला:- मुने, मैं आपके प्रचण्‍ड तपोबल को नहीं जानता था, जाजलिजी मेरी रक्षा कीजिये। 

आप- जैसे साधु महात्माओं का संग तो उत्तम मोक्ष का द्वार माना गया है।
जो शत्रु और मित्र में, मान और अपमान में, सुवर्ण और मिट्टी के ढ़ेले में तथा सुख और दु:ख में भी समभाव रखते हैं, वे आप- जैसे महात्मा ही सच्चे साधु हैं। 

मुने, इस भूतल पर महात्माओं के दर्शन से मनुष्यों का कौन-कौन मनोरथ नहीं पूरा हुआ? 

ब्रह्मपद, इन्द्रपद, सम्राट का पद तथा योगसिद्धि- सब कुछ संतों की कृपा से सुलभ हो सकते हैं।

मुनि श्रेष्ठ जाजले, आप-जैसे महात्माओं से लोगों को धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति हुई तो क्या हुई, साधुपुरुषों की कृपा से तो साक्षात पूर्णब्रह्म परमात्मा भी मिल जाता है ।

श्री नारद जी कहते हैं:- नरेश्वर, उस समय उत्कल की विनययुक्त बात सुनकर वे जाजली मुनि प्रसन्न हो गये। 
उन्होंने साठ हजार वर्षों तक तपस्या की थी, उन्होंने उत्कल से कहा।

जाजलि बोले:- वैवस्वत मंवंतर प्राप्त होने पर जब अट्ठाईसवें द्वापर का अंतिम समय बीतता होगा, उस समय भारत वर्ष के माथुर जनपद में स्थित व्रज मण्‍डल के भीतर साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण वृन्दावन में गोवत्स चराते हुए विचरेंगे। 

उन्हीं दिनों तुम भगवान श्रीकृष्ण में लीन हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है।
हिरण्याक्ष आदि दैत्य भगवान के प्रति वैर भाव रखने पर भी उनके परम पाद को प्राप्त हो गये हैं ।

श्री नारद जी कहते हैं:- इस प्रकार वकासुर के रूप में परिणत हुआ उत्कल दैत्य जाजलि के वरदान से भगवान श्रीकृष्ण में लय को प्राप्त हुआ, संतों के संग से क्या नहीं सुलभ हो सकता।

इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में श्री वृन्दावनखण्‍ड के अंतर्गत ‘वकासुर का मोक्ष’ नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ।

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य