02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 07 || ब्रह्माजी के द्वारा गौओं, गोवत्सों एवं गोप-बालकों का हरण

श्री गर्ग संहिता 
02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 07 || ब्रह्माजी के द्वारा गौओं, गोवत्सों एवं गोप-बालकों का हरण

श्री नारद जी कहते हैं- राजेन्द्र ! अब भगवान श्रीकृष्ण की अन्य लीला सुनिये। यह लीला उनके बाल्यकाल की है, तथापि उनके पौगण्‍डावस्था की प्राप्ति के बाद प्रकाशित हुई। श्रीकृष्ण गोवत्स एवं गोप-बालकों की मृत्यु के समान (भयंकर) अघासुर के मुख से रक्षा करने के उपरांत उनका आनन्द बढ़ाने की इच्छा से यमुना तट पर जाकर बोले- ‘प्रिय सखाओ ! अहा, यह कोमल वालुकामय तट बहुत ही सुन्दर है ! शरद ऋतु में खिले हुए कमलों के पराग से पूर्ण है। शीतल, मन्द एवं सुगन्धित-त्रिविध वायु से सौरभित है। यह तट भूमि भौंरो की गुंजार से युक्त एवं कुंज और वृक्ष लताओं से सुशोभित है। गोप बालको ! दिन का एक पहर बीता गया है। भोजन का समय भी हो गया है। अतएव इस स्थान पर बैठकर भोजन कर लो। कोमल वालुका वाली यह भूमि भोजन करने के उपयुक्त दीख रही है। बछड़े भी यहाँ जल पीकर हरी-हरी घास चरते रहेंगे।’
श्रीकृष्ण ने गोप-बालकों के साथ, जिनकी उनके सामने भीड़ लगी हुई थी, एक राज सभा का आयोजन किया।
गोप बालकों ने श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर कहा-‘ऐसा ही हो’ और वे सब के सब भोजन करने के लिये यमुना तट पर बैठ गये। इसके उपरांत जिनके पास भोजन-सामग्री नहीं थी, उन बालकों ने श्रीकृष्ण के कान में दीन-वाणी से कहा- ‘हम लोगों के पास भोजन के लिये कुछ नहीं है, हम लोग क्या करें ? नन्द गाँव यहाँ से बहुत दूर है, अत: हम लोग बछड़ों को लेकर चले जाते हैं।’ यह सुनकर श्रीकृष्ण बोले- ‘प्रिय सखाओ ! शोक मत करो। मैं सबको यत्न पूर्वक (आग्रह के साथ) भोजन कराऊँगा। इसलिये तुम सब मेरी बात पर भरोसा करके निश्चिन्त जो जाओ।’ श्रीकृष्ण की यह उक्ति सुनकर वे लोग उनके निकट ही बैठ गये। अन्य बालक (अपने-अपने) छीकों को खोलकर श्रीकृष्ण के साथ भोजन करने लगे ।

श्रीकृष्ण ने गोप-बालकों के साथ, जिनकी उनके सामने भीड़ लगी हुई थी, एक राज सभा का आयोजन किया। 

समस्त गोप-बालक उनको घेर कर बैठ गये, ये लोग अनेक रंगों के वस्त्र पहने हुए थे और श्रीकृष्ण पीला वस्त्र धारण करके उनके बीच में बैठ गये। 

विदेह, उस समय गोप-बालकों से घिरे हुए श्रीकृष्ण की शोभा देवताओं से घिरे हुए देवराज इन्द्र के समान अथवा पँखुड़ियों से घिरी हुई स्वर्णिम कमल की कर्णिका (केसर युक्त भीतरी भाग) के समान हो रही थी। 

कोई बालक कुसुमों, कोई अंकुरों, कोई पल्लवों, कोई पत्तों, कोई फलों, कोई अपने हाथों, कोई पत्थरों और कोई छीकों को ही पात्र बनाकर भोजन करने लगे। 

उनमें से एक बालक ने शीघ्रता से कौर उठाकर श्रीकृष्ण के मुख में दे दिया।

श्रीकृष्ण ने भी उस ग्रास का भोग लगाकर सबकी ओर देखते हुए कहा:- ‘भैया, अन्य बालकों को अपनी-अपनी स्वादिष्ट सामग्री चखाओ, मैं स्वाद के बारे में नहीं जानता।’

बालकों ने ‘ऐसा ही हो’ कहकर अन्यान्य बालकों को भोजन के ग्रास ले जाकर दिये।
वे भी उन ग्रासों को खाकर एक दूसरे की हँसी करते हुए उसी प्रकार बोल उठे। 

सुबल ने पुन: हरि के मुख में ग्रास दिया, परंतु श्रीकृष्ण उस कौर में से थोड़ा-सा खाकर हँसने लगे, इस प्रकार जिस-जिसने कौर खाया, वे सभी जोर से हँसने लगे। 

बालक बोले:- ‘नन्दनन्दन, सुनो जिसके नाना मूढ़ (मूर्ख) हैं, उसको भोजन का ज्ञान नहीं रहता, इसलिये तुमको स्वाद प्राप्त नहीं हुआ’।

इसके उपरांत श्री दामा ने माधव को और अन्य बालकों को भोजन के ग्रास दिये, व्रज-बालकों ने उसको उत्तम बताकर उसकी बहुत प्रशंसा की। 

इसके बाद वरूपथ नाम के एक बालक ने पुन: श्रीकृष्ण को एवं अन्य बालकों को आग्रह पूर्वक कौर दिये।

श्रीकृष्ण आदि वे सभी लोग थोड़ा-थोड़ा खाकर हँसने लगे।

बालकों ने कहा:- ‘यह भी सुबल के ग्रास-जैसा ही है, हम सभी उसे खाकर उद्विग्र हुए हैं।’ 

इस प्रकार सभी ने अपने-अपने ग्रास चखाये और सभी परस्पर हँसने-हँसाने और खेलने लगे। 

कटि वस्त्र में वेणु, बगल में लकुटी एवं सींगा, बायें हाथ में भोजन का कौर, अंगुलियों के बीच में फल, माथे पर मुकुट, कन्धे पर पीला दुपट्टा, गले में वनमाला, कमर में करधनी, पैरों में नुपूर और ह्रदय पर श्री वत्स तथा कौस्तुभमणि धारण किये हुए श्रीकृष्ण गोप-बालकों के बीच में बैठकर अपनी विनोद भरी बातों से बालकों को हँसाने लगे।

इस प्रकार यज्ञभोक्ता श्री हरि भोजन करने लगे, जिसको देवता एवं मनुष्य आश्चर्यचकित होकर देखते रहे। 

इस प्रकार श्रीकृष्ण के द्वारा रक्षित बालकों का जिस समय भोजन हो रहा था, उसी समय बछड़े घास की लालच में पड़कर दूर के एक गहन वन में घुस गये, गोप-बालक भय से व्याकुल हो गये। 

यह देखकर श्रीकृष्ण बोले:- ‘तुम लोग मत जाओ, मैं बछड़ों को यहाँ ले आऊँगा।’ 

यों कहकर श्रीकृष्ण उठे और भोजन का कौर हाथ में लिये ही गुफाओं एवं कुंजों में तथा गहन वन में बछड़ों को ढूँढ़ने लगे।

जिस समय व्रजवासी बालकों के साथ श्रीकृष्ण यमुना तट पर रूचि पूर्वक भोजन कर रहे थे, उसी समय पध्मयोनी ब्रह्मा जी अघासुर की मुक्ति देखकर उसी स्थान पर पहुँच गये। 

इस दृश्य को देखकर ब्रह्माजी मन ही मन कहने लगे:- ‘ये तो देवाधिदेव श्री हरि नहीं हैं, अपितु कोई गोपकुमार हैं। 

यदि ये श्रीहरि होते तो गोप-बालकों के साथ इतने अपवित्र अन्न का भोजन कैसे करते?’ 

राजन, ब्रह्मा जी परमात्मा की माया से मोहित होकर बोल गये।
उन्होंने उनकी (भगवान की) मनोज्ञ महिमा को जानने का निश्च्य किया। 

ब्रह्माजी स्वयं आकाश में अवस्थित थे, इसके उपरांत अघासुर-उद्धार की लीला के दर्शन से चकित होकर समस्त गायों-बछड़ों तथा गोप-बालकों का हरण करके वे अंतर्धान हो गये।

इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में श्रीवृन्दावनखण्‍ड के अंतर्गत ‘ब्रह्माजी के द्वारा गौओं, गोवत्सों और गोप-बालकों का हरण’ नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ।

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